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राज़ नवादवी
  • Male
  • Bhopal, Madhya Pradesh
  • India
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Ravi Shukla commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"आदरणीय राज नवादवी जी बहुत बढि़या गजल कही आपने आदरणीय समर साहब के मश्‍वरे के अनुसार अश्‍आर में और भी निखार आ गया है यूँ नहीं मरते हैं हम सादासिफ़त पे रंग सातों मुन्शइब हैं सादगी में   इक पसेमंज़र-ए-ज़ुल्मत है ज़रूरी यूँ नहीं दिखती हैं चीज़ें…"
6 hours ago
Samar kabeer commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,ग़ज़ल का बहुत अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । एक बात बताना चाहूंगा कि ग़ज़ल में अरूज़ तो पहली सीढ़ी है, लेकिन उसके साथ कुछ और बातों का ध्यान रखना भी ज़रूरी होता है,मसलन अल्फ़ाज़ की चुस्त बंदिश ग्रामर वग़ैरह…"
yesterday
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"आदरणीय डॉ कँवर साहेब, आपका ह्रदय से आभार. "
Sunday
डॉ.कंवर करतार 'खन्देह्ड़वी' commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"राज नवादवी जी दाद कबूल करें बढ़िया ग़ज़ल हुई है I  "
Sunday
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"शुक्रिया जनाब धामी साहब, दिल से आभार! "
Sunday
laxman dhami commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"अति सुंदर.।."
Sunday
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"मुहतरम जनाब आरिफ़ साहब, आपकी दाद दिल से कुबूल करता हूँ, हौसलाअफज़ाई का दिली शुक्रिया. सीनियर मेम्बरान से गुजारिश है ब नुकत-ए-अरूज इस्लाह का करम फरमाएं. "
Sunday
Mohammed Arif commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"आदरणीय राज़ नवादवी आदाब, बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूल क़ुबूल करें । ग़ज़ल सौष्ठव की दृष्टि से यह ग़ज़ल कितनी खरी उतरती है इस बारे में वरिष्ठ बताएँगे ।"
Sunday
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"जनाब बृजेश जी, आपका ह्रदय से आभार. सादर "
Saturday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई ज़नाब राज साहब..हार्दिक बधाई"
Friday
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"जनाब सुरेन्द्र नाथ जी, आपका दिल से एहतेराम, दरअसल बह्र-ओ-वज़न के फन को सीख रहा हूँ, जिसकी प्रेरणा और अहमियत का इल्म इसी मंच पर आके मिला. इसलिए इस मंच से जुड़े सभी सुधिजनों का भी मैं शुक्रगुज़ार हूँ, और उनसे मेरी गुजारिश होगी कि समय समय पर मार्गदर्शन…"
Friday
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९
"जनाब राज नवादवी जी सादर अभिवादन, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल, बहुत खूब। दाद के साथ मुबारकबाद क़बूलें। सादर"
Friday
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Friday
राज़ नवादवी posted a blog post

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९

(ग़ज़ल का शिल्प- बहरेरमल मुसद्दस सालिम; फ़ाएलातुन/ फ़ाएलातुन/फ़ाएलातुन; 2122/2122/2122)------------------------------------------------------------------------------------------------------------------झाँक कर वो देख ले अपनी ख़ुदी मेंऐब दिखता है जिसे हर आदमी में  पास आकर दूरियों का अक्स देखाग़ैर जब होने लगा तू दोस्ती में यूँ नहीं मरते हैं हम सादासिफ़त पेरंग सातों मुन्शइब हैं सादगी में इक पसेमंज़र-ए-ज़ुल्मत है ज़रूरीयूँ नहीं दिखती हैं चीज़ें रौशनी में आ तुझे भी इस्तिआरों से सवारूँलफ्ज़ के गौहर बनाकर शाइरी…See More
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राज़ नवादवी updated their profile
Thursday
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४८
"आदरणीय सुरेन्द्रनाथ जी, आपका हृदय से आभार! "
Oct 11, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Nawada, Bihar
Profession
Education, Training, and Community Development. Hybrid Value Chain Entrepreneur (HVCE) at Ashoka Innovators for the Public
About me
Main shayar to nahin, magar ai zindgee, jab se tum ko samjha, shayari aa gai.

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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४९

(ग़ज़ल का शिल्प- बहरेरमल मुसद्दस सालिम; फ़ाएलातुन/ फ़ाएलातुन/फ़ाएलातुन; 2122/2122/2122)

------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

झाँक कर वो देख ले अपनी ख़ुदी में

ऐब दिखता है जिसे हर आदमी में 

 

पास आकर दूरियों का अक्स देखा

ग़ैर जब होने लगा तू दोस्ती में

 

यूँ नहीं मरते हैं हम सादासिफ़त पे

रंग सातों मुन्शइब हैं सादगी में

 

इक पसेमंज़र-ए-ज़ुल्मत…

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Posted on August 18, 2017 at 2:48pm — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४८

मेरा खूने-क़ल्ब कबतक यूँ ही बार-बार होगा

कभी वो घड़ी भी आए जो तुझे भी प्यार होगा

 

