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Ajay Tiwari
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Ajay Tiwari commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकान्त कविता : अजन्मी कविता
"आदरणीय गणेश जी, व्यवस्था किस तरह से मध्यमवर्ग को भी उत्पीड़ित करती है इसे आपकी कविता संवेदनशील तरीके से पेश करती है. हार्दिक बधाई. "
Apr 14
Ajay Tiwari commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post लघुकथा-बेटी बचाओ
"आदरणीय निलेश जी, इस विधा में मेरी बहुत दखल नहीं है इस लिए मैं विधागत बारीकियों में जाऊंगा भी नहीं. लेकिन बात को साहसपूर्ण और प्रभावी ढंग से कहने के लिए हार्दिक बधाई. "
Apr 14
Ajay Tiwari commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post नवगीत- चल दिया लेकर तगारी -बसंत
"आदरणीय बसंत जी, एक और अच्छे नवगीत के लिए हार्दिक बधाई."
Apr 14
Ajay Tiwari commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post एक ग़ज़ल -कठुआ की आसिफ़ा में नाम
"आदरणीय निलेश जी, जो कुछ हुआ है उसके लिए 'जघन्य' शब्द भी अपर्याप्त लगता है. आपकी इस ग़ज़ल ने उस हर आदमी की भावनाओं को स्वर दिया है जिस में थोड़ी भी संवेदनशीलता बाकी होगी. सबकी भावनाओं को स्वर देने के लिए हार्दिक आभार.  सादर"
Apr 14
Ajay Tiwari commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल(डर लग रहा है तेवरे दिलदार देख कर )
"आदरणीय तस्दीक अहमद साहब, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई."
Apr 14
Ajay Tiwari commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- ख़ुद को क़िस्सा-गो समझे है हर क़िरदार कहानी में
"आदरणीय निलेश जी, हर शेर खूबसूरत है. एक और बहुत उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई"
Apr 9
Ajay Tiwari commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...परेशां रहा हूँ मैं अहल-ए-सितम से-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आदरणीय बृजेश जी अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई."
Apr 9
Ajay Tiwari commented on दिनेश कुमार's blog post ग़ज़ल -- तृष्णाओं के भँवर में फँसा बद-हवास था // दिनेश कुमार
"आदरणीय दिनेश जी, तूफ़ाँ में रात जिसका सफ़ीना बचा नहींकहते हैं नाख़ुदा वो समन्दर-शनास था       बहुत खूब ! उम्दा ग़ज़ल हुई..हार्दिक बधाई."
Apr 9
Ajay Tiwari commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की -पार करने हैं समुन्दर ये दिलो-जाँ वाले
"आदरणीय निलेश जी, उम्दा अशआर हुए है. हार्दिक बधाई."
Apr 9
Ajay Tiwari commented on Samar kabeer's blog post एक ताज़ा ग़ज़ल
"आदरणीय समर साहब,  उम्दा ग़ज़ल हुई है.हार्दिक बधाई."
Apr 9
Ajay Tiwari commented on लक्ष्मण रामानुज लडीवाला's blog post ओ बी की आठवीं वर्षगाँठ पर कुछ दोहे - लक्ष्मण रामानुज
"आदरणीय लक्ष्मण जी, बहुत अच्छे प्रासंगिक दोहों हुए हैं. हार्दिक बधाई."
Apr 4
Ajay Tiwari commented on Samar kabeer's blog post 'ओबीओ की आठवीं सालगिरह का तुहफ़ा'
"आदरणीय समर साहब,  यह ग़ज़ल भी ओबोओ के प्रति आप के असाधारण समर्पण का आईना है जिसके हम सब प्रशंसक है. इस समर्पण की उम्र अभी कम से कम सौ वर्ष और लम्बी हो. हार्दिक बधाई."
Apr 4
Ajay Tiwari commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कब पटाखे फूट जाएँ
"आदरणीय वसंत जी, इस बेहतरीन नवगीत के लिए हार्दिक बधाई ."
Apr 4
Ajay Tiwari commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- हाँ! सराब का धोखा तिश्नगी में होता है,
"आदरणीय निलेश जी,  बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है. हर शेर खूबसूरत है. पुछल्ले भी बहुत खूब है. हार्दिक बधाई."
Apr 4
Ajay Tiwari replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"शुभास्ते सन्तु पन्थानः"
Apr 2
Ajay Tiwari commented on Sushil Sarna's blog post पानी-पानी ...
"आदरणीय सुशील जी,  इस प्रभावशाली काव्य-प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. इसका सघन नियंत्रित शिल्प बहुत अच्छा लगा. सादर "
Apr 1

