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Sheikh Shahzad Usmani's Blog (237)

हवाओं से रूबरू (लघुकथा)

धोबन ढेर सारे कपड़़े धोकर छत पर बंधे तार पर क्लिप लगा कर सूखने डाल गई थी। कुछ ही देर में तेज़ हवायें आंधी का रूप ले चुकीं थीं। घर में कोई कपड़ों की सुध नहीं ले रहा था। वे असहाय से कपड़़े अब हवा के रुख़ के संग फड़फड़ाने लगे थे।



"बड़ा मज़ा आ रहा है! अब मैं ज़ल्दी से सूख कर राहत पाऊंंगी।" तार में लगे क्लिप और आंधी के साथ अपना संतुलन बनाते हुए एक पोषाक ने कहा।



"मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा कि कैसे संभालूं अपने आप को!" एक छोटी सी आधुनिक फैशनेबल पोषाक ने क्लिप संग सब तरफ़ झूमते हुए…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 19, 2018 at 10:46pm — 5 Comments

मुफ़्त की ऑक्सीजन (लघुकथा)

"नहीं कमली! हम नहीं जायेंगे वहां!" इकलौती बिटिया केमहानगरीय जीवन के दीदार कर लौटी बीवी से उसकी बदली हुई सी बोली में संस्मरण सुन कर हरिया ने कहा - "हमें ऐसा मालूम होता, तो बिटिया को बेटे की तरह न पालता... आठवीं तक ही पढ़ाता! अपना खेत न बेचता! फंस गई न वो दुनिया के झमेले में, हमें यहां अकेले छोड़के!"



बेहद दुखी पति की बातें वह चुपचाप सुनती रही। हरिया ने अपने आंसू पौंछते हुए आगे कहा - "पुरखों ने जो सब कुछ हमें सिखाया था, बिटिया को भी हमने सिखा दिया था। अरे, खेत में हर किसम के सांप,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 17, 2018 at 8:26pm — 6 Comments

चलती का नाम औपचारिकता (लघुकथा)

"ठीक है, तुम भी मेरी उपेक्षा कर आगे बढ़ जाओ, मुझे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता! बहुत सब्र है मुझमें!" सुबह की चहलक़दमी करते एक तंदुरुस्त आदमी से पतझड़ से गुज़रे सूखे दरख़्त ने कहा।



"पर उसमें भी अपने अन्य साथियों की तरह ज़रा भी सब्र नहीं है! क्या फ़ायदा उससे कुछ कहने से? उसे भी इस काम के बाद रोज़ाना की तरह दूसरे काम भी तो पूरे करना है न!" दूसरे साथी पेड़ ने उस से कहा।



"सही कहा तुमने। आज का ख़ुुुदग़र्ज़ आदमी धन-दौलत, फैशन और तरक़्क़ी की होड़ में न तो कोई रिश्ते सही तरह से निभा पा रहा है, न ही…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 15, 2018 at 9:50am — 7 Comments

लालटेन वाली (लघुकथा)

विदेश से लौटे मांगीलाल की मांग पर चांदनी रौशनी में खुली हवा में उन्हें गांव की सड़क पर सैर कराई गई बैलगाड़ी में एक लालटेन लटका कर, जो उनके छात्र जीवन की निशानी थी। बैलगाड़ी चालक बब्बा जी अतीत की बातें सुनाकर छात्र रूपी मांगीलाल की तारीफ़ों के पुल बांधते हुए उनके दिलचस्प सवालों के जवाब देते जा रहे थे।



"बड़ा मज़ा आया बेलगाड़ी में घूम कर!" सिगरेट का कश लेते हुए गांव की कुछ अल्हड़ नवयौवनाओं को घूरते हुए मांगीलाल ने अपनी अगली मांग इशारों में ज़ाहिर कर दी!



