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Neeraj Mishra "प्रेम"
  • 27, Male
  • Lucknow Uttar Pradesh
  • India
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Neeraj Mishra "प्रेम"'s Discussions

कविता के भाव पर व्याकरण की तलवार क्यों
79 Replies

कविता हमारे ह्रदय से सहज ही फूटती है, ये तो आवाज़ है दिल की ये तो गीत है धडकनों का एक बार जो लिख गया सो लिख गया ह्रदय के सहज भाव से ह्रदय क्या जाने व्याकरण दिल नही देखता वज्न ...वज्न तो दिमाग देखता है…Continue

Started this discussion. Last reply by Dr Ashutosh Mishra Sep 4, 2013.

 

Neeraj Mishra "प्रेम"'s Page

Profile Information

Gender
Male
City State
Lucknow U.P.
Native Place
Lucknow
Profession
Auther
About me
तुम्हारी बन्दगी में मै नयी हर बात करता हूँ , तो दुनिया के पुराने लोग मुझसे रूठ जाते हैं । मै तेरी थामकर बाहें जो तेरे साथ चलता हूँ , मेरे हाथों से उनके हाथ अक्सर छूट जाते हैं । मोहब्बत हद से आगे जब गुज़र जाती है ऐ दिलबर । हमारे सामने हमको ही ले आती है ऐ दिलबर । के खुद से रूबरू होकर करें औरों का ही सिजदा , किनारे पर भी आकर वो मुसाफिर डूब जाते हैं । ना तारीफों के पुल बाँधू न तेरे हक़ में ताली दूँ । मेरा दिल आज कहता है तुझे जी भर के गाली दूँ । तोड़ दूंगा मै सारे भाव जो दिल में हैं तेरी खातिर , तोड़ना ही इन्हें वाजिब अगर ये टूट जाते हैं । मिटाकर आज रख दूंगा मै हम दोनों की ये हस्ती । या तू रह जाएगा बाकी , या मै रह जाऊंगा बाकी । एक ही शै जुदा होकर नही रह सकते हम दोनों , के मिलकर बूँद सागर भी हो एक ही रूप जाते हैं |

कभी बैठे बैठे आँखों में भर आये आंसू जाने क्यूँ | 

कभी महकी हवा से घुलने लगी साँसों में खुशबू जाने क्यूँ | 

कुछ बात अकेले पन में है , कोई गीत छिड़ा जीवन में है |

अस्तित्व के मौन तरानों का संगीत मेरी धड़कन में है | 

एहसास ये कुछ अनजाना सा, अब हर लम्हा दीवाना सा | 

पल पल में बहारें ले आये ये मौसम कुछ मस्ताना सा | 

ऐसे में फिर हो जाता है ये दिल बेकाबू जाने क्यूँ | 

 कभी बैठे बैठे आँखों में भर आये आंसू जाने क्यूँ |

 दिल कहता है पागल हो जाऊं, इस बहती हवा में उड़ जाऊं |

ज्यूँ नदियाँ मिलती सागर से ऐसी ही तुझ से मिल जाऊं | 

अब हर दीवार गिरा दूँ मै,सब एक में आज मिला लूँ मै | 

यूँ फैलाऊं बाहें अपनी सारा अस्तित्व समा लूँ मै | 

इन बहती हवा के झोकों में कोई जाता है छू जाने क्यूँ |

नीरज......

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Neeraj Mishra "प्रेम"'s Blog

कविता/नीरज

तुम भावों की मधुर मधुर स्पन्दन सी ।

तुम तारों के झिलमिल झिलमिल आंगन सी ।

तुम तरुओं के खिलते नित नव पल्लव सी ।

तुम माँ की गोदी में शिशु के करलव सी ।



तुम मंदिर में देव को पूजा अर्पण सी ।

तुम पानी में चंद्रदेव के दर्पण सी ।

तुम प्रातः में विहगों के मधु गुंजन सी ।

तुम मृगया की मन हर लेती चितवन सी ।



तुम उपवन में मग्न मयूरी नर्तन सी ।

तुम प्रेमी के प्रमुदित प्रणय निवेदन सी ।

तुम रमणी की कोमल नव तरुणाई सी ।

तुम गर्मी की साँझ मंद पुरवाई… Continue

Posted on June 23, 2016 at 12:21am — 2 Comments

ग़जल/नीरज

2222  2222  2222  2222

दिन रात भरी तनहाई में इक उम्र गुज़ारी भी तो है ।

पाकर तुमको एहसास हुआ इक चीज हमारी भी तो है ।

हम बैठ तसव्वुर में तेरे बस ख्वाब नहीं देखा करते,

तेरी सूरत इन आँखों से इस दिल में उतारी भी तो है…

Continue

Posted on June 17, 2016 at 10:00am — 12 Comments

हमने किस किस से न पूछा/ ग़ज़ल

2122  2122   2122  212

हमने किस किस से न पूछा ज़िन्दगी तेरा पता ।

हमको ले आया ग़मों में ऐ ख़ुशी तेरा पता ।

ऐ मुहब्बत दूर मुझसे अब न तू जा पाएगी ,

दे रहा है अब मुझे ये दर्द भी तेरा पता ।

हाथों में  दीपक बुझा था दूर तारे थे बहुत ,

जुगनुओं से हमने पूछा रौशनी तेरा पता ।

माना ढलती उम्र में चाहत भी तेरी ढल गयी ,

ढूंढता है इक दीवाना आज भी तेरा पता ।

उनसे नज़रें क्या मिलीं दिल शायराना हो गया ,

आशिकी…

Continue

Posted on January 14, 2016 at 2:00pm — 17 Comments

इक दुआ ~ गज़ल

212 212 212 2

इक दुआ हमने उम्र भर माँगी ।
अपने दिल मेँ तेरी बसर माँगी ।

पंछी नदियाँ जमीँ फलक तारे ,
हमने सबसे तेरी खबर माँगी ।

बात काँटोँ ने क्या गलत कर दी ,
इक कली गर जो शाख पर माँगी ।

हर तरफ तू ही तू नजर आये ,
देने वाले से वो नजर माँगी ।

कोई पूछे जो गर सफर अपना ,
तेरी जानिब मेँ हर डगर माँगी ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज मिश्रा

Posted on February 23, 2015 at 12:36pm — 10 Comments

Comment Wall (5 comments)

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At 2:23pm on December 15, 2014, Usha Pandey said…
नीरज जी ये , तो मेरा सौभाग्य है की आप लोगों के बीच स्थान मिला,
इसके लिए आभारी हूँ आपकी
At 12:15pm on August 19, 2013,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

प्रभावित होना एक बात है, लेकिन प्रोफ़ाइल फोटो किसी व्यक्ति की परिचयात्मकता की पहली कड़ी होती है. विश्वास है, तदनुरूप शीघ्र प्रयास करेंगे.

सादर

At 10:04pm on August 16, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
said…

वाह नीरज भाई , क्या बात है

भले ही दुनियादारी के बड़े नादान पंछी हम ,

मगर दिल के हिसाबों में समझ अपनी सयानी है ।

At 1:45pm on August 11, 2013, neeraj sanadhya said…

आभार नीरज की ओर से नीरज को 

At 1:02am on July 2, 2013, जितेन्द्र पस्टारिया said…
"तहे दिल से शुक्रिया...."
 
 
 

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