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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

ये मान सरोवर का पंकज, आँखों में ढूंढे है पानी- पंकज मिश्रा की गजल

22 22 22 22 22 22 22 22कब रात हुई कब सुब्ह हुई, इस पत्थर ने कब है जानीजब ताप चढ़ा ग़म का बेहद, तब धड़कन ने की मनमानीचिंगारी पैदा होनी है, इस पत्थर से मत टकराओशोला ए इश्क़ ही भड़केगा, ग़र तूने बात नहीं मानीवो सभी कथानक कल्पित हैं, जिनमें प्रियतम से मिलन हुआइस देवदास की प्यास अमिट, जो साथ घाट तक है जानीले जाना है तो ले जाओ, ये कुंडल कलम व ग़ज़ल कवचइतिहास भला कैसे बदले, हर युग में कर्ण परम् दानीइस दर पर लक्ष्मण का स्वागत, लेकिन वो चरण शरण आयेहे राम अवध में कहीं नहीं, पंडित रावण जैसा ज्ञानीनज़रें नीची रख कर…See More
Nov 13
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"आदरणीय गिरिराज सर नें तो मेरा काम ही असान कर दिया है, सादर आभार"
Nov 13
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"आदरणीय रवि सर, गिरिराज सर तथा रामबली सर आप् सभी के सुझावों पर विचार के लिए समय नहीं निकाल सका, अब फुर्सत में हूँ, शीघ्र ही सुधार होगा"
Nov 13
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"आदरणीय गोपाल सर सादर प्रणाम"
Nov 13
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"आदरणीय बाऊजी सादर आभार, बहुत दिनों बाद उत्तर दे पा रहा हूँ, क्षमा निवेदन है"
Nov 13
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post was featured

तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल

2122 2122 212धीरे धीरे फासला घटना ही थाहौले हौले रास्ता कटना ही थाएक भ्रम का कोई पर्दा अब तलकमन पे अपने था पड़ा, हटना ही थाख़ाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तोलब से तेरे नाम को रटना ही थाहर तरफ़ है लोभ प्रेरित आचरणचित ये जग से तो मेरा फटना ही थाकिस तरफ जाता कुहासा था घनातेरे आने से धुंआ छँटना ही थामौलिक अप्रकाशितSee More
Nov 7
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल
"आदरणीय ब्रजेश जी आपने सही पकड़ा है, उक्त शेर को जल्द सुधारूँगा"
Nov 6
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल
"बड़ी अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय...इसे समीक्षात्मक टिप्पड़ी कतई न समझें..ग़ज़ल में दो काफिये निभाए गए हैं लेकिन तीसरा शेर भिन्न हो रहा है..क्या मैं सही हूँ..??सादर"
Nov 6
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल
"आदरणीय बाऊजी आपके सुझाव हमेशा ही उचित होते हैं, मुझे सीखने में सहायता प्रदान करते हैं। आपने सही कहा, दोष है; मैं सुधारता हूँ, जल्द ही। इस ग़ज़ल में एक खास पैटर्न है, एक बार उस पर भी वाद प्रदान करें, इस ग़ज़ल में काफ़िया नहीं, काफ़िये हैं।।। सादर"
Nov 6
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल
"आदरणीय आरिफ़ सर सादर आभार।"
Nov 6
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'ख़्वाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तो लब से तेरे नाम को रटना ही था' इस शैर में शुतरगुर्बा है, इसे यूँ कर सकते हैं :- 'ख़्वाहिशें हैं जब मेरी तुझसे ही तो मुझको…"
Nov 6
Mohammed Arif commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल
"शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय पंकज जी । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।"
Nov 6
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

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"इसमें 2 मात्रा बढ़ गई है"
Oct 28
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-88
"आदरणीय सुरेन्द्र जी ग़ज़ल पर अभिप्रेरक टिप्पणी के लिए सादर आभार"
Oct 28
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-88
"आदरणीय अफ़रोज़ जी सादर आभार समय तो पूरा मिला था लेकिन मैं इससे से अधिक लिखी नहीं पाया,हा हा हा"
Oct 28

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल

2122 2122 212

धीरे धीरे फासला घटना ही था
हौले हौले रास्ता कटना ही था

एक भ्रम का कोई पर्दा अब तलक
मन पे अपने था पड़ा, हटना ही था

ख़ाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तो
लब से तेरे नाम को रटना ही था

हर तरफ़ है लोभ प्रेरित आचरण
चित ये जग से तो मेरा फटना ही था

किस तरफ जाता कुहासा था घना
तेरे आने से धुंआ छँटना ही था

मौलिक अप्रकाशित

Posted on November 5, 2017 at 10:35pm — 6 Comments

तब सिवा परमेश्वर के औ'र जला है कौन-----गज़ल, पंकज मिश्र

2122 2122 2122 2122



धीरे धीरे दूर दुनिया से हुआ है कौन आख़िर

हौले हौले तेरी यादों में घुला है कौन आख़िर



आग के शोले जले जब भी हुआ उत्पात तब तब

इक सिवा परमेश्वर के औ'र जला है कौन आख़िर



ग्रन्थ लाखों और पढ़ने वाले अरबों लोग तो हैं

पर मुझे मिलता नहीं पढ़ कर जगा है कौन आख़िर



माँ पिता गुरु के चरण रज से रहा जो दूर है वो

पत्थरों के घर में प्रभु से मिल सका है कौन आख़िर



इक मधुर अहसास खश्बू से भरी है साँस 'पंकज'

धड़कनों से रागिनी बन कर… Continue

Posted on October 12, 2017 at 5:30pm — 13 Comments

सवालों का पंछी सताता बहुत है-गीत

मुझे रात भर ये भगाता बहुत है

सवालों का पंछी सताता बहुत है



कभी भूख से बिलबिलाता ये आये

कभी आँख पानी भरी ले के आये



कभी खूँ से लथपथ लुटी आबरू बन

तो आये कभी मेनका खूबरू बन



धड़कन को मेरी थकाता बहुत है

सवालों का पंछी सताता बहुत है।।1।।



कभी युद्ध की खुद वकालत करे ये

अचानक शहीदों की बेवा बने ये



कभी गर्भ अनचाहा कचरे में बनकर

मिले है कभी भ्रूण कन्या का बनकर



निगाहों को मेरी रुलाता बहुत है

सवालों का पंछी… Continue

Posted on October 11, 2017 at 9:43pm — 4 Comments

खुद से मुझ को अलग करो----- ग़ज़ल पंकज मिश्र द्वारा

22 22 22 22

खुद से मुझ को अलग करो तो
फिर कहना तुम ज़िंदा भी हो

याद मुझे करते हो तुम भी
हिचकी से ये कहलाया तो

कोल कर दिया अरमाँ जिससे
कोहेनूर बन कर चमकें वो

दुर्लभ एक सुकून प्यास में
साक़ी को ही लौटाया तो

बदली छाई मानो तुमने
ज़ुल्फ़ घनी फिर बिखराया हो


मौलिक अप्रकाशित

मौलिक अप्रकाशित

Posted on September 15, 2017 at 5:30pm — 17 Comments

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At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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