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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog (139)

हृदय अपना जिसनें समंदर किया है-----ग़ज़ल

122 122 122 122

युगों तक जगत में वही जी सका है

हृदय अपना जिसने समंदर किया है

हक़ीक़त से नज़रें हटाने से यारो

कभी झूठ भी क्या कहीं सच हुआ है?

कहाँ रात के मानकों से हो चिपके

उजाले का वाहक तो सूरज रहा है

गरल एकता के लिए पीना होगा

सिखाती सभी को परम शिव कथा है

'सुनो आइनो तुम भी पढ़ लो सुकूँ से

कि 'पंकज' ने सब सामने रख दिया है'  (आदरणीय बाऊजी समर कबीर द्वारा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 21, 2018 at 3:00pm — 15 Comments

जानें क्या बात है आज कल, दर्द अपना छिपाने लगा---ग़ज़ल

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जानें क्या बात है आज कल, दर्द अपना छिपाने लगा

हाल उसका पता कीजिए, वो बहुत मुस्कुराने लगा

हम उसे बस यूँ ही चारागर, झूठे ही तो नहीं लिख दिए

एक बेजान से बुत में भी, वो जो धड़कन चलाने लगा

उसको पागल नहीं जो कहें, तो भला नाम क्या और दें

एक निर्जन नगर में कोई, स्वप्न के घर बसाने लगा

शुक्रिया आपका शुक्रिया है ये तोहफा बहुत कीमती

देखिए तो विरह का असर शेर मैं गुनगुनाने लगा

उम्र भर की ख़लिश…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 20, 2018 at 12:00am — 14 Comments

स्वार्थ नें राष्ट्र की है सजाई चिता-----ग़ज़ल

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स्वार्थ नें राष्ट्र की है सजाई चिता

जाति की अग्नि से चिट चिटाई चिता

भारती माँ तड़प कर कराहे सुनो

पूछती जीते जी क्यूँ सजाई चिता?

प्रीत के व्योम पर द्वेष धूम्राक्ष है

लोभियों नें वतन की जलाई चिता

राजगद्दी के लोभी हैं शामिल सभी

पूछिए मत कि किसनें लगाई चिता?

आग है जो लगी आप जल जाएंगे

बढ़ के आगे न यदि जो बुझाई चिता

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 4, 2018 at 11:30pm — 14 Comments

सराबोर कर दे तेरे रंग से अब----होली विशेष

122 122 122 122

मुझे ढ़ाल दे अपने ही ढंग से अब
सराबोर कर खुद के ही रंग से अब

ज़रूरी है  ख़श्बू फ़िज़ाओं में बिखरे
बदन की तुम्हारे मेरे अंग से अब

न मुझसे चला जा रहा होश में है
तू मदहोश कर रूप की भंग से अब

है महफ़िल में भी मन हमारा अकेला
उमंगें इसे दे तेरे संग से अब

न जाने है कैसी जो मिटती नहीं है
मनस सींच तू प्रीत की गंग से अब

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 2, 2018 at 10:30am — 8 Comments

वर्ना खुलता ही कहाँ ये मनस-पट------ग़ज़ल

2122 2122 122

दिल में नफ़रत होठों पे मुस्कुराहट

सबके वश में है क्या ऐसी बनावट?

कान मेरी ओर मत कीजिएगा

दिल जो टूटे तो नहीं होती आहट

आसमाँ में रंग बिखरेगा फिर से,

कह रहा था स्वप्न, मैंने कहा; हट

मान जा मन छोड़ उद्दंडता अब

दौड़ना अच्छा नहीं, ऐसे सरपट?

कोई जादू तेरी आँखों में तो है

वर्ना खुलता ही कहाँ ये मनस-पट

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 17, 2018 at 1:28pm — 3 Comments

स्वप्न का जो नाभिकी ये संलयन प्रारम्भ है----ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

स्वप्न का जो नाभिकी ये संलयन प्रारम्भ है

क्या किसी तारे का फिर से नव सृजन प्रारम्भ है

इस जगत को श्रेष्ठतम रचना समर्पित कर सकूँ

प्रति निशा मसि शब्द निद्रा का हवन प्रारम्भ है

मन-जगत घर्षण से अंतस में अनल जो है प्रकट

भावनाओं का उसी से आचमन प्रारम्भ है

लेखनी नें स्वयं से संकल्प इक धारण किया

एकता के भाव का सो संवहन प्रारम्भ है

चक्षुओं पर जो लगा कर घूमते चश्मा उन्हें

ताप…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 5, 2018 at 5:07pm — 14 Comments

लिप्सा के परित्याग से खिलता आत्म प्रसून

दोहा/ ग़ज़ल

चाहत के तूफान में, उजड़े चैन सुकून

चिंता में जल कर हुआ, भस्म खुदी का खून

गीता में लिक्खा गया, राहत का मजमून

लिप्सा के परित्याग से, खिलता आत्म-प्रसून

संग्रह का जो रोग है, बढ़ता प्रतिपल दून

लोभ अग्नि में हे! मनुज, यूँ खुद को मत भून

सुख का एक उपाय बस, इच्छा करिए न्यून

बाकी मर्ज़ी आपकी, खटिए चारो जून

मनस वेदना के लिए, यह बढ़िया माजून

सो पंकज नें कर लिया, लेखन एक जुनून

मौलिक…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 16, 2018 at 11:23am — 11 Comments

बुलाऊँ नींद, तेरा आना अब ज़रूरी है-ग़ज़ल

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तुम्हारे दीद की ख़ाहिश अभी अधूरी है

इसीलिए तो निगाहें खुली ही छोड़ी है

तमाम ख़ाब हैं आँखों में तेरी ही ख़ातिर

बुलाऊँ नींद, तेरा आना अब ज़रूरी है

किसी अज़ीज़ नें आख़िर मुझे सिखाया तो

यूँ रोज़ रोज़ ग़ज़ल लिखना बेवकूफ़ी है

जहाँ के लोगों के दुःख दर्द का गरल अपने

उतारा सीने में तब ही कलम ये पकड़ी है

बताऊँ कैसे उन्हें शायरी जुनून हुई

नसों में दौड़ती पंकज के, ये बीमारी है

मौलिक…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 11, 2018 at 5:41pm — 7 Comments

जाने सूरज कब निकले है वक्त अभी रुसवाई का------गज़ल

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नैन में रैन गँवाए जाऊँ, वक्त पहाड़ जुदाई का

जाने सूरज कब निकले, है वक्त अभी रुसवाई का

उनको कोई ग़रज़ नहीं जो पूछें हाल हमारा भी

कोई दूजी वज्ह नहीं, परिणाम है कान भराई का…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 9, 2018 at 4:30pm — 14 Comments

प्रतिबंधित मुलाकात हुई है-ग़ज़ल

22 22 22 22

उनसे मेरी बात हुई है
प्रतिबंधित मुलाक़ात हुई है

सारे स्वप्न तरल हैं मेरे
देखो तो बरसात हुई है

स्याही बन कर भस्म्है बिखरी
यूँ न अधेरी रात हुई है

मन खुद में ही खोज खुदी से
शांति कहाँ, आयात हुई है

दिल वो जीते दर्द मग़र हम
मत समझो बस मात हुई है

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 8, 2018 at 9:00pm — 19 Comments

लजाते हो क्यूँ तुम-गीत

जो हमसे मोहब्बत नहीं है तो हमको

बताओ कि हमसे लजाते हो क्यूँ तुम?

निगाहें मिला कर निगाहों को अपनी

झुकाते हो हमसे छिपाते हो क्यूँ तुम?

कभी फेरना पत्तियों पर उँगलियाँ,

कभी फूल की पंखुड़ी पर मचलना

अचानक सजावट की झाड़ी को अपनी

हथेली से छूते हुए आगे बढ़ना

ये शोखी ये मस्ती दिखाते हो क्यूँ…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 4, 2018 at 8:00am — 8 Comments

ग़ज़ल - घाट पर सोया मिलूँगा ये बता देता हूँ मैं

2122 2122 2122 212

आज अपना सारा ईगो ही जला देता हूँ मैं

बर्फ़ रिश्तों पर जमी उसको हटा देता हूँ मैं

मेरे होने की घुटन तुमको न हो महसूस अब

ज़िन्दगी खोने का खुद को हौसला देता हूँ मैं

नाम दूँ बदनामियाँ दूँ, मेरे वश में है नहीं

सो मेरे होठों को चुप रहना सिखा देता हूँ मैं

तेरे चहरे पर शिकन संकोच अब आए नहीं

इसलिए सौगात में अब फ़ासला देता हूँ मैं

कुछ नहीं बस हार इक ला कर चढ़ा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 2, 2018 at 9:00am — 23 Comments

तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल

2122 2122 212

धीरे धीरे फासला घटना ही था
हौले हौले रास्ता कटना ही था

एक भ्रम का कोई पर्दा अब तलक
मन पे अपने था पड़ा, हटना ही था

ख़ाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तो
लब से तेरे नाम को रटना ही था

हर तरफ़ है लोभ प्रेरित आचरण
चित ये जग से तो मेरा फटना ही था

किस तरफ जाता कुहासा था घना
तेरे आने से धुंआ छँटना ही था

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 5, 2017 at 10:35pm — 6 Comments

तब सिवा परमेश्वर के औ'र जला है कौन-----गज़ल, पंकज मिश्र

2122 2122 2122 2122



धीरे धीरे दूर दुनिया से हुआ है कौन आख़िर

हौले हौले तेरी यादों में घुला है कौन आख़िर



आग के शोले जले जब भी हुआ उत्पात तब तब

इक सिवा परमेश्वर के औ'र जला है कौन आख़िर



ग्रन्थ लाखों और पढ़ने वाले अरबों लोग तो हैं

पर मुझे मिलता नहीं पढ़ कर जगा है कौन आख़िर



माँ पिता गुरु के चरण रज से रहा जो दूर है वो

पत्थरों के घर में प्रभु से मिल सका है कौन आख़िर



इक मधुर अहसास खश्बू से भरी है साँस 'पंकज'

