22 members
112 members
121 members
174 members
119 members
(एक)
२१२/२१२/२१२/२१२
जब अंधेरों के आंगन उजाले गये
न्याय के भी बदल रोज पाले गये।१।
*
पांत से नीच कह जब निकाले गये
मस्जिदें उठ गयीं सब शिवाले गये।२।
*
झूठ को ताज देकर जगत में सभी
सत्य दुत्कार घर से निकाले गये।३।
*
यूं सियासत ने सपने दिखाये हमें
हाथ आये थे जो भी निवाले गये।४।
*
क्या कहा सांकलों द्वार के कान में
चाबियां रह गयीं और ताले गये।५।
*
होना आसान था ज़िन्दगी का सफर
साथ…
Posted on November 4, 2026 at 5:30pm
२२१/२१२१/१२२१/२१२
***
पीछे गयी है छूट जो होली गुलाल की
साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।
*
कहने को आयी देश में इक्कीसवीं सदी
होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।
*
कहने को पर्व रंग का, मस्ती मजाक का
पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।
*
रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी
साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।
*
माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े
टेढ़ी करो न रोष में रेखा को भाल की।५।…
Posted on March 3, 2026 at 7:30am
बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में
आये कमी कहाँ से कहो फिर दुराव में।१।
*
अवसर समानता का कहे सम्विधान तो
पर लोकतंत्र व्यस्त हुआ भेदभाव में।२।
*
करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को
फिर से जिला दिया है उसे ताव-ताव में।३।
*
खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर
हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।
*
सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर
जीवन…
Posted on February 14, 2026 at 5:09pm — 2 Comments
२२१/२१२१/१२२१/२१२
******
घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये
उघड़े शरीर आप ही सम्मान हो गये।१।
*
गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली
उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।
*
घर में बहार नल से जो आयी गरीब के
पनघट हर एक गाँव के वीरान हो गये।३।
*
भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर
सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।
*
हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है
पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो…
Posted on February 7, 2026 at 6:23am — 1 Comment
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
सादर आभार आदरणीय
अपने आतिथ्य के लिए धन्यवाद :)
मुसाफिर सर प्रणाम स्वीकार करें आपकी ग़ज़लें दिल छू लेती हैं
जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी
प्रिय भ्राता धामी जी सप्रेम नमन
आपके शब्द सहरा में नखलिस्तान जैसे - हैं
शुक्रिया लक्ष्मण जी
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |