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कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

जोगी सी अब न शेष हैं जोगी की फितरतें
उसमें रमी हैं आज भी कामी की फितरते।१।
*
कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं
चढ़ती हैं आदमी में जो कुर्सी की फितरतें।२।
*
कहने लगे हैं चाँद को,  सूरज को पढ़ रहे
समझे नहीं हैं लोग जो धरती की फितरतें।३।
*
किस हाल में सवार हैं अब कौन क्या कहे
भयभीत नाव देख के  माझी  की फितरतें।४।
*
पूजन सफल समाज में कन्या का है तभी
उसमें समायें मान को काली की फितरतें।५।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Thursday

आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर करने का प्रयास करता हूँ सादर...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 7, 2026 at 4:57pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, इस गजल को अभी तनिक और समय दिया जाना था. 

सादर

 

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