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Mirza Hafiz Baig
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  • Samar kabeer
  • मिथिलेश वामनकर
  • Saurabh Pandey
 

Welcome, Mirza Hafiz Baig!

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Samar kabeer and Mirza Hafiz Baig are now friends
Dec 21, 2016
Mirza Hafiz Baig commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ओ मेरे आकाश !
"आदरणीय डॉ, गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, धन्यवाद । दिल को छू लिया । पिता की कमी पता नही किस उम्र तक खलती रहती है ।"
Dec 5, 2016
Mirza Hafiz Baig replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-20 (विषय: तस्वीर का दूसरा रुख़)
"--जवाब-- धाँय! धाँय!! धाँय!!! जब बंदूकें बोल रही हों तब चुप रहने मे ही भलाई है । सभी बंदी यह समझते थे, लेकिन वह अकेला बोले जारहा था । “… न ये जिहाद है, न जंग है … ये मज़्लूम लोग तुम्हारे मुकाबिल आने वाले सिपाही नही है । इन्हे बंदी…"
Nov 30, 2016
Mirza Hafiz Baig replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-20 (विषय: तस्वीर का दूसरा रुख़)
"आहिस्ता-आहिस्ता , ज़हन, नज़र और अक़्ल की खिड़कियों से पर्दे हटाती हुई लघुकथा रौशनी के लिये रास्ता बनाती है । सुंदर, सुघड़, ताना-बाना, प्रभाव जमाता है । विषय और विवरण मे साहस के दर्शन । ओ बी ओ पर बिल्कुल नया हूं, पहली बार आपकी लघुकथा पर कुछ कह रहा हूं…"
Nov 30, 2016
Mirza Hafiz Baig commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post नमक का विधाता
"आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहब, क्या कहूं ? शब्द नही मिल रहे हैं । आपने मानो गोर्की को सचमुच जीवित ही कर दिया । गोर्की की बहुत पहले पढ़ी गई कहानी 'नमक का दलदल' नज़रों के सामने घूम गई । लेकिन आपने उससे भी खतरनाक हालात से रू-ब-रू कराया…"
Nov 26, 2016
Mirza Hafiz Baig commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बकरे की अम्मा
"आदरणीय भाई सौरभ पंडे जी, मै आपका और भाई मिथिलेश वामनकर जी का विशेष आभारी हूं । आप दोनो की चिंता आपके लगाव को दर्शाती है । आप लोग सच ही कह रहे है, और आपने तो इसे और स्पष्ट किया है । मै इस विषय पर कुछ और प्रबुद्धजनो की कीमती राय जानना चाहता हूं ।…"
Nov 25, 2016
Sheikh Shahzad Usmani left a comment for Mirza Hafiz Baig
"आदाब। आप से मुझे लेखन संबंधी बहुत सी बातें सीखने को मिलेंगीं। शुक्रिया सूची में शामिल करने का मौका देने के लिए।"
Nov 25, 2016

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Mirza Hafiz Baig's blog post शर्म हमको मगर नही आती
"बहुत खूब ! प्रासंगिक प्रस्तुति है, प्रभावी बन पड़ी है. हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय"
Nov 24, 2016

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बकरे की अम्मा
"आदरणीय मिर्ज़ा हाफ़िज़ बेग़ साहब, आपकी प्रस्तुति ने बाँध लिया. वाह्, आदरणीय, वाह ! हार्दिक शुभकामनाएँ !  आदरणीय मिथिलेश जी के सुझाव तथा आपकी प्रतिक्रिया से गुजरना अच्छा लगा. किन्तु, सही कहिए तो आदरणीय मिथिलेश जी के कहे से मैं भी सहमत हूँ. आपका…"
Nov 24, 2016

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Mirza Hafiz Baig's blog post उल्टी गंगा
"बहुत खूब ! प्रसन्न कर दिया आपने आदरणीय मिर्ज़ा हाफ़िज़ बेग़ साहब ! इस प्रवहमान प्रस्तुति पर आपको दिल से दाद दे रहा हूँ .. शुभ-शुभ"
Nov 24, 2016

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Mirza Hafiz Baig's discussion एक क्षुद्र जलधारा की कथा(बाल-कथा) in the group बाल साहित्य
"आपकी कोई पहली रचना पढ़ रहा हूँ, आदरणीय मिर्ज़ा हाफ़िज़ बेग़ साहब. प्रस्तुत कथा किशोरों के लिए है. उन किशोरों के लिए जिनका शब्द-ज्ञान तनिक समृद्ध तो है ही, उन्हें व्यवहार कुशलता और भावनात्मक रूप से दृढ़ होने की सीख देना उचित भी है. लेखक की ऐसी कोई अपेक्षा…"
Nov 24, 2016
Mirza Hafiz Baig replied to योगराज प्रभाकर's discussion लघुकथा चर्चा: सदस्यगण अपने प्रश्न/विचार इस थ्रेड में पोस्ट करें in the group लघुकथा की कक्षा
"भाई योगराज प्रभाकर जी, माफ़ कीजियेगा मै यहां कुछ बातों मे अपनी असहमति दर्ज कराना चाहता हूं । एक- हास्य और व्यंग को लघुकथा मे वर्जित क्यों करना चाहते हैं ? आप कहते हैं हास्य व्यंग के लिये चुटकुले होते है, लेकिन हर हास्य चुतकुला नही होता । और हास्य…"
Nov 24, 2016
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Mirza Hafiz Baig's discussion एक क्षुद्र जलधारा की कथा(बाल-कथा) in the group बाल साहित्य
"बहुत सुन्दर एवं बढ़िया सीख देती हुई बाल कथा आदरणीय बधाई स्वीकारें ।"
Nov 23, 2016
Mirza Hafiz Baig added a discussion to the group बाल साहित्य
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एक क्षुद्र जलधारा की कथा(बाल-कथा)