Profile Information

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Male
City State
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Native Place
Ballia
Profession
IT

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ग़ज़ल - सब में आग थी, लोहा भी था, नेक बहुत थे सारे हम - अजय तिवारी

फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ा

 22      22      22       22     22      22      22      2

सब में आग थी, लोहा भी था, नेक बहुत थे सारे हम

लेकिन  तन्हा-तन्हा लड़ कर,  तन्हा-तन्हा  हारे हम

 

ज़र्रा-ज़र्रा  बिखरे  है  हम,  चारो ओर खलाओं में

लेकिन जिस दिन होंगे इकठ्ठा, बन जायेंगे सितारे हम

 

कितने दिन वो मूँग दलेंगे, कमजोरों की छाती पर

कितने दिन और चुप  बैठेंगे, बनके यूं बेचारे हम 

 

कबतक और ये…

Continue

Posted on March 26, 2018 at 11:49am — 22 Comments

केदारनाथ सिंह के लिए - अजय तिवारी

केदारनाथ सिंह के लिए

वैसे तो आजकल किसी को क्या फर्क पड़ता है -

एक कवि के न होने से !  

लेकिन जैसे ख़त्म हो गया है धरती का सारा नमक 

और अलोने हो गए हैं  

सारे शब्द...

मौलिक/अप्रकाशित

Posted on March 21, 2018 at 4:40pm — 16 Comments

ग़ज़ल - जरा-सा छुआ था हवाओं ने,  कि नदी की देह सिहर गयी - अजय तिवारी

मुतफाइलुन   मुतफाइलुन    मुतफाइलुन   मुतफाइलुन

11212         11212          11212         11212

जरा-सा छुआ था हवाओं ने,  कि नदी की देह सिहर गयी

तभी धूप सुब्ह की गुनगुनी,   उन्हीं सिहरनों पे उतर गयी

 

खिली सरसों फिर से कछार में, भरे रंग फिर से बहार में

घुली खुश्बू फिर से बयार में, कोई टीस फिर से उभर गयी   

 

उसी एक पल में ही जी लिए, उसी एक पल में ही मर गए

वही एक पल मेरी सांस में,  तेरी सांस जब थी ठहर गयी

 

जमी…

Continue

Posted on March 20, 2018 at 12:28pm — 9 Comments

ग़ज़ल - अक्सर खुद से खुद ही लड़ कर, खुद से खुद ही हारे हम - अजय तिवारी

फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ा

 22      22      22       22     22      22      22      2  

अक्सर खुद से खुद ही लड़ कर, खुद से खुद ही हारे हम

और किसी  से  शिकवा कैसा, अपने हाथ  के मारे हम

 

हम अपनी पर आ जाते तो, दुनिया बदल भी सकते थे

लेकिन थी कोई बात कि जिससे, बन के रहे बेचारे हम

तन्हाई ने कर डाला है,  जिस्म को अब  मिट्टी का ढेर 

साथ तेरे  चाहा था  मिल कर,  छूते  चाँद-सितारे …

Continue

Posted on December 27, 2017 at 2:12pm — 26 Comments

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At 11:16pm on November 1, 2017, Prakash P said…
आदरणीय श्री अजय तिवारी जी सदर प्रणाम..माफ़ कीजियेगा ये मेरा
प्रथम प्रयास था अतः बहुत कमियां हैं मेरे लेखन में ..आपका सुझाव हृदय से स्वीकार करता हूँ .ग़ज़ल की कक्षा अावश्य मार्गदर्शक सिद्ध होगी मेरे लिए, धनयवाद !नहीं उपस्थित होने का कारण बैंक का थकाऊ कार्य है ..उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.
 
 
 

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