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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (257)

बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुत

पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।

**

सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ

सुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।

**

कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गया

उससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।

**

पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ 

चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।

**

बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 14, 2020 at 7:30am — 4 Comments

कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

जिनके धन्धे  दोहन  वाले  कब  धरती का दुख समझे

सुन्दर तन औ' मन के काले कब धरती का दुख समझे।१।

**

जिसने समझा थाती धरा को वो घावों को भरता नित

केवल शोर  मचाने  वाले  कब  धरती का दुख समझे।२।

**

ताल, तलैया, झरने, नदिया इस के दुख में सूखे नित

और नदी सा बनते नाले  कब धरती का दुख समझे।३।

**

पेड़ कटे तो बादल  रूठा  और  हवाएँ  सब झपटीं

ये सड़कों के बढ़ते जाले कब धरती का दुख समझे।४।

**

नित्य सितारों से गलबहियाँ उनकी तो हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 12, 2020 at 5:58am — 6 Comments

सितारे लौंग से कमतर नयन मृग से भी अच्छे हैं -गजल

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



अकेलेपन को भी हमने किया चौपाल के जैसा

बचा लेगा दुखों में  ये  हमें  फिर ढाल के जैसा।१।

**

भले ही दुश्मनी कितनी मगर आशीष हम देते

कभी दुश्मन न देखे बीसवें इस साल के जैसा।२।

**

इसी से है जगतभर में हरापन जो भी दिखता है

हमारे मन का सागर  ये  न  सूखे ताल के जैसा।३।

**

सितारे अपने भी जगमग न कमतर चाँद से होते

अगर ये भाग्य भी  होता  चमकते भाल के…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2020 at 7:42pm — 2 Comments

स्वाधीन हो के भी कहाँ स्वाधीन हम हुए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२



फेंका जो होता आप ने पत्थर सधा हुआ

दिखता जरूर भेड़िया घायल गिरा हुआ।१।

**

हर बार अपनी चाल जो होती नहीं सफल

है दुश्मनों से  आज  भी  कोई मिला हुआ।२।

**

स्वाधीन हो के  भी कहाँ स्वाधीन हम हुए

फिरता न यूँ ही हाथ ले फदली कटा हुआ।३।

**

रोटी मिली न मुझको न तुझको खुशी मिली

ऐसी गजल से बोल तो किस का भला हुआ।४।

**

कल तक जो हँसता खेल के चिंगारियों से था

रोता है आज  देख  के  निज  घर जला हुआ।५।

**

मैं जुगनुओं को मुँह…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2020 at 7:17pm — 4 Comments

काँटों से बिँध फूल को आते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



शीशे को भी  रखने  वाले  पत्थर लोगों नहीं रहे

‌यौवन के अब पहले  जैसे  तेवर  लोगों नहीं रहे।१।

**

ढूँढा करते  हैं  गुलदस्ते  तितली  भौंरे  आज यहाँ

‌काँटों से बिँध फूल को आते मधुकर लोगों नहीं रहे।२।

**

केवल आँच जला देती है सावन में भी देखो अब

ज्लाला से लड़ बचने वाले वो घर लोगों नहीं रहे।३।

**

एक तो पहले से मुश्किल थी ये कोरोना क्या आया

‌रोज कमा खाने के भी अब अवसर लोगों नहीं रहे।४।

**…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2020 at 9:00am — 10 Comments

किसी की आँख का काँटा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



किसी की आँख  का  काँटा  न  तू होना गँवारा कर

किसी की आँख का तारा स्वयम् को हाँ बनाया कर।१।

**

ये जननी जन्म भूमि तो सभी को स्वर्ग से भी बढ़

गढ़ी हो नाल जिस भूमी उसे हर पल सँवारा कर।२।

**

उतर जाये तो जीवन ये रहे लायक न जीने के

उतरने दे न पानी निज न औरों का उतारा कर।३।

**

जो अपनी नींद सोता हो जो अपनी नींद जगता हो

उसी सा होने की जिद रख उसी को बस सराहा कर।४।

**

हँसी की बात  लगती  पर  हँसी  में मत उड़ा देना

अगर दाड़ी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2020 at 4:01pm — 3 Comments

दो चार रंग छाँव के हमने बचा लिए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

टूटे जो डाल से वही पत्ते उठा लिए

दीवार घर की सूनी थी उस पर सजा लिए।१।

**

वैसे खिले थे फूल भी किस्मत से तो बहुत

हमने ही अपनी राह में काँटे बिछा लिए।२।

**

नश्तर थे सब के हाथ में आये कुरेदने

आया था कौन घाव की बोलो दवा लिए।३।

**

कहने को धूप राह में तीखी तो थी मगर

दो चार रंग छाँव के हमने बचा लिए।४।

**

जैसे फिरे थे आपकी गलियों में हम कभी

फिरता रहा है कौन यूँ अपना पता लिए।५।

**

ये कर्ज किससे यूँ भला यारो… Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 18, 2020 at 11:05am — 13 Comments