बाल-कथाएक क्षुद्र जलधारा की कथावह एक क्षुद्र जलधारा ही तो थी, जिसका अस्तित्व आगे जाकर एक पहाड़ी नदी मे विलुप्त हो जाता । लेकिन नदी तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान न था । वैसे भी रास्ते तो हमेशा मुश्किलो भरे ही हुआ करते है; असान तो मंज़िलें हुआ करती है । तो पहाड़ी नदी तक पहुचने का रास्ता बड़ा मुश्किलो से भरा था । रास्ते मे एक जगह वह एक झरने की शक्ल मे ऊपर से नीचे को गिरती थी; और इसी जगह उसे सामना करना पड़ता था उस चट्टान का जो उसका रास्ता रोके खड़ी थी ।अपनी राह चलती वह क्षुद्र जलधारा उस चट्टान पर गिरती…See More
Nov 23, 2016
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Mirza Hafiz Baig's blog post उल्टी गंगा
"बेहतरीन कटाक्ष लिए उत्तम लघु कथा, बहुत खूब ।जनाब मिर्ज़ा हाफ़िज़ बेग जी सादर अब्गिवादन और उम्दा लघु कथा के लिए मेरी दिली बधाई निवेदित है।"
Nov 23, 2016
Mirza Hafiz Baig commented on Mirza Hafiz Baig's blog post उल्टी गंगा
"मुहतरम जनाब समर कबीर साहब, आदाब । आपकी नवाज़िश बहुत मायने रखती है । सच है कि यह लघुकथा हालात-ए-हाजरा पर है । लेकिन पता न था इस हालात-ए-हाजरा की हद इतनी मौख्तसर होगी आज ही देखा, हेलमेट का चालान 200 से 500 होगया है । छुट्टे की छुट्टी …"
Nov 23, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai
Native Place
Bhilai
Profession
service at Bhilai Steel Plant (SAIL)

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उल्टी गंगा

ट्राफ़िक पुलिस को देख उसे आईडिया आया । उसने झट अपनी बाईक किनारे लगाई, हेलमेट सिर से उतारकर बाईक के पीछे लटकाया । उस नोट बंदी के मारे ने, धड़धड़ाते हुये बाईक लेजाकर इन्स्पेक्टर के सामने रोकी ।

“सर, मेरा चालान काटिये मै हेल्मेट नही पहना हूं ।“ वह बोला ।

इन्स्पेक्टर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा । पूछा – “दो सौ रुपये छुट्टे है ?”

उसने इन्कार मे सर हिलाया ।

“ठीक है, जब छुट्टे होंगे तब आना ।“ इन्स्पेक्टर ने कहा ।

“सर, आज ही …”

“ऐसा है बेटा । अपना हेल्मेट सिर पे…

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Posted on November 21, 2016 at 1:09am — 4 Comments

बकरे की अम्मा

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती ।

आखिर वे लोग आ पहुंचे तो बकरे की अम्मा रोने लगी “देखिये आराम से … ज़्यादा तकलीफ़ तो नहीं होगी न … बड़े प्यार से पाला है …”

“आप चिंता न करें हमारे कसाई हाई स्किल्ड हैं …” वे बोले ।

“फ़िर भी …” वह विनती करने लगी ।

“देखिये ! हम किसी पर अत्याचार नहीं करते । हमारी व्यवस्था भी लोकतांत्रिक है । हम हर एक बकरे को वोट का अधिकार देते हैं । हमारे बकरे अपना कसाई खुद चुनते हैं …”

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on November 19, 2016 at 9:06am — 7 Comments

शर्म हमको मगर नही आती

“शर्म नहीं आती ?”

“शर्म क्यों आयेगी… ?” वह बोला- “अपने पैसे से पीता हूं । भीख नहीं मांगता । मुझे क्यों शर्म आयेगी ?“

मैने भिखारी से कहा- “हट्टे कट्टे होकर भीख मांगते हो शर्म नहीं आती ?”

“शर्म क्यों आयेगी भीख मांगता हूं , कोयी चोरी तो नही करता । शर्म तो चोर को आनी चाहिये ।“

मै चोर के पास गया ।

“शर्म नहीं आती ?” मैने कहा ।

“क्यों भाई ? मुझे शर्म क्यों आयेगी ? कोई मुफ़्त मे करता हूं… निछावर देना पड़ता है । कहां से दूंगा ? धंधा है भाई , कमाऊंगा नही तो…

Continue

Posted on November 14, 2016 at 11:28am — 2 Comments

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At 6:19am on November 25, 2016, Sheikh Shahzad Usmani said…
आदाब। आप से मुझे लेखन संबंधी बहुत सी बातें सीखने को मिलेंगीं। शुक्रिया सूची में शामिल करने का मौका देने के लिए।
At 10:43pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

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 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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