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Mirza Hafiz Baig
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Welcome, Mirza Hafiz Baig!

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Neelam Upadhyaya commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"आदरणीय मिर्ज़ा हाफिज बेग जी, अच्छी  लघुकथा की प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें। "
Nov 5, 2018
Mohammed Arif commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"आदरणीय मिर्ज़ा हाफिज़ बेग जी आदाब,                           बहुत भी कटाक्षपूर्ण रचना । बाक़ी गुणीजन कह ही चुके हैं , संज्ञान लें । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 4, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"शुक्रिया, मोहतरम जनाब समर कबीर साहब। आपकी हौसला अफजाई का हमेशा मुन्तज़िर रहता हूं।  भाई तेजवीर सिंह जी आपकी कीमती सलाह के लिए शुक्रगुज़ार हूं। मुझे लगता है कि अंतिम पंक्ति, कमज़ोर लोगों के प्रति प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता को अभिव्यक्त करती…"
Nov 2, 2018
Samar kabeer commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"जनाब मिर्ज़ा हफ़ीज़ बैग साहिब आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 2, 2018
TEJ VEER SINGH commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"हार्दिक बधाई आदरणीय मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग जी। बेहतरीन कटाक्ष पूर्ण लघुकथा।मेरी निजी राय है कि इसमें अंतिम पंक्ति अनावश्यक लग रही है। सादर।"
Nov 2, 2018
Mirza Hafiz Baig posted a blog post

बैसाखियाँ (लघुकथा)

बैसाखियाँ वे अचानक आसमान से टपके या ज़मीन से निकले, पता ही न चला। देश के उन वीर सपूतों के नारे यदि देश के दुश्मन सुन लें तो हमारी ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत ही न करें। लेकिन इस वक्त उनकी बहादुरी और देशभक्ति का शिकार था वह जो, राष्ट्रगान के समय खड़ा नहीं हुआ था। उसे उसकी सज़ा तो मिलनी ही थी।उसे जब होश आया तो वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मुश्किल से सांस ले रहा था। उसका एक हाथ हथकड़ी के सहारे पलंग से जकड़ा हुआ था, और बाहर एक पुलिस का सिपाही पहरे पर था कि देश का मुजरिम कहीं भाग न जाये। देशद्रोह…See More
Nov 1, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on TEJ VEER SINGH's blog post यू टू  (you too ) - लघुकथा -
"भाई तेजवीर सिंह जी, वाकई कहाँई कहने के बेहतरीन तरीका। अच्छा शिल्प; सफल कार्य। बहुत बहुत बधाईयाँ।"
Oct 21, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on विनय कुमार's blog post परछाईयों का भय - लघुकथा
"विनय कुमार जी, सामयिक विषय उठाती लघुकथा हेतु बधाई।"
Oct 21, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post 'कौन बदल रहा है?' (लघुकथा)
"शहज़ाद उस्मानी साहब, आपने सटीक वार किया। मज़दूर, किसान, गरीब, बेसहारा, बेरोज़गार, विद्यार्थी वगैरह की बात करना वैसे भी आज कल साहित्य के क्षेत्र मे दुर्लभ हो चला है। आपने बात की; यह अपने आप मे आपका बड़प्पन है। शुक्रिया और बधाई। "
Oct 21, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on TEJ VEER SINGH's blog post माँ  - लघुकथा -
"भाई तेजवीर सिंह जी, बेहतरीन लघुकथा के लिये बधाई। आपने एकाधिक पंचेज़ का बखूबी इस्तेमाल किया जैसे- "अधिकतर अंधभक्त .... .... होता है।", "बेटी, ... ... बढ़्कर है।" या, "बेटी, ... ... एक भरोसा है।" आदि। "बेटी, ... ... एक…"
Oct 21, 2018
Mirza Hafiz Baig posted videos
Sep 28, 2018
Neelam Upadhyaya commented on Mirza Hafiz Baig's blog post सुबह का इंतज़ार (लघुकथा)
" आदरणीय मिर्ज़ा हाफिज बेग जी, नमस्कार।  आज की ज्वलंत समस्या - बेरोजगारी पर कटाक्ष करती बहुत ही उम्दा लघुकथा।   हार्दिक बधाई स्वीकार करें। "
Sep 17, 2018
Nita Kasar commented on Mirza Hafiz Baig's blog post सुबह का इंतज़ार (लघुकथा)
" आपने रोज़गार से जुड़ी समस्या पर कथा जरिये प्रकाश डाला है जीवन से जुड़े चक्रव्यूह को भेदने के लिये धैर्य व भरोसे का होना ज़रूरी है ।हर रात के बाद सुबह आती है ,बधाई आद० हफ़ीज़ बैग जी ।"
Sep 16, 2018
Samar kabeer commented on Mirza Hafiz Baig's blog post सुबह का इंतज़ार (लघुकथा)
"जनाब हफ़ीज़ बैग साहिब आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Sep 16, 2018
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mirza Hafiz Baig's blog post शर्म हमको मगर नही आती
"बेशर्मों की विवशता और पोल के साथ उनके नेटवर्क बताती  बेहतरीन तंजदार, विचारोत्तेजक रचना के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मिर्ज़ा ह़ाफ़िज़ बेग साहिब!  लघुकथा संदर्भ में मुझे लगा कि कुछ पुनरावृत्तियों/शब्दों को कम किया जा…"
Sep 15, 2018
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बकरे की अम्मा
"अधोलिखित सभी उपयोगी व मार्गदर्शक टिपप्णियां पढ़कर मेरे मन में आज जो सूझा, उसे सांझा कर आप  सुधी पाठकगण की राय और इस्लाह चाहता हूँ : संवाद // “देखिये ! हम किसी पर अत्याचार नहीं करते । हमारी व्यवस्था भी लोकतांत्रिक है । हम हर एक बकरे…"
Sep 15, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai
Native Place
Bhilai
Profession
service at Bhilai Steel Plant (SAIL)

