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मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

मीडिया भारत का या तो वायरस यक बन गया

दीमकों के साथ मिलकर या के दीमक बन गया

मीडिया का काम था जनता की ख़ातिर वो लड़े

किन्तु वो सत्ता के उद्देश्यों का पोषक बन गया

दोस्तों टी वी समाचारों का चैनल त्यागिए

क्योंकि उनके वास्ते हर दर्द नाटक बन गया

क्या दिखाना है, नहीं क्या क्या दिखाना चाहिए

कुछ न, जाने मीडिया, सो अब ये घातक बन गया

ज़ह्र भर कर शब्द में, वो वार जिह्वा से करे

न्यूज़ का हर एंकर नफ़रत-प्रसारक बन गया

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 5, 2019 at 4:48pm

"यक" उचित होगा ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2019 at 4:29pm

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, अभी संशोधन करता हूँ.....उला मिसरे में "यक" रखने से शायद दोष दूर हो जाये

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2019 at 4:28pm

आदरणीय हरिओम जी सादर आभार

Comment by Samar kabeer on March 5, 2019 at 3:58pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के ऊला में क़ाफ़िया दोष है देखियेगा ।

Comment by Hariom Shrivastava on March 4, 2019 at 10:59pm

वाहह,वाहहह,बहुत सुंदर ग़ज़ल

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 4, 2019 at 5:28pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 4, 2019 at 5:28pm

आदरणीय सतविंदर भाई बहुत बहुत आभार, रचना को समर्थन देकर आपने इसका कद और बढ़ाया है। सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 4, 2019 at 1:38pm

आ. भाई पंकज जी, सुंदर प्रस्तुति हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 4, 2019 at 1:07pm

आदरणीय पंकज भाई जी सादर वन्दन! उत्तम व चिंतनपरक सर्जना। जय जय

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