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किसी आजाद पन्छी को न थी मन्जूर पाबन्दी -गजल

१२२२ /१२२२/ १२२२ /१२२२/

*
कभी कतरों में बँटकर  तो  कभी सारा गिरा कोई
मिला जो माँ का आँचल तो थका हारा गिरा कोई।१।

*
कि होगी कामना  पूरी किसी  की लोग कहते हैं
फलक से आज फिर टूटा हुआ तारा गिरा कोई।२।

*
गमों की मार से लाखों सँभल पाये नहीं  लेकिन
सुना हमने यहाँ  खुशियों  का भी मारा गिरा कोई।३।

*
किसी आजाद पन्छी को न थी मन्जूर पाबन्दी
उसी की फड़फड़ाहट से वहाँ कारा गिरा कोई।४।

*
पतित कर आचरण को नित धरासायी उजाले हैं
सुना अबतक मगर यारो न अँधियारा गिरा कोई।५।

*

मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2020 at 9:23am

आ. भाई विनय प्रकाश जी, सादर अभिनन्दन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by Vinay Prakash Tiwari (VP) on June 11, 2020 at 8:37pm

आदरणीय ज़नाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' साहब बड़ी खूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको ढेर सारी बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 19, 2020 at 6:55am

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और मान देने के लिए दिल से आभार ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 18, 2020 at 12:06pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर नमस्कार, 

लाजबाब ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2020 at 9:56pm

रचना को फीचर्ड करने के लिए सम्पादक मण्डल का हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 20, 2020 at 4:23pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on March 19, 2020 at 7:17am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

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