आँगन वो चौड़ा खेत के छूटे रहट वहीं - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२



पूछो न आप गाँव को क्या क्या हैं डर दिये

खेती को मार  खेत  जो  सेजों से भर दिये।१।

**

पाटे गये वो ताल भी पुरखों की देन जो

रख के विकास नाम ये अन्धे नगर दिये।२।

**

आँगन  वो  चौड़ा  खेत  के  छूटे  रहट  वहीं

दड़बों से आगे कुछ नहीं जितने भी घर दिये।३।

**

वो भी धरौंदे तोड़  के  हम  से ही  थे गहे

कहकर सहारा आप ने तिनके अगर दिये।४।

**

कोई चमन  के  फूल  को  पत्थर बना रहा

कोई था जिसने शूल भी फूलों से कर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2020 at 6:30am — 5 Comments

है जो कुछ भी धरती का - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

अपना क्या है इस दुनिया में है जो कुछ भी धरती का

आग, हवा ये, फूल, समन्दर, चिड़िया, पानी धरती का।१।

**

क्या सुन्दरवन क्या आमेजन कोलोराडो क्या गौमुख

ये  हरियाली,  रेत  के  टीले,  सोना, चाँदी  धरती  का।२।

**

हिमशिखरों  की  चमक  चाँदनी  बारामूदा  का जादू

पीली नदिया,  हरा समन्दर  ताजा  बासी  धरती का।३।

**

बाँध न गठरी लूट धरा को अपना माल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 9, 2020 at 4:20am — 8 Comments

महज चाहत का रिस्ता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



जमाने की नजर में यूँ बताओ कौन अच्छा है

भले ही माँ पिता  के  वास्ते हर लाल बच्चा है।१।

**

हदों में झूठ बँध पाता  नहीं  है आज भी लोगों

जुटाली भीड़ जिसने बढ़ लगे वो खूब सच्चा है।२।

**

लगे बासी भरा जो भोर को घर में जिन्हें सन्ध्या

मगर बोतल में जो पानी कहा करते वो ताजा है।३।

**

महज चाहत का रिस्ता है यहाँ हर चीज से मन का

सुना है नेह से  मिलता …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 5:11pm — 2 Comments

अछूतों सा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



अछूतों से भी मत करना कभी व्यवहार अछूतों सा

समय तुम को न इस से दे कहीं दुत्कार अछूतों सा।१।

**

कहोगे भार जब उनको तुम्हें कोसेगा अन्तस नित

कहोगे तब स्वयम् को ही यहाँ पर भार अछूतों सा।२।

**

करोना  वैसा  ही  लाया  करें  व्यवहार  जैसा  हम

उसी का भोगता अब फल लगे सन्सार अछूतों सा।३।

**

पता पाओगे  पीड़ा  का  उन्हें  जो  नित्य  डसती है

कहीं पाओगे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 5, 2020 at 6:30am — 10 Comments

कितना मुश्किल होता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



रात से बढ़कर दिन में जलना कितना मुश्किल होता है

सच कहता हूँ निज को छलना कितना मुश्किल होता है।१।

**

जब रिश्तों के बीच में ठण्डक हद से बढ़कर पसरी हो

धूप से बढ़कर छाँव में चलना कितना मुश्किल होता है।२।

**

पेड़ हरे में जो भी मुश्किल सच में हल हो जाती पर

ठूँठ बने तो धार में गलना कितना मुश्किल होता है।३।

**

साथ समय तो लक्ष्य सरल पर समय हठीला होने से

सच में धारा संग भी चलना कितना मुश्किल होता है।४।

**…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 4, 2020 at 5:00pm — 8 Comments

झूलों पर भी रोक लगी -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



सुनो सखी इस सावन में तो झूलों पर भी रोक लगी

जिससे लगता नेह भरी सब साँसों पर भी रोक लगी।१।

**

घिरघिर बदली कड़क दामिनी मन को हैं उकसाती पर

भरी  उमंगों  से  यौवन  की  पींगों  पर  भी  रोक लगी।२।

**

कितने मास  करोना  का  भय  देगा  कारावास हमें

मिलकर हम सब कैसे गायें गीतों पर भी रोक लगी।३।

**

सूखी तीज  बितायी  सब  ने  कैसी  होगी  राखी रब

कोई कहे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 27, 2020 at 1:15pm — 8 Comments

भोर का सूरज उजला क्यों है -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

ठूँठ हुआ पर छाँव में अपनी नन्हा पौधा छोड़ गया

कैसे कह दूँ पेड़  मरा  तो  मानव चिन्ता छोड़ गया।१।

**

वैसे तो  था  जेठ  हमेशा  लेकिन  जाने  क्या सूझी

अब के मौसम हिस्से में जो सावन आधा छोड़ गया।२।

**

"दिखे टूटता तो फल देगा", चाहे ये किवँदन्ती पर

आशाओं के कुछ तो बादल टूटा तारा छोड़ गया।३।

**

या रोटी की रही विवशता या सीमा की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 23, 2020 at 12:08pm — 6 Comments

