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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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"हार्दिक बधाई ।"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
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"भाई अफरोज जी सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
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Profile Information

Gender
Male
City State
Delhi
Native Place
Dharchaula,uttarakhand
Profession
teaching

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog

वही वंशज है सूरज का - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

1222 1222 1222 1222



न जीवन राख कर लेना किसी की डाह में यारो

हमेशा सुख सभी का हो तुम्हारी चाह में यारो।1।



विचारों की गहनता हो न हो व्यवहार उथला ये

सुना मोती ही मिलते हैं समुद की थाह में यारो ।2।



वही वंशज है सूरज का बुजुर्गों ने कहा है सच

जलाए दीप जिसने भी तिमिर की राह में यारो ।3।



किसी को देके पीड़ा तुम न उसकी आह ले लेना

न जाने कैसी ज्वाला हो किसी की आह में यारो।4।



गगन के स्वप्न तो देखो धरा लेकिन न त्यागो तुम

हवा में… Continue

Posted on September 5, 2017 at 4:02pm — 22 Comments

अब की बारिश में - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" (गजल)

1222 1222 1222 1222



बहा कर ले गई नदिया खजाना अब की बारिश में

न बच पाया मुहब्बत का ठिकाना अब की बारिश में।1।



डुबो कर घर गए मेरा किसी की आँखों के आँसू

है आई बाढ़ समझे ये जमाना अब की बारिश में।2।



जहाँ मिलते थे तन्हा नित खुदा से आरजू कर हम

न जाने क्यों खुदा भूला बचाना अब की बारिश में।3।



हैं बाहर बदलियाँ रिमझिम कि भीतर आँखों से जलथल

बहुत मुश्किल है सीले खत सुखाना अब की बारिश में।4।



पहुँच हम तक भी जाएगी तुम्हारे तन की हर… Continue

Posted on August 17, 2017 at 11:13am — 12 Comments

कभी गम के दौर में भी हुई आखें नम नहीं पर- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

गजल

2121    1221    1212    122



मेरे  रहनुमा  ही   मुझसे  मिले  सूरतें  बदल  के

भला क्या समझता तब मैं छिपे पैंतरे वो छल के।1।

न सितारे बोले  उससे  मेरा  हाल क्या है या रब

न ही चाँद आया मुझ तक कभी एकबार चल के।2।



खता क्या थी अपनी ऐसी अभीतक न समझा हूँ मैं

जो था राज मेरे दिल का खुला आँसुओं में ढल के।3।

कहूँ लाल कह के  उसने न  गले  लगाया क्यों मैं

न लिपट सका था मैं ही कभी उससे यूँ मचल के।4।



बड़ा ख्वाब  था  खिलाऊँ  उसे मोल की भी रोटी

न खरीद…

Continue

Posted on July 26, 2017 at 1:10pm — 18 Comments

ललक दिल को रिझाने की -लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ (ग़ज़ल)

ग़ज़ल



1222 1222 1222 1222

ललक दिल को रिझाने की जो खूनी हो गई होगी

किसी का सुख किसी की पीर दूनी हो गई होगी।1।

सभी के हाथ में गुल हैं यहाँ जुल्फें सजाने को

न जाने किस चमन की शाख सूनी हो गई होगी।2।

हवा बंदिश की सुनते हैं बहुत शोलों को भड़काए

मुहब्बत यार कमसिन की जुनूनी हो गई होगी।3।

हमें तो सुख रजाई का मिला है शीत में यारो

किसी जंगल में फिर से तेज धूनी हो गई होगी।4।

नहीं उसको…

Continue

Posted on May 7, 2017 at 1:19pm — 13 Comments

Comment Wall (8 comments)

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At 7:27pm on March 10, 2016, TEJ VEER SINGH said…

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!आपने मुझे इस क़ाबिल समझा!

At 4:26pm on April 2, 2015, gumnaam pithoragarhi said…
लक्ष्मण धामी जी नमस्कार शुक्रिया आपने मुझे ये सम्मान दिया क्या मैं आपसे बात कर सकता हूँ यदि आप चाहें तो ................ मेरा नंबर ये है ,,,,,,,,,,7579 100213.........क्या आप अपना नंबर देंगे ?
At 10:37pm on February 17, 2015,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

भाई लक्ष्मण धामीजी, यदि संभव हो तो 18 फरवरी को भी भेंट हो सकती है. मैं 18 फरवरी को भी प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में उपस्थित रहूँगा.
शुभ-शुभ

At 6:34am on July 9, 2014, gumnaam pithoragarhi said…
माह के सक्रिय सदस्य के रूप में चयनित होने पर हार्दिक बधाई और शुभकामना
sir main pithoragarh se hoon achchha laga ki aap bhi dharchula se hain ............................... ek baar fir badhai ,,,,,,,,,
At 2:53pm on July 8, 2014, Sushil Sarna said…

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी माह के सक्रिय सदस्य के रूप में चयनित होने पर हार्दिक बधाई और शुभकामना 

At 2:27pm on July 8, 2014, Nilesh Shevgaonkar said…

बधाई 

At 2:21pm on July 8, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 6:53am on October 23, 2013, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

सभी प्रबुद्ध जानो को नमन एवं सुझावों के लिए हार्दिक धन्यवाद . अभी ग़ज़ल शाश्त्र से सम्पूर्ण तौर पर अनभिज्ञ हूँ . पर समझने का प्रयास भी कर रहा हूँ . आप सभी से निवेदन है कि मार्गदर्शन करते रहें .

 
 
 

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