"बब्बा ज़रा लालटेन उस तरफ़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 12, 2018 at 2:00am — 5 Comments

दि 'बेस्ट' या 'वर्स्ट' (लघुकथा)

"स्कूल में दीदी की तरह मुझे भी मेरी मम्मी और टीचर ने सिखाया था कि कब क्या करना है और कब क्या नहीं? लेकिन मम्मी की तरह शायद दीदी भी न बच पायी!" मौक़ा पाते ही पीछे के छोटे से खपरैल वाले कमरे में लालटेन की रौशनी में अपनी आंसुओं को पीती सी हुई उसने बड़ी हिम्मत के साथ आगे लिखा -"मम्मी पर तो पूरे परिवार की ज़िम्मेदारियाँ हैं, सो वह साहब की सब सहती रही, पैसों की जुगाड़ करती रही! लेकिन जब मेरी दीदी ने साहब के 'बेड-टच' की शिक़ायत मम्मी से की, तो यही जवाब मिला था कि "किसी से कुछ मत कहना, अब तो वैसा भी आम…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 10, 2018 at 10:44am — 5 Comments

गुंजन या हुंकार (लघुकथा)

... और अब वे वहां भी पहुंच गये! भव्य आदर-सत्कार के बाद उन्हें उनकी पसंद की जगह पहुंचाने पर एक वरिष्ठ मेजबान ने कहा - "सुना है ... टीवी पर देखा भी है कि जिस मुल्क में आप जाते हैं, कोई न कोई वाद्य-यंत्र ज़रूर बजाते हैंं!"



"क्या कहा? कौन सा तंत्र?"



"लोकतंत्र नहीं कहा मैंने! वाद्ययंत्र कहा .. वा..द्ययंत्र!"



"हे हे हे! दोनों अय..कही.. बात हय! यंत्र में मंत्र और तंत्र हय! वाद्ययंत्र कह लो या लोकतंत्र; बजाने में ग़ज़ब की अनुभूति होती है, हे हे हे! बताइए इसे भी बजा…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 31, 2018 at 6:06pm — 4 Comments

नई सदी के बहुरुपिये कार्टून (लघुकथा)

"अबे, कहां जा रहा है?"

"कामिक्स वाले कार्टून नेता आये हैं स्टेडियम वाले ग्राउण्ड पर; तू भी चल मज़ा आयेगा उनकी एक्टिंग देख कर!"

"खाना खा लिया कि नहीं?"

"अम्मा को जो भीख में या प्रसाद में मिलेगा, बाद में खालूंगा!"

"आज फिर स्कूल नहीं गया, आज तो तेरी अम्मा से शिक़ायत कर ही दूंगा!"

"अम्मा कुछ न कहेगी!  आज मैंने कल से ज़्यादा मजूरी कमा ली है!"

नौ साल का बच्चा यह कहता हुआ तेज़ क़दमों से स्टेडियम मैदान में घुस गया।

(मौलिक व…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 29, 2018 at 7:00pm — 4 Comments

पार्टियां चलती रहीं (लघुकथा)

"पलट! तेरा ध्यान किधर है? शराब, कबाब और हैदराबादी बिरयानी इधर है!" अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाती पार्टी की दी हुई पार्टी में सदस्यों में से एक ने टीवी देख रहे दूसरे साथी से कहा।



"जुमले कैच कर रहा होगा, जुमलेदार भाषण या कथा रचने के लिए!" दूसरा बोला।



"कथा, कविता कह ले या भाषण, लघुकथा! किसी पर तेरी कलम कोई कमाल नहीं कर पायेगी! सभी मतदाता सम्मोहित कर लिये गए हैं अपनी लहर में, ख़ास तौर से महिलायें और स्टूडेंट्स!" कुछ पैग नमकीन के बाद हलक में गुटकने के बाद पहला झूमते हुए…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 27, 2018 at 6:02pm — 4 Comments

समय की लाठियां (लघुकथा)

पार्क की ओर जाते हुए उन दोनों बुज़ुर्ग दोस्तों के दरमियाँ चल रही बातचीत और उनके हाथों में लहरा सी रही लाठियां नये दिवस की भोर के पूर्व, उनके अनुभव की लाठियां साबित हो रहीं थीं।



"... 'सही नीयत और सही तरक़्क़ी'! यह दावा करते हैं आजकल के दोगले नेता अपने मुल्क की ज़मीनी हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करते हुए!" उनमें से एक ने कुछ झुंझलाते हुए कहा।



"... 'शाही नीयत और शाही तरक़्क़ी' है दरअसल! हम तो यही कहते हैं, यही देखते हैं हर तरफ़ और यही तो सुनते हैं!" दूसरे साथी बुज़ुर्ग ने व्यंग्यात्मक…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 27, 2018 at 5:30am — 6 Comments

छोटा वकील (लघुकथा)

"हमने तो सुना है कि बहुत ज़रूरी होने पर देर रात तक कोर्ट लग जाती है; वकील और जज साहिबान सब हाज़िर हो कर फैसले करते, करवाते हैं?" धरनीधर ने अपने विधायक महोदय से यह कहते हुए पूछा - "हमारे पास सारे सबूत हैं! सुनीता की आबरू लूटने वालों को तीन साल बाद भी कोई सज़ा न हुई? आप चाहें, तो सब तुरंत ही निबट जाये!"



