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Mirza Hafiz Baig
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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"आद0 MirzaHafizBaig जी सादर अभिवादन। बहुत बढ़िया सन्देश परक लघुकथा लिखी आपने। बधाई स्वीकार कीजिये।"
Mar 17
vijay nikore commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"बहुत ही अच्छी लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई, जनाब मिर्ज़ा हफ़ीज़ बैग साहिब ।"
Mar 16
Nita Kasar commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"हमारा अपना परिवेश होता है,तो परवरिश के प्रति ज़िम्मेदारी भी होती है।उन्है बुलंदियों की ऊँचाई छूने के अवसर मुहैया करना भी परिवार की ज़िम्मेदारी होती है ।सारगर्भित कथा के लिये बधाई आद० मिर्ज़ा हाफ़िज़ बैग जी ।"
Mar 15
Mirza Hafiz Baig commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी जी, आदरणीय तेजवीर सिंह साहब, बहन नीलम उपाध्याय और मोहतरम जनाब समर कबीर साहब मैं दिल से आप सब का शुक्रगुज़ार हूं, आप सब ने इसे पढ़ा और अपनी कीमती राय दी। "
Mar 12
Samar kabeer commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"जनाब मिर्ज़ा हफ़ीज़ बैग साहिब आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 12
Neelam Upadhyaya commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"आदरणीय मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग जी, नमस्कार। बेहतरीन लघुकथा की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Mar 11
TEJ VEER SINGH commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"हार्दिक बधाई आदरणीय मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग जी। बेहतरीन मनोवैज्ञानिक लघुकथा।बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाया है आपने।"
Mar 10
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mirza Hafiz Baig's blog post प्लेन उड़ाती लडकियां
"आदाब। क्या कहूं साहिब। साइक्लोज़िकल शो! गर्ल/वुमन-हरेशमेंट शो!  पतंग शो! उड़ती-उड़ाती, कटती-कटवाती पतंगें! परम्परागत सामाजिक ढांचे में बंधती, लिपटी, लिपटवाती लड़की, युवती, औरत! ढाक के तीन पात। समानता, विकास पर ग़ज़ब सांकेतिक दृष्टि! बेहतरीन…"
Mar 9
Mirza Hafiz Baig posted a blog post

प्लेन उड़ाती लडकियां

प्लेन उड़ाती लडकियां(लघुकथा)एयरोनॉटिकल शो। किस्म किस्म के हवाई जहाज़ आसमान में करतब दिखाते उड़े जाते हैं। अधिकतर प्लेन लड़कियां उड़ा रही हैं।"पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी...।" एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है।लड़कियां आसमान में प्लेन उड़ा रही हैं। लड़कियां आसमान छू रही हैं। लड़कियों का आत्मविश्वास आसमान पर है और एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है, "पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी।"लोग कहते हैं, “लड़कियों को पंख लग गये हैं। लड़कियां परियाँ बन गई हैं।”"एक आवश्यक…See More
Mar 9
Neelam Upadhyaya commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"आदरणीय मिर्ज़ा हाफिज बेग जी, अच्छी  लघुकथा की प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें। "
Nov 5, 2018
Mohammed Arif commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"आदरणीय मिर्ज़ा हाफिज़ बेग जी आदाब,                           बहुत भी कटाक्षपूर्ण रचना । बाक़ी गुणीजन कह ही चुके हैं , संज्ञान लें । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 4, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"शुक्रिया, मोहतरम जनाब समर कबीर साहब। आपकी हौसला अफजाई का हमेशा मुन्तज़िर रहता हूं।  भाई तेजवीर सिंह जी आपकी कीमती सलाह के लिए शुक्रगुज़ार हूं। मुझे लगता है कि अंतिम पंक्ति, कमज़ोर लोगों के प्रति प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता को अभिव्यक्त करती…"
Nov 2, 2018
Samar kabeer commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"जनाब मिर्ज़ा हफ़ीज़ बैग साहिब आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 2, 2018
TEJ VEER SINGH commented on Mirza Hafiz Baig's blog post बैसाखियाँ (लघुकथा)
"हार्दिक बधाई आदरणीय मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग जी। बेहतरीन कटाक्ष पूर्ण लघुकथा।मेरी निजी राय है कि इसमें अंतिम पंक्ति अनावश्यक लग रही है। सादर।"
Nov 2, 2018
Mirza Hafiz Baig posted a blog post

बैसाखियाँ (लघुकथा)

