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Sheikh Shahzad Usmani
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Ravi Prabhakar commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"बढ़ीया लघुकथा है उस्‍मानी भाई जी । / "दुनिया के साथ चलने में नहीं, दुनिया के मर्ज़ पालने में हर्ज़ है, समझे!"/ बहुत तीक्ष्‍ण पंक्‍ित है । सादर शुभकामनाएं ।"
15 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"मुहतरम जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब,लघुकथा के ज़रिए आपने अच्छी सीख दी है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं"
yesterday
Samar kabeer commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,संयुक्त परिवार से अलगाव और पश्चिमी संस्कारों के प्रति झुकाव की पृष्ठभूमि पर लिखी बेहतरीन लघुकथा । कथानक में तागज़ी , नयापन ,जिज्ञासा का संचार करने में सक्षम ,संवादों में स्वभाविकता और सफल लघुकथा के मानकों पर खरी…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani posted a blog post

दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भाई, मैंने तो अब सोच लिया है कि अब नहीं रहना संयुक्त परिवार में!""अबे, तुम्हारी बीवी की ये पहली प्रेगनेंसी है। कुछ ही महीनों में डिलेवरी होगी। यही तो सही समय है सबके साथ रहने का!""साथ रहने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन हर रोज़ की टोका-टाकी और दकियानूसी से तंग आ चुका हूं। मैं नहीं चाहता कि गर्भ में पल रहे बच्चे को शुरू से ही धार्मिक चीज़ें सुनवाई जायें। रीति-रिवाज़ों की छाप उस पर पड़े!""क्या तुम्हारी बीवी भी!""कहां यार, वह तो भारतीय नारी है न।! धार्मिक ग्रंथों में घुसी रहती है या धार्मिक फिल्में…See More
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani commented on KALPANA BHATT's blog post पक्का घड़ा ( लघुकथा )
"बेहतरीन कथानक पर बढ़िया प्रस्तुति के लिए सादर हार्दिक बधाई आपको आदरणीय कल्पना भट्ट जी। अंतिम पांच-सात पंक्तियों के स्थान पर कुछ बेहतरीन विचारोत्तेजक समापन भी हो सकता है आपकी सधी हुई लेखनी से। सादर।"
yesterday
Mahendra Kumar commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post मम्मी तो ऐसी नहीं न (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"बाल मन को केन्द्रित कर संतान और और उससे जुड़े मुद्दों को बहुत ही ख़ूबसूरती से बयां किया है आपने आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. मुझे लगता है कि आ. कल्पना जी ने जो प्रश्न किया है उसका उत्तर आपके इन शब्दों में "दादा जी स्तब्ध रह गए" मिल जाता है.…"
Thursday
KALPANA BHATT commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post प्रासंगिक अस्तित्व (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"सन्देश परक कथा हुई है आदरणीय शहजाद भाई | हार्दिक बधाई |"
Jul 16
Tasdiq Ahmed Khan commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post मम्मी तो ऐसी नहीं न (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"मुहतरम जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब,बहुत अच्छी लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें"
Jul 16
Tasdiq Ahmed Khan commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"मुहतरम जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब,सीख देती बहुत सुंदर लघुकथा हुई है,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें"
Jul 16
Mohammed Arif commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, लघुकथा के सारे मापदंडों पर खरी लघुकथा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 16
Hari Prakash Dubey commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post मम्मी तो ऐसी नहीं न (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani   सुन्दर रचना है , आदरणीया कल्पना जी की बात भी जायज लग रही है ,बाकी सुन्दर ,हार्दिक बधाई ! सादर "
Jul 16
Hari Prakash Dubey commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"बहुत बढ़िया , वाकई प्रकृति से बड़ी कोई पुस्तक नहीं है ,इस रचना पर बधाई आपको आदरणीय  Sheikh Shahzad Usmani साहब ! सादर "
Jul 16
KALPANA BHATT commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post मम्मी तो ऐसी नहीं न (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"कथा बढ़िया है आदरणीय शहजाद भाई पर एक जगह मुझे खटक रहा है एक संवाद " तो क्या धरती......." क्या इतना गूढ़ प्रश्न एक बच्ची कर सकती है ?  सादर |"
Jul 16
KALPANA BHATT commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"अच्छी कथा हुई है आदरणीय शहजाद जी | हार्दिक बधाई "
Jul 16
Samar kabeer commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 16

Profile Information

Gender
Male
City State
Shivpuri M.P.
Native Place
Shivpuri
Profession
Radio Announcer
About me
A Private School- teacher, Freelancer and a Casual Radio Announcer. Simlple living, high thinking, fond of reading and writing.

Sheikh Shahzad Usmani's Blog

दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भाई, मैंने तो अब सोच लिया है कि अब नहीं रहना संयुक्त परिवार में!"



"अबे, तुम्हारी बीवी की ये पहली प्रेगनेंसी है। कुछ ही महीनों में डिलेवरी होगी। यही तो सही समय है सबके साथ रहने का!"