न्याय की जब से हुई हैं कच्ची सारी डोरियाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



भाव अब तो पाप - पुण्यों के बराबर हो गये

देवता क्योंकर जगत में आज पत्थर हो गये।१।

**

थी जहाँ पर अपनेपन की लहलहाती खेतियाँ

स्वार्थ से कोमल ह्रदय  के  खेत ऊसर हो गये।२।

**

न्याय की जब से हुई  हैं कच्ची सारी डोरियाँ

तब से जुर्मोंं के  महावत  और  ऊपर हो गये।३।

**

दूध, लस्सी, घी अनादर का बने पहचान अब

पैग व्हिस्की मय पिलाना आज आदर हो गये।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 20, 2020 at 5:30pm — 10 Comments

पनघट के दोहे- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

पनघट पोखर बावड़ी, बरगद पीपल पेड़

उनकी बातें कर न अब, बूढ़े मन को छेड़।१।

**

जिस पनघट व्याकुल कभी, बैठे थे हर शाम

पुस्तक में ही शेष अब, लगता उस का नाम।२।

**

पनघट सारे खा गया, सुविधाओं का खेल

फिर भी सुख से हो सका, नहीं हमारा मेल।३।

**

पीपल देखे गाँव का, बीते कितने साल

कैसा होगा क्या पता, अब पनघट का हाल।४।

**

पथिक ढूँढ नव राह तू, अगर बुझानी प्यास

पनघट ही जब ना रहे, क्या गोरी की आस।५।

**

सब मिल पनघट थीं कभी, बतियाती चित खोल

घर- घर नल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2020 at 9:59am — 14 Comments

सेज पर बिछने को होते फूल जैसे पर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२



हम जरूरत के लिए विश्वास जैसे हैं

नाम पर सेवा के लेकिन दास जैसे हैं।१।

**

सेज पर बिछने को होते फूल जैसे पर

वैसे पथ के  पास  उगते  घास जैसे हैं।२।

**

है हमारा मान केवल जेठ जैसा बस

कब  तुम्हारे  वास्ते  मधुमास जैसे हैं।३।

**

दूध लस्सी  धी  दही  कब  रहे तुमको

कोक पेप्सी से बुझे उस प्यास जैसे हैं।४।

**

रोज हमको हो निचोड़ा आपने लेकिन

स्वेद भीगे हर  किसी …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 14, 2020 at 10:01am — 10 Comments

तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२१/२



लिखना न मेरा नाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में

आयेगा कुछ न काम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।१।

**

सबको पता है धूल से बढ़कर न मैं रहा कभी

ऊँचा भले ही दाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।२।

**

सूरज न उगता भोर का तारों भरी न रात हूँ

ढलती हुई सी शाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।३।

**

रावण बना दिया है मुझे प्यास ने हवस की यूँ

करना न मुझको राम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।४।

**

चाहत न कोई नाम की रिश्ता अगर बना कोई

चलना मुझे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 10, 2020 at 6:45am — 13 Comments

वर्षा के दोहे -१

नगर खिन्न हो देखता, खुश होता देहात

हरियाली  उपहार  में,  देती  है ब रसात।१।

**

हलधर सोया खेत में, तन पर ओढ़े धूल

रूठी बदली देखिए, जा बैठी किस कूल।२।

**

धरती के  दुख  से  हुई, अँधियारी  हर भोर

बादल बिजली चीखते, मत आना इस ओर।३।

**

जब से आयी गाँव में, फिर रिमझिम बरसात

सौंधी मिट्टी  की  महक, उठती  है  दिन-रात।४।

**

वसन धरा के जो सुना, तपन ले गयी चोर

बौराए घन  नापते, पलपल  नभ का छोर।५।

**

मेंढक जी तो हैं सदा, बरखा के…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2020 at 10:51pm — 4 Comments

मगर हम स्वेद के गायें - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२ × ४



कहीं पर भूख  पसरी  है  फटे कपड़े पुराने हैं

भला मैं कैसे कह दूँ ये सभी के दिन सुहाने हैं।१।

**

वो गायें गीत फूलों के जिन्हें गजरे सजाने हैं

मगर हम स्वेद के  गायें  हमें पत्थर उठाने हैं।२।

**

पुछें हर आँख से  आँसू  हमारा ध्येय इतना हो

न सोचो चन्द साँसों हित यहाँ सिक्के कमाने हैं।३।

**

बसाना हो तो दुश्मन का बसा दो चाहे पहले पल

पहल अपने से ही  करना  अगर घर ही जलाने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2020 at 8:30am — 7 Comments

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