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राज़ नवादवी
  • Male
  • Bhopal, Madhya Pradesh
  • India
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Samar kabeer commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०
"जी हाँ ।"
Jul 8
राज़ नवादवी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post न कोई तिश्नगी होती न कोई हादसा होता
"जी बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नवीन मणि जी. मेरी जानकारी के हिसाब से संबोधन में अनुस्वार नहीं लगता- "यारों का कहना है"//// यारो, मुझे कहना है". मंच के सुधिजन आगे प्रकाश डालेंगे. सादर. "
Jul 8
राज़ नवादवी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post न कोई तिश्नगी होती न कोई हादसा होता
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी,आदाब. अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें.  'परिंदा उड़ के आ जाता तुम्हारी बाग में लेकिन ', बाग़ को पुल्लिंग होना चाहिए.  'कोई इंशान मर्जी से नहीं अब बेवफ़ा होता' में इंसान होना…"
Jul 8
राज़ नवादवी commented on Neelam Upadhyaya's blog post जीवन यथार्थ
"आदरणीया  नीलम उपाध्याय जी, सुन्दर रचना की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें. सादर. "
Jul 8
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०
"आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब. ग़ज़ल में आपकी शिरकत का तहेदिल से शुक्रिया. आपकी इस्लाह का ह्रदय से आभार. आपके कहे के मुताबिक ये शेर हटा दूँ?  कहीं कुछ नया हो, कहीं कुछ अलग तू हस्ती ये लिक्खी लिखाई न दे 8 है कारेमजाज़ी में शिरकत तेरी गुनहगार है…"
Jul 8
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०
"आदरणीया नीलम उपाध्याय जी, आपका ह्रदय से आभार, आपकी सुखन नवाज़ी का दिल से शुक्रिया. "
Jul 7
Neelam Upadhyaya commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०
"आदरणीय राज नवादवी साहब , नमस्कार । बढ़िया ग़ज़ल की पेशकश के लिए मुबारकबाद । "
Jul 6
Samar kabeer commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०
"जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,बशीर बद्र साहिब की ज़मीन में अच्छी ग़ज़ल कही है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। कुछ अशआर के दोनों मिसरों में 'तू' शब्द खटकता है, उनमें एक मिसरे से 'तू' शब्द निकालने का प्रयास करें । छटे शेर में…"
Jul 6
राज़ नवादवी commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post रहमत में हरम मागा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी जी, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए बधाई क़ुबूल करें. सादर. "
Jul 6
राज़ नवादवी commented on Samar kabeer's blog post 'ग़ालिब' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2'
"आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब! उस्ताद की ग़ज़ल उस्तादों जैसी, बहुत ख़ूब जनाबे आली. दिली मुबारकबाद. "
Jul 6
राज़ नवादवी posted a blog post

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०

जनाब बशीर बद्र साहब की ग़ज़ल "ख़ुदा मुझको ऐसी ख़ुदाई न दे" की ज़मीन पे लिखी ये ग़ज़ल. 122 122 122 12 ख़ुदा ग़र तू ग़म से रिहाई न दे तो साँसों की मीठी दवाई न दे भले अपनी सारी ख़ुदाई न दे किसी को भी माँ की जुदाई न देमैं मर जाऊँ मिट जाऊँ हो जाऊँ ख़ाक़ मगर मुझको ख़ू ए गदाई न दे तू रख सब असागिर को दुख से अलग तू कोई भी ग़म इज्तिमाई न दे निसाबे अमल से तू कर सब हिसाब तू ज़िल्लत कोई बिन बुलाई न दे तू ख़ुद भी है मख़फ़ी हमारी नज़र हैं नाबीने हम रहनुमाई न दे शबे वस्ल ग़र तू दे सकता नहीं ख्यालों में उनसे जुदाई न दे…See More
Jul 6
राज़ नवादवी commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (जानेमन मुझको मुहब्बत का ज़माना याद है)
"आदरणीय तस्दीक अहमद साहब, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए ढेरों बधाइयां. सादर. "
Jul 5
राज़ नवादवी commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कैसे अजब हैं लोग जो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय लक्षमण धामी साहब. सादर. "
Jul 5
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५९
"आपका ह्रदय से आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी. सादर "
Jul 5
राज़ नवादवी posted blog posts
Jul 5
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५८
"आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया, सादर. "
Jul 4

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Nawada, Bihar
Profession
Education, Training, and Community Development. Hybrid Value Chain Entrepreneur (HVCE) at Ashoka Innovators for the Public
About me
Main shayar to nahin, magar ai zindgee, jab se tum ko samjha, shayari aa gai.

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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०

जनाब बशीर बद्र साहब की ग़ज़ल "ख़ुदा मुझको ऐसी ख़ुदाई न दे" की ज़मीन पे लिखी ये ग़ज़ल. 

