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दर्द में ऐसे जलता है दिल ।
मोम जैसे पिघलता है दिल ।

यादों में ही रहे बेकरार,
यादों में ही बहलता है दिल ।

दर बदर ठोकरें मिल रहीं,
पर भला कब सँभलता है दिल ।

कुछ कभी तो कभी है ये कुछ ,
लमहा लमहा बदलता है दिल ।

तनहा तनहा किसी शाम सा,
होके वीरान ढलता है दिल ।

प्यार का कोई दरिया सा है,
जिसमें हर वक्त घुलता है दिल ।

नीरज मिश्रा 

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 617

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2018 at 7:00pm

बड़े अच्छे भाव हुए आदरणीय..बाकी आदरणीय तस्दीक जी बता ही चुके हैं...

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 8:22pm

जनाब नीरज साहिब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है , कोशिश करते रहिए ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ |
शेर 2 के मिसरों में लय बाधित हो रही है | यूँ कर सकते हैं " बे क़रारी बढ़े याद से -याद से ही बहलता है दिल "
शेर 3 उला यूँ करसकते हैं |"दर बदर खा रहा ठोकरें "
शेर 4 उला यूँ करलें |"सामने प्यार होता है जब "
शेर5 शेर 6 के मिसरों में रब्त की कमी है | यूँ करलें |"कोई शायद ख़यालों में है -यूँ न उसका मचलता है दिल "
ज़ख़्म अपने लगाते हैं जब ---अपने अंदर ही घुलता है दिल |

Comment by Neeraj Nishchal on February 14, 2018 at 6:27pm

बहुत बहुत हार्दिक आभार आदरणीय राम अवध जी

Comment by Neeraj Nishchal on February 14, 2018 at 6:27pm

बहुत बहुत हार्दिक आभार आदरणीय शेख शहजाद जी

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 14, 2018 at 5:39pm

खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 14, 2018 at 9:58am

बहुत बढ़िया पेशकश। हार्दिक बधाई आदरणीय नीरज मिश्रा ' प्रेम' जी। 

कृपया ध्यान दे...

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