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Dharmendra Kumar Yadav
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Dharmendra Kumar Yadav's Page

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post तब जाकर नानी कहलाई
"आ. भाई धर्मेन्द्र जी, अच्छी समसामयिक रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Apr 29
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post तब जाकर नानी कहलाई
"आद0 धर्मेंद्र कुमार यादव जी सादर अभिवादन। बढ़िया बाल कविता लिखी है आपने, बधाई स्वीकार कीजिये।"
Apr 29
Dharmendra Kumar Yadav posted a blog post

तब जाकर नानी कहलाई

नन्हीं बिटिया जग में आईबड़ी उदासी घर में छाई! सब के सब हैं चुपचाप मगर मैया की छाती भर आई।।जन्म दिया मैया कहलाई पर इक बात समझ ना आई नानी है या कोई मिसरी? माँ से भी मीठी कहलाई।।पहले बिटिया बनकर आई फिर बिटिया को जग में लाई माँ बनती जब, माँ की बिटिया तब जाकर नानी कहलाई।।"मौलिक व अप्रकाशित"See More
Apr 28
Manoj Yadav commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post भूल गया मैं लिखना कविता
"VERY NICE POEM  KEEP IT UP !!!!!!! मन को छू गयी यह कविता  !!!!"
Apr 14
Dharmendra Kumar Yadav posted a blog post

भूल गया मैं लिखना कविता

जब से तुमको, देखा सविता। भूल गया मैं, लिखना कविता।।भाता मुझको, पैदल चलना।तुम चाहो, अंबर में उड़ना। सैर-सपाटा, बँगला-गाड़ी। फैशन नया, रेशमी साड़ी। सखियाँ तेरी, इशिता शमिता। भूल गया मैं, लिखना कविता।।तुमको प्यारे, गहने जेवर। नखरे न्यारे, तीखे तेवर। होकर विह्वल, संयम खोती। हँसती पल में, पल में रोती। आँसू बहते, जैसे सरिता। भूल गया मैं, लिखना कविता।।नारी धर्म, निभाया तूने। माँ बनकर, दिखलाया तूने। स्वाति बूँद मैं, तू है सीपी। चातक बनूँ, पुकारूँ पी पी। पी हूँ मैं, तू मेरी वनिता। लिख दी मैंने, तुम पर…See More
Apr 14
Dharmendra Kumar Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-114
"कोरोना के कहर से, जीना हुआ हराम।किरण नई उम्मीद की, तुम ही भेजो राम। "मौलिक व अप्रकाशित""
Apr 12
Manoj Yadav commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post इक देश बनाएं सपनों का
"बहुत अच्छी रचना !!!!! Congratulation"
Apr 6
Samar kabeer commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post इक देश बनाएं सपनों का
"जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 6
Shyam Narain Verma commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post इक देश बनाएं सपनों का
"नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Apr 6
Dharmendra Kumar Yadav posted a blog post

इक देश बनाएं सपनों का

सुख-दुख में साथ निभाएं अपनों का | आओ, इक देश बनाएं सपनों का ||फसलों पर, ना मौसम की मार पड़े | कृषि हो उन्नत, ना हों परिवार बड़े | घर-घर नलका, बिजली, शौचालय हो | गाँव-गाँव रुग्णालय, विद्यालय हो | तजि कुरीति, संग धरें नव चलनों का | आओ, इक गांव बसाएं सपनों का ||जन-जन को, उपयुक्त रोजगार मिले | जीवन को, सुरभित स्वच्छ बयार मिले | सुलभ निवास, सुविधाजनक प्रवास हो | धवल सादगी का बिखरा प्रकाश हो | फीकी जो करे चमक, नव रतनों का | आओ, इक शहर सजाएं सपनों का ||भेद-भाव, मन के भीतर न द्वेष हो | धर्म-जाति, भाषा…See More
Apr 6
Dharmendra Kumar Yadav posted a photo
Apr 6
Dharmendra Kumar Yadav updated their profile
Apr 6
Dharmendra Kumar Yadav is now a member of Open Books Online
Apr 6

Profile Information

Gender
Male
City State
Thane, Maharashtra
Native Place
Village- Soirai, Post-Baresta Kalan, District- Allahabad
Profession
Auditing
About me
Simple Person

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तब जाकर नानी कहलाई

नन्हीं बिटिया जग में आई

बड़ी उदासी घर में छाई!
सब के सब हैं चुपचाप मगर
मैया की छाती भर आई।।

जन्म दिया मैया कहलाई
पर इक बात समझ ना आई
नानी है या कोई मिसरी?
माँ से भी मीठी कहलाई।।

पहले बिटिया बनकर आई
फिर बिटिया को जग में लाई
माँ बनती जब, माँ की बिटिया
तब जाकर नानी कहलाई।।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on April 26, 2020 at 3:30pm — 3 Comments

भूल गया मैं लिखना कविता

जब से तुमको, देखा सविता।

भूल गया मैं, लिखना कविता।।

भाता मुझको, पैदल चलना।

तुम चाहो, अंबर में उड़ना।

सैर-सपाटा, बँगला-गाड़ी।

फैशन नया, रेशमी साड़ी।

सखियाँ तेरी, इशिता शमिता।

भूल गया मैं, लिखना कविता।।

तुमको प्यारे, गहने जेवर।

नखरे न्यारे, तीखे तेवर।

होकर विह्वल, संयम खोती।

हँसती पल में, पल में रोती।

आँसू बहते, जैसे सरिता।

भूल गया मैं, लिखना कविता।।

नारी धर्म, निभाया तूने।

माँ बनकर,…

Continue

Posted on April 14, 2020 at 4:30pm — 1 Comment

इक देश बनाएं सपनों का

सुख-दुख में साथ निभाएं अपनों का |

आओ, इक देश बनाएं सपनों का ||

फसलों पर, ना मौसम की मार पड़े |

कृषि हो उन्नत, ना हों परिवार बड़े |

घर-घर नलका, बिजली, शौचालय हो |

गाँव-गाँव रुग्णालय, विद्यालय हो |

तजि कुरीति, संग धरें नव चलनों का |

आओ, इक गांव बसाएं सपनों का ||

जन-जन को, उपयुक्त रोजगार मिले |

जीवन को, सुरभित स्वच्छ बयार मिले |

सुलभ निवास, सुविधाजनक प्रवास हो |

धवल सादगी का बिखरा प्रकाश हो |

फीकी जो करे चमक, नव…

Continue

Posted on April 6, 2020 at 4:00pm — 4 Comments

 
 
 

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