"दरअसल सब लेन-देन के कारोबार हैं! तुमने न तो कोई बड़ा वकील किया है, न ही तुम्हारे वकील की वैसी कोई पहुंच है!" ऐसी कुछ दलीलें सुनाते हुए विधायक ने कहा - "तुम्हारे पास जितना जो कुछ…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 24, 2018 at 2:43pm — 7 Comments

चाय पर चर्चा (लघुकथा)

"अरे भाई ! इस दफ़ा तो पहले रोज़े से ही मैंने 'चाय' पीना छोड़ दिया इस रमज़ान में!" चाय का प्याला ले कर आये सल्लू से कहते हुए मिर्ज़ा साहिब ने अपनी तस्वीह (जापमाला) पर अपनी तर्जनी दौड़ाते हुए कहा- "पूरा एक हफ़्ता हो गया है आज!"



"तुम भी ग़ज़ब करते हो चच्चाजान! जैसे-तैसे आज निकले इधर से, और आजई जे ख़बर दे रये हो!" केतली हिलाते हुए दूसरे ग्राहक को चाय उड़ेलते हुए वह बोला - "तुम 'चाय' के शौक़ीन हमारे रेगुलर ग्राहकों में से हो, तुमईं ने छोड़ दई! ऐसो का हो गओ चच्चा! तम्बाकू-बीड़ी के बाद…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 24, 2018 at 12:30am — 7 Comments

बुद्धिजीवी कौन? (लघुकथा)

"कहते हैं साहित्यकारों, लेखकों, खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का कोई धर्म या मज़हब नहीं होता!" युवा दोस्तों के समूह में से एक ने कहा।



"शिक्षकों, छात्रों, और राजनेताओं का भी तो क़ायदे से कोई धर्म या मज़हब नहीं होता!" दूसरे दोस्त ने अपना किताबी ज्ञान झाड़ा।



"अबे, तो क्या ड्राइवरों, पुलिस, सैनिकों और वकील-जजों का भी कोई धर्म या मज़हब नहीं होता?" तीसरे साथी ने झुंझलाकर कहा।



"हां कहा तो यही जाता है कि किसी भी तरह के कलाकारों का भी इसी तरह न कोई धर्म होता…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 21, 2018 at 2:34pm — No Comments

ग़ुलामी बहुआयामी (अतुकान्त कविता)

डिजिटल ग़ुलामी है बहुआयामी

शारीरिक नुमाइश हुई बहुआयामी

हैरत है, कहें किसको नामी और नाकामी

अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

योग ग़ज़ब के हो रहे वैश्वीकरण में

मकड़जाले छाते रहे सशक्तिकरण में

छाले पड़े आहारनलिकाओं में

ताले संस्कृति और संस्कारों में

अधोगति, पतन सतत् रहे बहुआयामी

हैरत है, कहें किसमें खामी और नाकामी

अनपढ़, ग़रीब, शिक्षित या असामी।

शिक्षा, भिक्षा, रक्षा सभी बहुआयामी

लेन-देन, करता-धरता, कर्ज़दाता भी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 20, 2018 at 9:00pm — 4 Comments

बोलती निगाहें (लघुकथा)

"बिटिया, कितनी बार कहा है कि अॉनलाइन शॉपिंग वग़ैरह के अॉफरों और प्रलोभनों में अपना समय और पैसा यूं मत ख़र्च करो!" अशासकीय शिक्षक ने अपनी कमाऊ शादी योग्य बेटी से कहा ही था कि उनकी पत्नी बीच में टपकीं और बोलीं- "तुम अपने काम से काम रखो। बिटिया तुम से ज़्यादा कमा कर अपने दम पर अपना दहेज़ जोड़ रही है और पैसे भी! ... और रिश्ता भी!"