धड़कनों से रागिनी बन कर… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 12, 2017 at 5:30pm — 13 Comments

सवालों का पंछी सताता बहुत है-गीत

मुझे रात भर ये भगाता बहुत है

सवालों का पंछी सताता बहुत है



कभी भूख से बिलबिलाता ये आये

कभी आँख पानी भरी ले के आये



कभी खूँ से लथपथ लुटी आबरू बन

तो आये कभी मेनका खूबरू बन



धड़कन को मेरी थकाता बहुत है

सवालों का पंछी सताता बहुत है।।1।।



कभी युद्ध की खुद वकालत करे ये

अचानक शहीदों की बेवा बने ये



कभी गर्भ अनचाहा कचरे में बनकर

मिले है कभी भ्रूण कन्या का बनकर



निगाहों को मेरी रुलाता बहुत है

सवालों का पंछी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 11, 2017 at 9:43pm — 4 Comments

खुद से मुझ को अलग करो----- ग़ज़ल पंकज मिश्र द्वारा

22 22 22 22

खुद से मुझ को अलग करो तो
फिर कहना तुम ज़िंदा भी हो

याद मुझे करते हो तुम भी
हिचकी से ये कहलाया तो

कोल कर दिया अरमाँ जिससे
कोहेनूर बन कर चमकें वो

दुर्लभ एक सुकून प्यास में
साक़ी को ही लौटाया तो

बदली छाई मानो तुमने
ज़ुल्फ़ घनी फिर बिखराया हो


मौलिक अप्रकाशित

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 15, 2017 at 5:30pm — 17 Comments

निहारता तो हूँ तुम्हें, चोरी से चुपके से- गजल, पंकज मिश्र

1212 1212 222 222

निहारता तो हूँ तुम्हें, चोरी से चुपके से
विचारता तो हूँ तुम्हें, झपकी ले चुपके से

कभी तुम्हारे नाम से ज्यादा कुछ लिक्खा कब?
सँवारता तो हूँ तुम्हें, कॉपी पे चुपके से

मिलन को जब भी तुम मेरे सपनों में आई हो
निखारता तो हूँ तुम्हें, लाली दे चुपके से

बजे है जल तरंग सी छन छन तेरी पायल जब
उतारता तो हूँ तुम्हें, वंशी पे चुपके से

उदासियों से जब भी घिर जाता है मेरा मन
पुकारता तो हूँ तुम्हें, आ भी रे चुपके से

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 14, 2017 at 12:05am — 12 Comments

यह चक्र धारी तिरंगे में ही नज़ाफ़त है-----पंकज मिश्र

1212 1122 1212 22

मेरे वतन की फ़िज़ाओं में जो मुहब्बत है
इसे बचाऊँ मैं हर हाल, मेरी चाहत है

हिमालया से लगायत महान सागर तक
परम पिता ने लिखी हिन्द की ये आयत है

तमाम लोगों ने कोशिश करी बदलने की
मगर वो हारे, विविधता में इसकी ताकत है

सफ़ेद पगड़ी हरा कुर्ता केसरी धोती
ये चक्र धारी तिरंगे में ही नज़ाफ़त है

अज़ान भी है भजन भी है चर्च की घण्टी
इसी वजह से वतन अपना खूबसूरत है

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2017 at 12:00am — 14 Comments

रिश्ते में नुकसान जोड़ते पाई पाई------इस्लाह के लिए ग़ज़ल

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रिश्ते में नुकसान जोड़ते पाई पाई।
आँगन में दीवार खींचते भाई भाई।।

वाह रुपये खूब तुम्हारी भी है माया।
पुत्र बसा परदेश गाँव में बाबू- माई।।

कलयुग कैसी है ये तेरी काली छाया
साथ नहीं देती है खुद की ही परछाई।।

नातेदारी मृग मरीचिका में उलझी है
जानें कितनी लाश गिरेगी रे'त में भाई।।

पंकज बैठा लिये तराजू आओ लोगों
नाप-जोख कर भाव लगाकर करो मिताई।।

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 11, 2017 at 11:00am — 24 Comments

आँखों के दरिया के जल का भी बँटवारा होना चहिये- गजल

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आँखों के दरिया के जल का भी बँटवारा होना चहिये

दुखिया के गम का कुछ ऐसे वारा न्यारा होना चहिये



मज़हब कौम पंथ वंशावलि सबका आप ध्यान धरिये पर

जिसकी वादी में रहते हैं मुल्क वो प्यारा होना चहिये



गीत ग़ज़ल कविता अभिभाषण विधा भले ही चाहे जो हो

पर पंकज के शब्दों में एहसास तुम्हारा होना चहिये



ऊँचा उठने की ख्वाहिश हो तो अन्तस को क्षितिज बनाएं

पर ये याद रहे धरती पर पाँव हमारा होना चहिये



बन्दर घुड़की कब तक साहब कब… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 27, 2017 at 12:01am — 10 Comments

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