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Ravi Shukla
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Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय अनीस जी अच्छी गजल आपने आज के मुशायरे में कही इसके लिए मेरी ओर से शेर दर शेर दिली मुबारकबाद कुबूल करें ।सादर।"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय मुनीश जी अच्छी गजल आपने कही दिली मुबारकबाद पेश है समर साहब की बातों का संज्ञान लीजिएगा सादर"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीया राजेश दीदी बहुत अच्छी ग़ज़ल आपने कहीं इसके लिए मेरी ओर से दिली बधाई कुबूल करें एक तकिया समझकर शेर बहुत अच्छा लगा है इसके लिए अलग से बधाई। सादर।"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय मनन कुमार सिंह जी अच्छी गजल आपने कहीं बधाई स्वीकार करें"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय लक्ष्मण जी तरहही मिसरे पर आपने अच्छी ग़ज़ल कहीं इसके लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय तस्दीक साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल आपने आज के मुशायरे में कही इसके लिए मेरी ओर से शेर दर शेर दिली मुबारकबाद कुबूल करें। सादर।"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय नवीन मणि जी  उम्दा गिरह के साथ अच्छी ग़ज़ल आपने कही इसके लिए मेरी ओर से दिली मुबारकबाद कुबूल करें तीसरे और पांचवें शेर पर जो बात मैं कहना चाहता था उस पर आदरणीय समर साहब की टिप्पणी आ गई है ।सादर"
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय रवि भसीन जी इस उम्दा ग़ज़ल के लिए और मुशायरे का फीता काटने के लिए मेरी दिली मुबारकबाद कुबूल करें मतले के ऊला में आदरणीय तस्दीक जी की और आपकी बात से मेरी शंका का भी समाधान हो गया। सादर। "
Feb 22
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय दंडपाणि जी दिए गए विषय पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास आपने किया है इसके लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें तीसरे शेर में मुझे बहर में कुछ अटकाव मालूम हो रहा है। देखियेगा । सादर"
Jan 25
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय दिनेश जी तरही मिसरे पर आपने बहुत अच्छी ग़ज़ल कही इसके लिए दिली मुबारकबाद कुबूल करें"
Jan 25
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आरणीय बनीस साहब तरही मिसरे पर अच्छी ग़ज़ल कही आपने,बधाई स्वीकार करें तीसरा शेर  खास तौर पर पसंद आया"
Jan 24
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आरणीय सुरेन्द्र नाथ  जी ,तरही मिसरे पर अच्छी ग़ज़ल कही आपने,बधाई स्वीकार करें आरणीय समर साहब ने  गिरह लगाने का हम लोगो को अच्छा तरीका सिखाया है गिरह के मिसरे  पर अब कठिनाई नहीं होती ।आभार समर साहब का  "
Jan 24
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय गंगाधर  जी गजल का अच्छा प्रयास है सहभागिता के लिए बधाई पेश है "
Jan 24
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय अमित जी अजल काअच्छा प्रयास है बधाई पेश है पहला रुक्न 221 और 1121 में अंतर हो जाता है "
Jan 24
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आरणीय तसदीक साहब  अच्छी गजल गिरह के साथ उम्दा गजल कही  मुबारक बाद पेश करता हूँ "
Jan 24
Ravi Shukla replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-115
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी  इस सुंदर ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाई।"
Jan 24

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Bikaner
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Ravi Shukla's Blog

तरही ग़ज़ल फ़िराक़ साहब के मिसरे पर

थी यही फूल की किस्मत कि बिखर जाना था,

ये कहाँ तय था कि जुल्फों में ठहर जाना था।

मौज ने चाहा जिधर मोड़ दिया कश्ती को,

"मुझको ये भी न था मालूम किधर जाना था"।

जो थे साहिल पे तमाशाई यही कहते थे,

डूबने वाले को अब तक तो उभर जाना था।

बज़्मे अग्यार में है जलवा नुमाई तेरी ,

इस तग़ाफ़ुल पे तेरे मुझको तो मर जाना था।

गर्द हालात की चहरे पे है,लेकिन तुझको,

आईना बन के मैं आया तो सँवर जाना था।

सुब्ह का भूला…

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Posted on March 1, 2019 at 4:30pm — 7 Comments

