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उतार-चढ़ाव (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

घोर निराशा से घिरे पुत्र को जीवन की सच्चाई बताते हुए पिताजी सीख देने की कोशिश कर रहे थे।

"बेटा, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव से व्यथित मत हो, हर इन्सान के हमसफ़र होते हैं ये सब!"

" लेकिन पिताजी, हमसफ़र के तेवर सबके साथ एक से नहीं होते! स्वाभाविक उतार-चढ़ाव और बनाये गये या थोपे गये उतार-चढ़ाव में ज़मीन आसमान का फर्क है इस स्वार्थी युग में!"- पुत्र ने अपने शैक्षणिक दस्तावेजों की फाइल बंद करते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 6, 2016 at 7:26pm
ब्लोग पोस्ट पर समीक्षात्मक प्रोत्साहक टिप्पणी करने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया नीता कसार जी।
Comment by Nita Kasar on February 18, 2016 at 2:36pm
उतार चढ़ाव का नाम ही ज़िंदगी है पर वह बेटा क्या करें जिसके पास पर्याप्त योग्यता होने के बाद भी वह बेरोज़गारी से जूझ रहा हो ।वक्त बदलता है पर वक्त लगता है बधाई आपको आद०शहजाद उस्मानी जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 17, 2016 at 7:44pm
मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर उपस्थित हो कर प्रोत्साहन देने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब, जनाब तेज वीर सिंह जी, आदरणीया जानकी वाही जी व आदरणीया राहिला जी।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2016 at 11:35am

आ0 भाई शेख शहजाद जी हार्दिक बधाई ।

Comment by Janki wahie on February 16, 2016 at 11:15am
बेहद उम्दा कथा।गागर में सागर।हार्दिक बधाई।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 15, 2016 at 9:18pm

जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी  साहिब , वाक़ई वह ज़िंदगी ही क्या जिसमें उतार चढ़ाव न हों। ... बहुत अच्छी लघु कथा के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by TEJ VEER SINGH on February 15, 2016 at 7:42pm

हार्दिक बधाई  आदरणीय शेख उस्मानी  जी!बेहतरीन प्रस्तुति!

Comment by Rahila on February 15, 2016 at 7:09pm
सबके हमसफर भी तो एक जैसे नहीं होते तो तेवर कैसे एक होगें । और फिर किस्मत का खेल अलग डुगडुगी बजाता है । जो इंसान को नित नये रंग दिखाता है । बहुत सार्थक लेखन आदरणीय उस्मानी जी !बहुत बधाई ।

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