बैसाखियाँ वे अचानक आसमान से टपके या ज़मीन से निकले, पता ही न चला। देश के उन वीर सपूतों के नारे यदि देश के दुश्मन सुन लें तो हमारी ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत ही न करें। लेकिन इस वक्त उनकी बहादुरी और देशभक्ति का शिकार था वह जो, राष्ट्रगान के समय खड़ा नहीं हुआ था। उसे उसकी सज़ा तो मिलनी ही थी।उसे जब होश आया तो वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मुश्किल से सांस ले रहा था। उसका एक हाथ हथकड़ी के सहारे पलंग से जकड़ा हुआ था, और बाहर एक पुलिस का सिपाही पहरे पर था कि देश का मुजरिम कहीं भाग न जाये। देशद्रोह…See More
Nov 1, 2018
Mirza Hafiz Baig commented on TEJ VEER SINGH's blog post यू टू  (you too ) - लघुकथा -
"भाई तेजवीर सिंह जी, वाकई कहाँई कहने के बेहतरीन तरीका। अच्छा शिल्प; सफल कार्य। बहुत बहुत बधाईयाँ।"
Oct 21, 2018

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai
Native Place
Bhilai
Profession
service at Bhilai Steel Plant (SAIL)

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प्लेन उड़ाती लडकियां

प्लेन उड़ाती लडकियां

(लघुकथा)

एयरोनॉटिकल शो। किस्म किस्म के हवाई जहाज़ आसमान में करतब दिखाते उड़े जाते हैं। अधिकतर प्लेन लड़कियां उड़ा रही हैं।

"पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी...।" एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है।

लड़कियां आसमान में प्लेन उड़ा रही हैं। लड़कियां आसमान छू रही हैं। लड़कियों का आत्मविश्वास आसमान पर है और एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है, "पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी।"

लोग कहते हैं, “लड़कियों को पंख लग गये…

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Posted on March 9, 2019 at 7:58pm — 8 Comments

बैसाखियाँ (लघुकथा)

बैसाखियाँ

 

वे अचानक आसमान से टपके या ज़मीन से निकले, पता ही न चला। देश के उन वीर सपूतों के नारे यदि देश के दुश्मन सुन लें तो हमारी ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत ही न करें। लेकिन इस वक्त उनकी बहादुरी और देशभक्ति का शिकार था वह जो, राष्ट्रगान के समय खड़ा नहीं हुआ था। उसे उसकी सज़ा तो मिलनी ही थी।

उसे जब होश आया तो वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मुश्किल से सांस ले रहा था। उसका एक हाथ हथकड़ी के सहारे पलंग से जकड़ा हुआ था, और बाहर एक पुलिस का सिपाही पहरे पर था कि देश का मुजरिम…

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Posted on October 31, 2018 at 11:23pm — 5 Comments

सुबह का इंतज़ार (लघुकथा)

बहुत अंधेरा है। सुबह बहुत दूर है अभी। अमेरिका से अभी चली हो शायद...

नींद नहीं आती। आये भी कैसे? पेट खाली नहीं, भविष्य तो खाली है। खाली पेट नींद भले आ जाये; लेकिन भविष्य की सुरक्षा की चिंता कब सोने देती है? माँ बाप के लाखों फूंक कर, रात और दिन की तपस्या से व्यवसायिक डिग्री हासिल करने के बाद भी यह साल दो साल के एग्रीमेंट? इससे तो बेहतर था पकोड़े तलता। लेकिन वहां भी पहले से जमे लोग आपका स्वागत नहीं करते... “यहां नहीं, यहां नहीं। हम इतने बरसों से यहां झक मार रहे हैं क्या?”

“एक तो…

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Posted on September 14, 2018 at 11:00am — 6 Comments

दर्द (लघुकथा)

दर्द फिर उठा है। दर्द बहुत तेज़ है। कहते हैं, दर्द का हद से गुज़र जाना दवा है। ऐ दर्द गुज़र जा आज अपनी हदों से तू। ज़रा मैं भी तो देखूँ तेरा दवा हो जाना।

दर्द सचमुच बड़ा बेदर्द है। वह सचमुच बढ़ता जाता है; अपनी हदों को पार करता हुआ। अब नही, अब नही.......। अब बर्दाश्त नही होता। लेकिन दर्द तो बेदर्द है। बढ़ता ही जा रहा है; बर्दाश्त की हदों को पार करता हुआ। अब लगता है, जैसे सिमट आया है एक ही जगह।

दिल!

आह, दर्द-ए-दिल। सिमट आता है एक ही मुकाम पर। लगता है जैसे दिल किसी शिकंजे में कसा…

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Posted on July 23, 2018 at 1:00pm — 7 Comments

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At 6:19am on November 25, 2016, Sheikh Shahzad Usmani said…
आदाब। आप से मुझे लेखन संबंधी बहुत सी बातें सीखने को मिलेंगीं। शुक्रिया सूची में शामिल करने का मौका देने के लिए।
At 10:43pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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