गीत दफ्तर पर

सिस्टम से अब और निभाना मुश्किल है,

आँसू पीकर हँसते जाना मुश्किल है।।

लंबे चौड़े दफ्तर हैं पर छोटी सोच लिए।

भाँग कुएँ में मिली हुई है पानी कौन पिए।

कागज के रेगिस्तानों में भटक रहा,

मृग तृष्णा से प्यास बुझाना मुश्किल है।

भावुकता में मैदां छोड़ूँ क्या होगा।

कोई और यहाँ आकर रुसवा होगा।।

अजगर बन कर पड़ा रहूँ कैसे संभव,

जोंकों को भी खून पिलाना मुश्किल है।

लानत और मलामत का है भार बहुत।

न्याय नहीं निर्णय का शिष्टाचार…

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Posted on November 16, 2018 at 9:48pm — 5 Comments

तरही ग़ज़ल : साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

2122  1122  1122  22/112

कोई पूछे तो मेरा हाल बताते भी नहीं,

आशनाई का सबब सबसे छुपाते भी नहीं।

शेर कहते हैं बहुत हुस्न की तारीफ़ में हम

पर कभी अपनी ज़बाँ पर उन्हें लाते भी नहीं।

जब भी देते हैं किसी फूल को हँसने की दुआ,

शाख़ से ओस की बूंदों को गिराते भी नहीं।

ये तुम्हारी है अदा या है कोई मजबूरी,

प्यार भी करते हो और उसको जताते भी नहीं।

सिर्फ़ अल्फ़ाज़ से पहचान…

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Posted on August 29, 2018 at 4:00pm — 17 Comments

गीत : एक भारत श्रेष्ठ भारत

एक भारत श्रेष्ठ भारत आइये मिलकर बनाएं

देश का  सम्मान गौरव लक्ष्य हासिल कर बढ़ाएं

 

शांति के हम पथ प्रदर्शक ध्वज अहिंसा ले चलेंगे

विश्‍व गुरु बन कर पुन: संस्थापना सच की करेंगे

दें नहीं उपदेश अपने आचरण से  कर दिखाएं

 

धर्म पूजा, जाति भाषा, वेश भूषा, बोलियाँ सब

एकता के सूत्र में बंध कर चली है टोलियाँ सब

संगठन में शक्ति है, ऐसी लिखें फिर से कथाएं

 

रेल का हमको दिखाई दे रहा है पथ समांतर

मूल में इसके छिपा है साथ…

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Posted on July 25, 2017 at 11:00am — 9 Comments

Comment Wall (15 comments)

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At 7:49am on June 29, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय रवि शुक्ला जी आदाब , बहुत शुक्रिया मेरा हौसला बढ़ने के लिए
At 4:12pm on June 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय रवि शुक्ल जी आदाब, बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें
At 8:08am on January 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय रवि जी
बहुत बहुत शुक्रिया
At 12:59am on October 5, 2018, mirza javed baig said…

मोहतरम जनाब रविरवि शुक्ला जी आदाब 

मुझे अपने फ्रेंड्स लिस्ट में जोड़ने के लिए शुक्रिया 

आपसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलेगा। 

At 9:25am on September 9, 2018, Ajay Tiwari said…

आदरणीय रवि जी,

आपकी मैत्री हासिल करना किसका सौभाग्य नहीं होगा. और मुझे ख़ुशी है कि ये सौभाग्य अब मुझे भी प्राप्त है. हार्दिक आभार.

At 5:11pm on January 10, 2018, dandpani nahak said…
आदरणीय रवि शुक्ला जी प्रणाम
प्रथम तो मैं देरी से आपका आभार व्यक्त करते हुए शर्मिंदा हूँ और माफ़ी चाहता हूँ अपने मेरी पहली ही ग़ज़ल पढ़ी तथा इस पर अपने विचार व्यक्त किये मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ मेरी पहली ही ग़ज़ल में बहुत ख़ामियां है मुझे भरोषा है की आप जैसे गुणीजनों के सानिध्य में मैं कुछ सीख सकूँगा
आपका बहुत बहुत आभार
At 3:39pm on April 5, 2017, Gurpreet Singh jammu said…

आदरणीय रवि शुक्ला जी आपसे बहुत अच्छी चैटिंग हो रही थी... लेकिन ऐन वक़्त पर मेरे नेट ने धोखा दे दिया ( ये अक्सर मेरे साथ ऐसा ही करता है ) और आप से  बात चीत बीच में ही कट गई ,,, खैर फिर मौका मिला तो बात आगे बढ़ांएंगे,,, संपर्क करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद 

At 11:45pm on July 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय रवि शुक्ल जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी  ग़ज़ल - व्यापार होना चाहिए को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 8:23pm on December 17, 2015, Nirdosh Dixit said…
प्रणाम स्वीकारें आदरणीय शुक्ल जी, सादर आभार आपका।
At 11:19pm on November 7, 2015, जयनित कुमार मेहता said…
आपका हार्दिक आभार आदरणीय रवि जी..
 
 
 

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