122 122 122 12



ख़ुदा ग़र तू ग़म से रिहाई न दे

तो साँसों की मीठी दवाई न दे



भले अपनी सारी ख़ुदाई न दे

किसी को भी माँ की जुदाई न दे

मैं मर जाऊँ मिट जाऊँ हो जाऊँ ख़ाक़

मगर मुझको ख़ू ए गदाई न दे



तू रख सब असागिर को दुख से अलग

तू कोई भी…

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Posted on July 5, 2018 at 10:30am — 5 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५९

2122 2122 2122 212

जो नहीं मँझधार में थे, साहिलों के पास थे

मुद्दतों से पाँव उनके दलदलों के पास थे



जीत के सारे हुनर तो हौसलों के पास थे

पैतरे ही थे फ़क़त जो बुज़दिलों के पास थे



मैं कहाँ चूका बता इस ज़िंदगी की दौड़ में

लोग जो दौड़े नहीं वो मंज़िलों के पास थे



बर्क़ ने कुछ न बिगाड़ा जो थे ज़ेरे आसमाँ

वो परिंदे मर गये जो…

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Posted on July 1, 2018 at 6:30pm — 9 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५८

1212 1212 1212 1212



दिलों की आग बुझ गई, जिगर में अब धुआँ नहीं

कि तुम भी अब जवाँ नहीं, कि हम भी अब जवाँ नहीं



सितारे गुम हुए सभी, रुपहली कहकशाँ नहीं

ज़मीने दिल पे अब तेरी वफ़ा का आसमाँ नहीं



सफ़र भी ज़िंदगानी का हुआ कभी अयाँ नहीं

जहाँ पे रहगुज़र मिली वहाँ पे कारवाँ नहीं



वो मुझसे बोलता नहीं, वो मुझसे सरगिराँ नहीं

वफ़ा की आग क्या…

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Posted on July 1, 2018 at 6:00pm — 16 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४६ (सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है)

स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता "You Start Dying Slowly" के हिन्दी अनुवाद से प्रेरित

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

-----------------------------------------

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

आप चाहे तुच्छ हों या हों आप महान

आप चाहे पत्थर हों, पेड़ हों

पशु हों, आदमी हों, या कोई साहिबे जहान

आप चाहे बुलंद हों या जोशे नातवान

 

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

आप चाहे विनीत हों या कोई दहकता…

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Posted on October 10, 2017 at 3:00pm — 10 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 9:54pm on August 28, 2017, Samar kabeer said…
जनाब राज़ साहिब,कृपया फोन कर लें,मुझे ओबीओ पर चेट करना नहीं आता ।
At 2:14am on July 31, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें.

At 3:21pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

जी आप कुछ कुछ ठीक कह रहे हैं त्रुटी वश ये न की जगह ना लिखा गया 'केवल दो किलोमीटर पीछे हुए एक्सीडेंट का वो बेचारा पेशेंट साइकिल वाला था न  और ये कार वाला, क्या ये  अंतर मैं नहीं समझती'----ये इस तरह लिखा था मेरी मूल लघु कथा में ----हम दैनिक बोलचाल में न शब्द का इस्तेमाल ? के साथ करते हैं  इसमें न के बाद ? मार्क लगाना भूल गई बहुत बहुत आभार इस और ध्यान दिलाने के लिए 

At 12:30pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

सादर आभार तहे दिल से शुक्रिया ग़ज़ल आपको पसंद आई राज़ जी 

At 5:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

welcome sir

At 2:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

aapki rachnaen behatreen hain

At 4:38pm on October 8, 2012, नादिर ख़ान said…

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद

तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई

बहुत ही उम्दा गज़ल है राज़ भाई  बहुत ख़ूब

At 11:45am on September 21, 2012, प्रमेन्द्र डाबरे said…

राज़ साहब आपने मुझ नाचीज़ की भी रचना पढ़ी मैं धन्य हो गया, आपकी दाद मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है और कुछ और अच्छा लिखने की प्रेरणा अब मुझे मिलती रहेगी.... आपका तलबगार  प्रमेन्द्र डाबरे

At 10:24am on September 21, 2012, लोकेश सिंह said…

राज भाई तहे दिल से मेरा शुकराना स्वीकार करे ,आपके स्नेहिल वचन मुझे और अच्छे काव्य की रचना की प्रेरणा देंगे ,सराहना के लिए बहुत -बहुत साधुवाद ......लोकेश सिंह

At 12:37am on June 27, 2012, Albela Khatri said…

राज़ साहेब, आप नये हैं ये मुझे मालूम नहीं था क्योंकि मैं ख़ुद यहाँ नया हूँ......हा हा हा हा ....लेकिन आपसे पहली मुलाक़ात  अच्छी रही........मुझे  इस महफ़िल में बहुत प्यार और  मुहब्बत से नवाज़ा गया है और आप भी  यहाँ के दोस्ताना माहौल  में रस से सराबोर हो जायेंगे . ऐसा मेरा यक़ीन है

___ओ बी ओ  है ही ऐसी जगह.................आपका  तहेदिल से इस्तेकबाल है भाई साहेब !

 
 
 

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