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वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है

कितने दुःख दर्द से भरा दिल है

ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती

पास उनके जो सुनहरा दिल है

ताज इक सब के मन के अंदर भी

और ये शह्र आगरा दिल है

दिल लगी दिल्लगी नहीं होती

इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है

देखकर उनकी मदभरी आँखें

खो गया मेरा मदभरा दिल है

याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'

आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Jaihind Raipuri on April 7, 2026 at 12:39pm

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की वजह से

दूसरे आपके उपनाम को मैं कई बार शाहिद की जगह त्रुटिवश शहीद लिख दिया था! अतः आप मुझे क्षमा कीजियेगा

आपने वक़्त निकाल कर ग़ज़ल पर अपनी टिप्पणी दी बहुत शुक्र गुज़ार हूँ आपका आपकी बधाई एवं हौसला अफ़ज़ाई के लिए

ह्रदय तल से धन्यवाद //सुनहरा // के वज़्न के मुआमले में मैंने देखा है आप सहीह है वज़्न 122 ही है किन्तु मुझे लगा सुनहरा यदि

संस्कृत मूल का शब्द है तो क्या वज़्न वही रहेगा कृपया मार्गदर्शन कीजियेगा! // शह्र ए आगरा //बेहतरीन इस्लाह हुई बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on April 3, 2026 at 8:45pm

आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार।

बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें।

/ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती

पास उनके जो सुनहरा दिल है/

जनाब सुनहरा का वज़्न 122 है, आप चैक कीजियेगा।

/ताज इक सब के मन के अंदर भी

और ये शह्र आगरा दिल है/

शह्र-ए-आगरा कहने से और बेहतर हो जाएगा।

कृपया ध्यान दे...

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