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पत्थर पर उगती दूब
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ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में आये ही थे कि नौकर रामू ने कहा, ’मेमसाहब का फोन आया था.."
ब्रह्मदत्तजी ने रामू की ओर देखे बिना ही अस्फुट स्वर में पूछा, "क्या कहा उन्होंने ?"
"कुछ नहीं,. आपको पूछ रही थीं"
"तुमने क्या बताया ?’
"यही कि आप पूजा कर रहे हैं"
ब्रह्मदत्तजी के चेहरे का भाव निर्विकार रहा, ".. उनसे पूछा नहीं ?" रामू सकपका गया।
"ठीक है, जाओ,,"
तभी निकिता कमरे में आयी, "पापा, मम्मी का फोन आया था ?"
"तुम कहाँ थी?"
"ऊपर वाशरुम में.."
ब्रह्मदत्तजी की पुत्री निकिता एक वर्ष से अपनी पीएचडी के क्रम में साथ ही रह रही है। वह अपने पापा और मम्मी के बीच असहज रहे, और अब तो क्लिष्ट हो चुके, सम्बन्ध के बीच ही बड़ी हुई है। अपने उच्च अधिकारी पिता के सहज जीवन के प्रति वह श्रद्धा के भाव रखती है। लेकिन अपनी एडावोकेट मम्मी के कई प्रश्नों और तर्कों को वह नकार भी नहीं पाती। उनके वैवाहिक जीवन के आरम्भिक कुछ वर्षों को छोड़ दें तो ब्रह्मदत्तजी और उज्ज्वला एक साथ सहमिल जीवन गुजार ही नहीं सके हैं। अब तो अलग रहते हुए भी सात वर्षों से अधिक का समय हो चुका है।
उज्ज्वला का लैंडलाइन-कॉल उनके पास आज महीनों-महीनों बाद आया था। वैसे भी उज्ज्वला उन्हें मोबाइल पर कॉल नहीं करतीं। निकिता के मन में मम्मी के कॉल को लेकर सवाल तो थे ही, ब्रह्मदत्तजी के मन में भी भारी उथल-पुथल मची थी।
"पापा, लेकिन आप अपनी ओर से कोई पहल भी तो नहीं करते.. सही कहूँ, तो मम्मी कई बार हमें सही लगी हैं... "
"कई जगह नहीं बेटा, वे हर जगह सही हैं.. अपने हिसाब से वह सही ही हैं.. "
ब्रह्मदत्तजी से ऐसे उत्तर की अपेक्षा न थी, "..हाँ बेटा, एक चीफ-सेक्रेटरी की इकलौती बेटी हैं....तिस पर उनकी मम्मी, उनके पापा.. फिर तुम बस.. स्वयं में मग्न, स्वयं में तुष्ट... " कहते-कहते ब्रह्मदत्तजी रुक गये।
निकिता को अपने गाँव का खपरैल घर, दोनों चाचा, दोनों बुआओं के साथ दादीजी का स्मरण हो आया। दादाजी के जल्दी गुजर जाने के बाद पापा ही तो अपने भाई-बहनों के पिता हो गये थे। अपनी पढ़ाई पूरी करता हुआ युवा पिता !
कि, कुर्सी पर एक तरह से निढाल होते हुए ब्रह्मदत्तजी ने कहा, "... मगर मैं ऎकनिष्ठ हूँ, बेटा, व्तक्तिवाची नहीं.."
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