"आप लोग यूं परेशान न हों! ...मम्मी तुम्हें पापा से इस तरह नहीं बोलना चाहिए। मुझे पता है प्राइवेट नौकरी में क्या-क्या और कैसे सब कर पाते हैं!" बिटिया ने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 20, 2018 at 6:31am — 5 Comments

नंगापन (लघुकथा)

स्कूल की छत और कुछ दरख़्तों पर कुछ बंदर अपनी शैली में आनंद ले रहे थे। कक्षा में छात्रों ने उनके 'उत्पात' देखने हेतु आगे पढ़ने से मना कर दिया। दरअसल मॉरल साइंस (नैतिक शिक्षा) के शिक्षक इत्तेफ़ाकन गांधी जी के 'तीन बंदरों' की प्रतीकात्मकता की व्याख्या करते हुए 'सादा जीवन उच्च विचार' के बारे में उन्हें समझा रहे थे!



"ये मज़बूर और परेशान बंदर हैं! किसी तलाश में राह भटक गये हैं!" अपनी बत्तीसी निपोरते एक बंदर की ओर इशारा करते हुए शिक्षक ने कहा।



"नहीं, सर! ये हमारी तरह…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 19, 2018 at 7:02pm — 2 Comments

किसकी ख़ुशी, किसके ग़म (लघुकथा)

"सुना है कि आपके मुल्क में तो विधायकों की खरीद-फरोख्त सी चल रही है!" परदेसी ने देसी दोस्त से फोन पर कहा।



" नहीं ऐसा तो कुछ विशेष नहीं, पहले भी ऐसी परंपरा रही है । मेरा लोकतंत्र बदल रहा है; तोड़-मरोड़ कर देश चल रहा है! यह समझो कि बेईमानी का कारोबार फल-फूल रहा है, बस!" दोस्त ने टेलीविजन अॉफ़ कर अंगड़ाई लेते हुए कहा।



"आप सभी खुश तो हैं न?"



"हां, सभी ख़ुश हैं! कभी उनके दल में, तो कभी हमारे दल में ऐसा हो जाता है! जनता सब जानती है, समझदार हो गई है; मीडिया के मज़े…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 16, 2018 at 6:31pm — 2 Comments

एक और सूटकेस (लघुकथा)

"सूटकेस भी तो ला!"


"सर.. कार में है!"


".. तो और कहां होगा! उसी सूटकेस से तो सरकार बनवाऊंगा न!"


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 16, 2018 at 6:04pm — 1 Comment

दलदल (लघुकथा)

"हम सबसे बड़े दल हैं!"


"तो दावा करने के बाद साहिब का तो इंतज़ार कर न!"


"क्या करें भाई, हम दलदल में जो हैं!"


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 16, 2018 at 5:57pm — No Comments

कड़वे जलवे (लघुकथा)

"लोगों की आदत है हर बात, हर घटना में से केवल नकारात्मक बातें ही निकालते हैं!" झूमते हुए दरख़्तों ने कुछ अनुपयोगी पत्तों और डालियों से छुटकारा पाते हुए तेज़ आंधी से कहा- "अब देख, तुझे लोग केवल तबाही और नुकसान के लिए याद करते हैं, जबकि...!"



"क्या जबकि?" तेज़ हवाओं को लपेटती आंधी ने पूछा।



"जबकि आजकल तुझे विश्व स्तर का 'टेलीविजन चैनल कवरेज़' मिल रहा है, तुझ पर 'विडियो क्लिप्स' इंटरनेट पर अपलोड किए जा रहे हैं! तेरे तो जलवे हैं! तरह-तरह से लोगों को 'ठंडक', 'संतुष्टि' और…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 14, 2018 at 11:16am — 8 Comments

अनुयाइयों की पतंगें (लघुकथा)

'संस्कृति' अपनी 'ऐतिहासिक पुस्तकों' को सीने से लगाए उन जल्लादों के लगभग समीप ही खड़ी थी। 'संस्कार' संस्कृति से नज़रें चुराकर सिर झुकाए नज़ारों पर शर्मिंदा था, पर यहां आदतन साथ खड़े होने पर विवश था। वैश्वीकरण के तथाकथित दौर में धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, व्यावसायिक और सामाजिक धर्म, कर्म, और राजधर्म फ़ांसी के फ़ंदों को निहारते हुए अपनी अपनी दशा और दिशा पर पुनर्विचार तो कर रहे थे, लेकिन चूंकि उनके कैंसर का आरंभिक स्तर डायग्नोज़ हो चुका था, इसलिए उनके इलाज़ में समय, ऊर्जा और धन बरबाद करने के…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 12, 2018 at 9:30am — 3 Comments

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