"साथ रहने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन हर रोज़ की टोका-टाकी और दकियानूसी से तंग आ चुका हूं। मैं नहीं चाहता कि गर्भ में पल रहे बच्चे को शुरू से ही धार्मिक चीज़ें सुनवाई जायें। रीति-रिवाज़ों की छाप उस पर पड़े!"



"क्या तुम्हारी बीवी भी!"



"कहां यार, वह तो भारतीय नारी है न।!… Continue

Posted on July 23, 2017 at 10:47am — 4 Comments

बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

वे दोनों अपने आप को उच्च शिक्षित, व्यवहारिक, और मानवता के पैरोकार साबित करने पर तुले हुए थे। बहस का कोई अंत नहीं था। एक-दूसरे से सहमत होना मुश्किल था। अंतिम प्रयास करते हुए उनमें से एक बोला- "मैंने सभी धार्मिक ग्रंथों के साथ ही मानव समाज से संबंधित सभी विषयों पर पर्याप्त अध्ययन और चिंतन-मनन किया है। निष्कर्षत: अब मैं मानवता के मार्ग पर चलना चाहता हूं।"



"तो क्या अब तक दानव बनकर जी रहे थे!" दूसरे ने लगभग चीखते हुए कहा।



"नहीं, ढोंगी मानवता की चादर ओढ़े हुए दानवता की ढाल लिए… Continue

Posted on July 16, 2017 at 9:00am — 5 Comments

मम्मी तो ऐसी नहीं न (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कुसुम अपने चाचा-चाची के अपने प्रति बदले हुए रवैये से बहुत हैरान थी। वह अपनी परेशानी किसी को भले ही नहीं बता पा रही थी, लेकिन कुछ दिनों से उसके दादा जी बहुत कुछ समझ रहे थे। जब भी उन्हें समय मिलता, वे उसे कुछ न कुछ समझाने-सिखाने की कोशिश करते रहते थे। इसी क्रम में कुसुम द्वारा रोपित बीज से उगे नन्हे पौधे को गमले में से उखाड़कर उसके हाथों में सौंप कर आज उन्होंने कहा - " कुसुम बिटिया, इस नन्हें पौधे को अब धरती में यहां अपन रोपित कर देंगे और खूब खाद, पानी देकर इसकी सेवा करेंगे, तो फ़िर यह एक बड़ा पेड़… Continue

Posted on July 15, 2017 at 2:03am — 5 Comments

नई सदी का मर्द (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"देखो तो, कैसा इतरा-इतरा कर नाच रहा है!"

"हाँ, उस मोरनी को देखकर!"

"नहीं, हमें देखकर इतरा रहा है!" सारस ने अपनी टांगों को ज़मीन पर आड़े-तिरछे पटकतेे हुए हंस से कहा।



"बस कुछ ही महीने तो सुंदर दिखता है, फिर भी इंसानों के दिलों में राज करता है!" यह कहते हुए ईर्ष्यालू हँस ने नदी में गोता सा लगाया।



"हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती, यह जानते हुए भी!" हंस की बात पर सारस ने कटाक्ष किया।



"आकर्षक तो हम भी हैं, लेकिन न तो हमारा मेकअप इस तरह होता है, न ही हमें ऐसा… Continue

Posted on July 9, 2017 at 10:50am — 5 Comments

Comment Wall (10 comments)

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At 10:23am on January 8, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…
आदरणीय शेख भाई जी आपके मित्रों की सूची में खुद को शामिल पाकर मैं सुखद अनुभूति कर रहा हूँ आपकी लघु कथाएं इस मंच पर मेरे बिशेष आकर्षण का केंद्र है आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ आपकी कलम सृजन के नए आयाम स्थापित करती रहे ऐसी अपनी शुभकामनाओं के साथ सादर
At 8:23pm on August 5, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ  आदरणीय उस्मानी जी  ,आपका रचनाकर्म हर दिन नई बुलंदियां छुएँ ,ये कामना करती हूँ 

At 7:30am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
श्रद्धेय शेख शहजाद उस्मानी साहब ये सब तो आप जैसे मित्रों के सहयोग से ही हुआ है और आशा करता हूं कि भविष्य में भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे। हृदय की गहराईयों से धन्यवाद ।
At 8:42am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

आभार आपका आ.शेख उस्मानी सर जी,अभी जानकारी  पूरी नहीं है ,तो आपको जवाब देने में देर हो गई.पुनः आभार आपका .

At 2:11pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

मित्रता के लिए आभार 

At 8:41am on November 18, 2015, pratibha pande said…

हार्दिक आभार आपका आदरणीय 

At 9:27am on November 4, 2015, kanta roy said…

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर

ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था---- 

मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का ये शेर आज आपके लिए
असीम शुभकामनाएँ आपको आदरणीय शहजाद जी।

 

At 3:47pm on October 17, 2015, Sheikh Shahzad Usmani said…
आदरणीय Er. Ganesh Jee "Bagi" जी सूचना अनुसार वांछित जानकारी एडमिन की ई-मेल परआज प्रेषित कर दी है ।सादर सधन्यवाद
At 11:17pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी लघुकथा "मुखाग्नि" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 11:22pm on August 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

स्वागत अभिनन्दन 

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