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"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 189 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा मशहूर शायर अहमद फ़राज़ साहब की ग़ज़ल से लिया गया है।
तरही मिसरा है:
“अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें
बह्र 2122, 1212, 112/22 अर्थात् फ़ायलातुन्, मफ़ायलुन्, फ़यलुन् है।


रदीफ़ है “नहीं कि तुझ से कहें” और क़ाफ़िया है ‘ना’ । ध्यान दें कि रदीफ़ में “से” गिराकर पढ़ा जायेगा।
रदीफ़ लंबी होने के कारण क़ाफ़िया शब्दों का चयन बहुत महत्वपूर्ण है।
रदीफ़ के पहले काफ़िया मिलाकर कुल फ़ायलातुन् ही उपलब्ध है। कुछ उदाहरण काफ़िया शब्द ये हैं। आशियाना, लगाना, चुराना, बताना, आज़माना, दिखाना, पुराना, मुस्कुराना, दुखाना आदि।


मूल ग़ज़ल यह है:
दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें।


आज तक अपनी बेकली का सबब
ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कहें।


बे-तरह हाल-ए-दिल है और तुझ से
दोस्ताना नहीं कि तुझ से कहें।


एक तू हर्फ़-ए-आश्ना था मगर
अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें।


क़ासिदा हम फ़क़ीर लोगों का
इक ठिकाना नहीं कि तुझ से कहें।


ऐ ख़ुदा दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त
आब-ओ-दाना नहीं कि तुझ से कहें।


अब तो अपना भी उस गली में 'फ़राज़'
आना जाना नहीं कि तुझ से कहें।

कृपया ध्यान दें : इस बार मुशायरे की अवधि एक सप्ताह होगी । मुशायरे की शुरुआत दिनांक 25 मार्च दिन बुधवार के प्रारंभ के साथ हो जाएगी और दिनांक 31 मार्च दिन मंगलवार के समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.

नियम एवं शर्तें:-

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |

एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 अशआर ही होने चाहिए |

तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |

शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |

ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |

वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की इस्लाह लेकर ही प्रस्तुत करें

नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी |

ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी ।

विशेष अनुरोध:-

सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें | मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें | 

मुशायरे के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....

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मंच संचालक

तिलक राज कपूर

(वरिष्ठ सदस्य)

ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

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स्वागतम

सादर अभिवादन 

           

            सभी सदस्यों को सादर अभिवादन ।   

सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें

ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें

दिल अभी जाना नहीं कि तुझ से कहें

ग़म पुराना नहीं कि तुझ से कहें 

ग़म तो संजीदा होता है ये कोई

मुस्कुराना नहीं कि तुझ से कहें

थी सारी काइनात झूठी मगर

दिल ने माना नहीं कि तुझ से कहें

क्या गईं तुम जो अपने घर में हुआ

ख़ुद ही का आना नहीं कि तुझ से कहें

मुड़ के देखा नहीं मैं क्या कहता

"अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें"

मौलिक एवं अप्रकाशित 

इश्क़ तो है मगर ये इतनी भी

शा'इराना नहीं कि तुझ से कहें

साफ़ गोई सुनोगे क्या तुम ये

अहमकाना नहीं कि तुझ से कहें

मौलिक एवं अप्रकाशित 

नमस्कार भाई जयहिंद जयपुरी जी, 

 

मुशायरे की पहली ग़ज़ल लाने के लिए बधाई। 

दिए गए मिसरे पर आपका अच्छा प्रयास है। यथासंभव आपने बहर का पालन किया है। अच्छे भाव लाने का सफल प्रयोग है। 

किन्तु मिसरा इस मिजाज़ का है कि सामान्य से हटकर कौशिश माँगता है। आपकी ग़ज़ल पर भी काम होना है। अभी बहुत अधिक सुझाव तो मैं नहीं दे सकता पर अन्य वरिष्ठ साथियों की टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा। 

//थी सारी काइनात झूठी मगर // बहर देख लें 

//ख़ुद ही का आना नहीं कि तुझ से कहें// बहर देख लें 

आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी पटल पर ग़ज़ल का शुभारंभ करने की बहुत बहुत बधाई , विद्वान मार्गदर्शन करेंगे।

आदरणीय जयहिंद जी 

ग़ज़ल का अच्छा प्रयास किया आपने बधाई स्वीकार कीजिए 

गुणीजनों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार है 

सादर 

सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें।

शेर का शेर के रूप में पूरा होना और एक अच्छा शेर होना, दो अलग बात हैं। दोनों पंक्तियों को जोड़कर शेर क्या कह रहा है, यह स्पष्ट होना चाहिये। यहॉं दोनों पंक्तियॉं स्वतंत्र वाक्य हैं। उन्हें जोड़ क्या रहा है? आपका एक समाधानकारक उत्तर यह हो सकता है कि सच कोई फ़साना नहीं है अत: तुझे सुनाना बेकार है और दूसरी पंक्ति यह कह रही है कि पहली पंक्ति में जो कहा गया वह बहाना नहीं है।

दिल अभी जाना नहीं कि तुझ से कहें
ग़म पुराना नहीं कि तुझ से कहें।
इसमें बह्र का पालन नहीं हो रहा है। “दिल ने जाना नहीं कि तुझ से कहें” कह कर निराकरण किया जा सकता है।

ग़म तो संजीदा होता है ये कोई
मुस्कुराना नहीं कि तुझ से कहें
पहली पंक्ति में बह्र देखें। “ग़म अलग मस्अला है, क्या बोलें”

थी सारी काइनात झूठी मगर
दिल ने माना नहीं कि तुझ से कहें
पहली पंक्ति के अन्य रूप देखें “सच बयॉं कर सकूँ, ये हिम्मत थी” या “सच पे पाबंदियॉं नहीं थीं मगर”

क्या गईं तुम जो अपने घर में हुआ
ख़ुद ही का आना नहीं कि तुझ से कहें
इसे पुन: देखें, बहुत बदलाव चाहिये इसमें।

मुड़ के देखा नहीं मैं क्या कहता
"अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें"
प्रशम पंक्ति का एक रूप देखें "मुड़ के तुम देखतीं तो मैं कहता"

 

आदाब। हमें भी मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय तिलकराज कपूर जी।

        

        दिल लगाना नहीं कि तुम से कहें,

        फिर ठिकाना नहीं कि तुम से कहें।

        ग़म-ए-दौलत मिली है किस्मत से,

        ये लुटाना नहीं कि तुम से कहें।

        शमअ जलती रहे मुहब्बत की,

        ये बुझाना नहीं कि तुम से कहें।

  

        मसअला जिंदगी ये सुलझे नहीं,

        आशियाना नहीं कि तुम से कहें।

        उसका हुस्नो-शबाब देखा मगर,

        क़ातिलाना नहीं कि तुम से कहें।

        दोस्ती- दुश्मनी निभाते हैं हम,

        आज़माना नहीं कि तुम से कहें।

        ज़ख्म फूलों से खाए तो समझे,

        'अब ज़माना नहीं कि तुम से कहें'।

        मौलिक एवं अप्रकाशित 

       

       

अच्छी ग़ज़ल हुई है मंजीत कौर जी। बारीकियों पर गुणीजनों की राय का इंतज़ार है। 

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