दिलेसरनिगूं में कब तक पशेमानियाँ रहेंगी

तेरी हाँ का मुझको कब तक यूँ ही इंतेज़ार होगा

 

मेरी आशिक़ी पे कब तक यूँ ही तुहमतें लगेंगी

तेरे हाथ इश्क़ कब तक यूँ ही दाग़दार होगा

 

करूँ भी तो मैं करूँ क्या कोई दाफ़िया नहीं है

तेरा ज़िक्र जब भी होगा दिल बेक़रार होगा

 

पसेशाम अपने घर को जो मैं जाऊं फिरसे वापिस

वही इन्दिहाम होगा वही…

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Posted on October 10, 2016 at 10:08pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४७

जो है दिल को शिकायत न हो ज़ेरेफुगाँ क्यों

न हो कहने का हक़ कुछ तो देते हो जुबां क्यों  

 

मेरी खानाख़राबी सुबूतेआशिक़ी है

जो हो मजनूं तुम्हारा हो उसका आशियाँ क्यों

 

यूँ कारेआशिक़ी से है आती बू-ए-साज़िश

अदू जो हैं हमारे वो तेरे पासबाँ क्यों

 

मकीनेदिलबिरिश्ता-ओ-दश्तेगमनशीं था

वफ़ातेकैस पे फिर न हो ख़ुश गुलसितां क्यों

 

जो मुझसे निस्बतों की सभी बातें हैं झूठीं

सुनाते हो मुझे तुम तुम्हारी दास्ताँ…

Continue

Posted on October 7, 2016 at 10:09pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४५

है ख़ुदी जब तक बनी खुद्दारियाँ जातीं नहीं 

हो अना जब सामने दुश्वारियां जातीं नहीं

मुश्किलें हैं कोह की मानिंद गिर्दोपेश में 

ज़िंदगी की ज़िल्लतोलाचारियाँ जातीं नहीं

हूँ फसां मैं रोज़गारी फ़िक्र के गिर्दाब में 

सख्त हैं हालात जिम्मेदारियाँ जातीं नहीं

दिल हुआ मजरूह जिसकी इक नज़र से उम्र भर 

उस फ़ुसूनेनाज़ की आजारियाँ जातीं नहीं

वो नहीं मुझको मिला सौगात लेकिन दे गया 

खू-ए-सोज़िश हो गई गमख्वारियाँ जातीं…

Continue

Posted on October 4, 2016 at 5:50pm — 10 Comments

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At 2:14am on July 31, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें.

At 3:21pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

जी आप कुछ कुछ ठीक कह रहे हैं त्रुटी वश ये न की जगह ना लिखा गया 'केवल दो किलोमीटर पीछे हुए एक्सीडेंट का वो बेचारा पेशेंट साइकिल वाला था न  और ये कार वाला, क्या ये  अंतर मैं नहीं समझती'----ये इस तरह लिखा था मेरी मूल लघु कथा में ----हम दैनिक बोलचाल में न शब्द का इस्तेमाल ? के साथ करते हैं  इसमें न के बाद ? मार्क लगाना भूल गई बहुत बहुत आभार इस और ध्यान दिलाने के लिए 

At 12:30pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

सादर आभार तहे दिल से शुक्रिया ग़ज़ल आपको पसंद आई राज़ जी 

At 5:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

welcome sir

At 2:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

aapki rachnaen behatreen hain

At 4:38pm on October 8, 2012, नादिर ख़ान said…

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद

तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई

बहुत ही उम्दा गज़ल है राज़ भाई  बहुत ख़ूब

At 11:45am on September 21, 2012, प्रमेन्द्र डाबरे said…

राज़ साहब आपने मुझ नाचीज़ की भी रचना पढ़ी मैं धन्य हो गया, आपकी दाद मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है और कुछ और अच्छा लिखने की प्रेरणा अब मुझे मिलती रहेगी.... आपका तलबगार  प्रमेन्द्र डाबरे

At 10:24am on September 21, 2012, लोकेश सिंह said…

राज भाई तहे दिल से मेरा शुकराना स्वीकार करे ,आपके स्नेहिल वचन मुझे और अच्छे काव्य की रचना की प्रेरणा देंगे ,सराहना के लिए बहुत -बहुत साधुवाद ......लोकेश सिंह

At 12:37am on June 27, 2012, Albela Khatri said…

राज़ साहेब, आप नये हैं ये मुझे मालूम नहीं था क्योंकि मैं ख़ुद यहाँ नया हूँ......हा हा हा हा ....लेकिन आपसे पहली मुलाक़ात  अच्छी रही........मुझे  इस महफ़िल में बहुत प्यार और  मुहब्बत से नवाज़ा गया है और आप भी  यहाँ के दोस्ताना माहौल  में रस से सराबोर हो जायेंगे . ऐसा मेरा यक़ीन है

___ओ बी ओ  है ही ऐसी जगह.................आपका  तहेदिल से इस्तेकबाल है भाई साहेब !

At 12:24am on June 27, 2012, Albela Khatri said…

वाह वाह वाह वाह
निहाल कर दिया  साहेब
___जनाब राज़ नवादवी जी.........गज़ब है !

___मुबारक  हो ये उम्दा शाइरी........

 
 
 

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