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बैसाखियाँ (लघुकथा)

बैसाखियाँ

 

वे अचानक आसमान से टपके या ज़मीन से निकले, पता ही न चला। देश के उन वीर सपूतों के नारे यदि देश के दुश्मन सुन लें तो हमारी ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत ही न करें। लेकिन इस वक्त उनकी बहादुरी और देशभक्ति का शिकार था वह जो, राष्ट्रगान के समय खड़ा नहीं हुआ था। उसे उसकी सज़ा तो मिलनी ही थी।

उसे जब होश आया तो वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मुश्किल से सांस ले रहा था। उसका एक हाथ हथकड़ी के सहारे पलंग से जकड़ा हुआ था, और बाहर एक पुलिस का सिपाही पहरे पर था कि देश का मुजरिम…

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Posted on October 31, 2018 at 11:23pm — 5 Comments

सुबह का इंतज़ार (लघुकथा)

बहुत अंधेरा है। सुबह बहुत दूर है अभी। अमेरिका से अभी चली हो शायद...

नींद नहीं आती। आये भी कैसे? पेट खाली नहीं, भविष्य तो खाली है। खाली पेट नींद भले आ जाये; लेकिन भविष्य की सुरक्षा की चिंता कब सोने देती है? माँ बाप के लाखों फूंक कर, रात और दिन की तपस्या से व्यवसायिक डिग्री हासिल करने के बाद भी यह साल दो साल के एग्रीमेंट? इससे तो बेहतर था पकोड़े तलता। लेकिन वहां भी पहले से जमे लोग आपका स्वागत नहीं करते... “यहां नहीं, यहां नहीं। हम इतने बरसों से यहां झक मार रहे हैं क्या?”

“एक तो…

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Posted on September 14, 2018 at 11:00am — 6 Comments

दर्द (लघुकथा)

दर्द फिर उठा है। दर्द बहुत तेज़ है। कहते हैं, दर्द का हद से गुज़र जाना दवा है। ऐ दर्द गुज़र जा आज अपनी हदों से तू। ज़रा मैं भी तो देखूँ तेरा दवा हो जाना।

दर्द सचमुच बड़ा बेदर्द है। वह सचमुच बढ़ता जाता है; अपनी हदों को पार करता हुआ। अब नही, अब नही.......। अब बर्दाश्त नही होता। लेकिन दर्द तो बेदर्द है। बढ़ता ही जा रहा है; बर्दाश्त की हदों को पार करता हुआ। अब लगता है, जैसे सिमट आया है एक ही जगह।

दिल!

आह, दर्द-ए-दिल। सिमट आता है एक ही मुकाम पर। लगता है जैसे दिल किसी शिकंजे में कसा…

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Posted on July 23, 2018 at 1:00pm — 7 Comments

युद्ध और साम्राज्य 2

पुराने ज़माने की बात है ।

        दो पङोसी देशों मे आपस सहयोग बढने लगा था । कहते हैं कि जब सहयोग बढता है तो परस्पर विश्वास जनम लेता है और विश्वास से प्रेम । प्रेम से मेल जोल बढता है और मेलजोल से खुशहाली आती है । लेकिन खुशहाल प्रजा भलीभांति शासित नही होती । क्योंकि खुशहाल व्यक्ति सम्पन्न होता है और समपन्न ही शक्तिशाली । फिर शक्तिशाली तो शासन ही करता है , उसे शासित नही किया जा सकता । गडरिया तो भेड़ों  के झुंड को ही चराता है , कभी शेरों के झुंड को चराते किसी को देखा गया है क्या ?…

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Posted on March 20, 2018 at 1:00pm — 6 Comments

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At 6:19am on November 25, 2016, Sheikh Shahzad Usmani said…
आदाब। आप से मुझे लेखन संबंधी बहुत सी बातें सीखने को मिलेंगीं। शुक्रिया सूची में शामिल करने का मौका देने के लिए।
At 10:43pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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