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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Page

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Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post होश की मैं पैमाइश हूँ:........ग़ज़ल, पंकज मिश्र..........इस्लाह की विनती के साथ
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब, सबसे पहले आपकी ग़ज़ल के क़वाफ़ी के अर्थ देखते हैं :- "ख़्वागीश"--आरज़ू,तमन्ना "पैमाइश"---नाप,ख़ुसूसन ज़मीन का नाप "काविश"---तलाश "नाज़िश"---फ़ख़्र(गर्व),घमण्ड,मुहावरा-नाज़ होना,फ़ख़्र(गर्व)…"
10 hours ago
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted blog posts
13 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"प्यार मुझसे उनको हो फिर से ले ये दुनिया ही छोड़ देता हूँ.  ऐसे तो शुतुर्ग़ुर्बा के दोष का भ्रम हो रहा है. उनको को उसको कर लें तो इसकी थोडी भी संभावना बने तो वो भी जाती रहेगी.  शुभ-शुभ  "
yesterday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post होश की मैं पैमाइश हूँ:........ग़ज़ल, पंकज मिश्र..........इस्लाह की विनती के साथ
"जी प्रणाम, मुझे इन्तज़ार है"
yesterday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"आदरणीय अग्रज सौरभ पांडेय जी, सादर प्रणाम आपके सुझाव मेरे लिए बेशकीमती होते हैं, सुझावों के अनुरूप संशोधन अभी करता हूँ।"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"भाई, ग़ज़ब का क़ाफ़िया लिया है ! अब यह प्रयोग है तो है. उस हिसाब से तो प्रस्तुति वाकई रोचक बन पड़ी है. गोड़ना को जिस तरह से आपने प्रयुक्त किया है वह बरबस चकित कर रहा है.  लो मैं आँखें निचोड़ देता हूँ ... ले ये आँखें निचोड़ देता हूँ .. मुझे लगता…"
yesterday
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post होश की मैं पैमाइश हूँ:........ग़ज़ल, पंकज मिश्र..........इस्लाह की विनती के साथ
"आपकी ग़ज़ल पर पुनः आता हूँ,समय मिलते ही ।"
yesterday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

होश की मैं पैमाइश हूँ:........ग़ज़ल, पंकज मिश्र..........इस्लाह की विनती के साथ

22 22 22 2मयख़ानों की ख़ाहिश हूँ होश की मैं पैमाइश हूँचाँद न कर मुझ पर काविश ब्लैक होल की नाज़िश हूँहल ना कर पाओगे तुम ज़िद की ऐसी नालिश हूँजल जाएगा हुस्न तेरा मैं सूरज की ताबिश हूँआ मत मेरी राहों में तूफ़ानों की जुंबिश हूँमौलिक अप्रकाशितउर्दू का ज्ञान लगभग शून्य है, इसलिए, मुझे सन्देह है कि शायद मेरे भाव अस्पष्ट हों..….इसलिए हार्दिक विनती है कि इस ग़ज़ल के कथ्य पर भी सुझाव दिया जाएSee More
Tuesday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"आदरणीय बाउजी सादर प्रणाम"
Monday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"आदरणीय राज नवादवी साहब बहुत बहुत आभार"
Monday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"आदरणीय अजय सर ग़ज़ल पर समालोचनात्मक आशीर्वाद के लिए हृदय से आभार, सीख रहा हूँ अभी"
Monday
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Sunday
राज़ नवादवी commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"आदरणीय पंकज जी, आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. सादर. "
Sunday
Ajay Tiwari commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश
"आदरणीय पंकज जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई. ग़ज़ल में एक अतिशय निराशा का भाव है लेकिन वो शायद 'ड़' के काफ़िये की वज़ह ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाया है. शिल्प का वैचित्र्य कथ्य पर भारी पड़ गया है. सादर "
Saturday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश

2122 1212 22(112)याद के खेत गोड़ देता हूँघाव मन के यूँ फोड़ देता हूँउम्र भर का रिसाव ठीक नहींले ये आँखें निचोड़ देता हूँ मुक्त स्वच्छन्द हो उड़ान उसकीडोर रिश्तों की तोड़ देता हूँप्यार मुझसे न फिर से हो जाएले ये दुनिया ही छोड़ देता हूँ.कब तलक यूँ रहूँगा मैं बेघरकब्र से नाता जोड़ देता हूँमौलिक अप्रकाशितSee More
Nov 8
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post पीढ़ी को समझा दे पंकज, खेती ख़ातिर खेत बचा ले----ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण धामी सर ग़ज़ल को शुभकामनाएं देने के लिए बहुत-बहुत आभार"
Oct 15

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

होश की मैं पैमाइश हूँ:........ग़ज़ल, पंकज मिश्र..........इस्लाह की विनती के साथ

22 22 22 2

मयख़ानों की ख़ाहिश हूँ

होश की मैं पैमाइश हूँ

चाँद न कर मुझ पर काविश

ब्लैक होल की नाज़िश हूँ

हल ना कर पाओगे तुम

ज़िद की ऐसी नालिश हूँ

जल जाएगा हुस्न तेरा

मैं सूरज की ताबिश हूँ

आ मत मेरी राहों में

तूफ़ानों की जुंबिश हूँ

मौलिक अप्रकाशित

उर्दू का ज्ञान लगभग शून्य है, इसलिए, मुझे सन्देह है कि शायद मेरे भाव अस्पष्ट हों..….इसलिए हार्दिक विनती है कि इस ग़ज़ल के कथ्य…

Posted on November 13, 2018 at 12:00am — 3 Comments

याद के खेत गोड़ देता हूँ (ग़ज़ल) पंकज मिश्र: इस्लाह की गुज़ारिश के साथ पेश

2122 1212 22(112)

याद के खेत गोड़ देता हूँ

घाव मन के यूँ फोड़ देता हूँ

उम्र भर का रिसाव ठीक नहीं

ले ये आँखें निचोड़ देता हूँ 

मुक्त स्वच्छन्द हो उड़ान उसकी

डोर रिश्तों की तोड़ देता हूँ

प्यार मुझसे न फिर से हो जाए

ले ये दुनिया ही छोड़ देता हूँ.

कब तलक यूँ रहूँगा मैं बेघर

कब्र से नाता जोड़ देता हूँ

मौलिक अप्रकाशित

Posted on November 8, 2018 at 11:00am — 9 Comments

सिद्धिर्भवति कर्मजा-----ग़ज़ल

22 122 12

गीता में लिक्खा गया
सिद्धिर्भवति कर्मजा

बिन फल की चिंता करे
सद्कर्म करिए सदा

दिखता है जो कुछ यहाँ
सब खेल है काल का

ऊर्जा का सिद्धांत है
लक्षण है जो आत्म का

बदले हैं बस रूप ही
ऊर्जा हो या आत्मा

मौलिक अप्रकाशित

Posted on October 8, 2018 at 4:51pm — 8 Comments

शह्र अपना है बंट गया देखो------ग़ज़ल

2122 1212 22

शह्र अपना ये बँट गया देखो

सिम्बलों से लिपट रहा देखो

देश की फिक्र की सजी अर्थी

जाति का है कफ़न चढ़ा देखो

अब सभी को ख़याल बस अपना

संकुचित दायरा हुआ देखो

बस वहीं पर ही बन रहे रिश्ते

है जहाँ कोई फ़ायदा देखो

जाति बस काहिलों का है मुद्दा

जो था इंसाँ सफल हुआ देखो

कर्म करने का नाम जीवन है

साफ गीता में यह लिखा देखो

दर्द के या खुशी के हों आँसू

शेर पंकज…

Continue

Posted on September 19, 2018 at 8:30pm — 15 Comments

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At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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