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Samar kabeer
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Tasdiq Ahmed Khan commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है , दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, बहुत खूबसूरत गजल कही है आपने. बहुत मुबारकबाद कुबूलें. सादर."
6 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"वाह वाह लाजबाब "
7 hours ago
Mohit mishra (mukt) commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"आदरणीय समर सर गज़ब की गज़ल कही है आपने। आपके शब्दार्थों के कारण गज़ल का भाव समझ पाया। इसके लिए आभार"
8 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post जाम ... (एक प्रयास)
"'संग' का अर्थ हिन्दी में साथ है और उर्दू में पत्थर,हिन्दी के अनुसार 'संग'को "सँग"किया जा सकता है,लेकिन उर्दू में ये 'संग'ही रहेगा । 'संग अब इलज़ाम भी है' को संशोधित कर दीजिये ।"
9 hours ago
Sushil Sarna commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"चढ़े इक बार जिस पर फिर न उतरेमहब्बत का तू ऐसा रंग हो जा वाह आदरणीय समर कबीर साहिब बहुत ही दिलकश ग़ज़ल है। हार्दिक बधाई सर। सर ये महब्बत कहीं मोहब्बत तो नहीं ?"
12 hours ago
Gurpreet Singh commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"आदरणीय समर सर जी,,, एक और उम्दा ग़ज़ल के लिए आपको ढेरों ढेर बधाई "
13 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post जाम ... (एक प्रयास)
"'सँग अब इल्ज़ाम भी है' आपने इस मिसरे में 'सँग'शब्द में भी चंद्र बिंदु लगा दिया,इस ऐसे ही रहने दें :- "संग अब इल्ज़ाम भी है' संशोधन उस वक़्त किया करें जब कुछ टिप्पणियां आ जाएं,वरना कितनी बार संशोधन करेंगे ?"
13 hours ago
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post 'अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो'
"जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।"
14 hours ago
Ravi Shukla commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"आदरणीय समर साहब बहुत ही खूबसूरती से आपने अपनी बात गजल के अश्‍ाआर में कही है हर शेर नायाब है सामान्‍य से लगने वाले कवाफी के निहायत ही उम्‍दा इसतेमाल ने उन्‍हे खास बना दिया कुछ नये अल्‍फाज भी जानने को मिले । इस गजल के लिये शेर दर…"
15 hours ago
Mohammed Arif commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"हिमाक़त छोड़ दे फ़रहंग हो जा महब्बत कर किसी के संग हो जा । वाह!वाह!! कमाल का मतला कहा है आपने । हर शे'र बेजोड़-बेमिसाल है । फिर एक और धमाकेदार ग़ज़ल का आगाज़ । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।"
16 hours ago
vijay nikore commented on Samar kabeer's blog post 'अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो'
"वाह ! इतनी दिलकश गज़ल । आप से यही उमीद रहती है और आप इस उमीद को पूरा करते हैं। आपको ढेरों बधाई, आदरणीय भाई समर कबीर जी।"
16 hours ago
Samar kabeer posted blog posts
17 hours ago
Samar kabeer commented on Manisha Saxena's blog post शुरूआत (लघुकथा)
"मोहतरमा मनीषा सक्सेना जी आदाब,अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
yesterday
Samar kabeer commented on vijay nikore's blog post आलोकग्रह ... (संस्मरण -- डा० रामदरश मिश्र जी)
"जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,अपनी याददाश्त को काग़ज़ पर उकेरना भी एक फ़न है, और इस फ़न में भी आपकी महारत देख कर दंग हूँ,बहुत सी जानकारियां भी साझा हुई हैं,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।"
yesterday
Samar kabeer commented on KALPANA BHATT's blog post पक्का घड़ा ( लघुकथा )
"बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें और गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।"
yesterday

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Samar kabeer's Blog

'महब्बत कर किसी के संग हो जा'

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



हिमाक़त छोड़ दे फ़रहंग हो जा

महब्बत कर किसी के संग हो जा



ग़ज़ल मेरी सुना लहजे में अपने

मैं गूँगा हूँ मेरा आहंग हो जा



यहाँ घुट घुट के मरने से है बहतर

निकल मैदाँ में मह्व-ए-जंग हो जा



करे अपना के दुनिया फ़ख़्र जिस पर

वफ़ा का वो निराला ढंग हो जा



चढ़े इक बार जिस पर फिर न उतरे

महब्बत का तू ऐसा रंग हो जा



ये दुनिया सीधे साधों की नहीं है

उदासी छोड़ शौख़्-ओ-शंग हो जा



जुदा ता उम्र कोई कर न… Continue

Posted on July 24, 2017 at 12:00am — 8 Comments

'ये लहू दिल का चूस्ती है बहुत'

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान

ज़ह्न में यूँ तो रौशनी है बहुत
पर जमी इसमें गंदगी है बहुत

इतना आसाँ नहीं ग़ज़ल कहना
ये लहू दिल का चूस्ती है बहुत

एक एक पल हज़ार साल का है
चार दिन की भी ज़िन्दगी है बहुत

चींटियाँ सी बदन पे रेंगती हैं
लम्स में तेरे चाशनी है बहुत

फ़न ग़ज़ल का "समर"सिखाने को
एक 'दरवेश भारती'है बहुत
---
लम्स-स्पर्श
समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

Posted on July 18, 2017 at 11:03am — 25 Comments

'अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो'

मफ़ाइलुन फ़्इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

ख़ुलूस-ओ-प्यार की उनसे उमीद कैसे हो

जो चाहते हैं कि नफ़रत शदीद कैसे हो



छुपा रखे हैं कई राज़ तुमने सीने में

तुम्हारे क़ल्ब की हासिल कलीद् कैसे हो



बुझे बुझे से दरीचे हैं ख़ुश्क आँखों के

शराब इश्क़ की इनसे कशीद् कैसे हो



हमेशा घेर कर कुछ लोग बैठे रहते हैं

अदब पे आपसे गुफ़्त-ओ-शुनीद कैसे हो



इसी जतन में लगे हैं हज़ारहा शाइर

अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे… Continue

Posted on July 13, 2017 at 11:41am — 36 Comments

यहाँ के लोग महब्बत शदीद करते हैं

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ये काम आज के एह्ल-ए-जदीद करते हैं

ग़ज़ल के मुँह पे तमांचा रसीद करते हैं



लगे हुए तो हैं पैहम इसी तग-ओ-दौ में

हमें वो देखिये किस दिन शहीद करते हैं



ये नफ़रतें तो महज़ आरज़ी हैं,सच ये है

यहाँ के लोग महब्बत शदीद करते हैं



मुसालहत की अगर आरज़ू है तुमको भी

तो आओ बैठ कर गुफ़्त-ओ-शुनीद करते हैं



वफ़ा से दूर तलक जिन को वास्ता ही नहीं

ये लोग उनसे इसी की उमीद करते हैं



तू भूल से भी "समर" मेरा… Continue

Posted on July 10, 2017 at 12:31am — 26 Comments

Comment Wall (12 comments)

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At 10:54am on October 9, 2016, सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' said…
आदरणीय समर कबीर साहिब प्रणाम आपको।

गजल विधा सिखने का इच्छुक हूँ और मैंने दूसरी गजल आज इस पटल पर रखी है।

आपके आने से मेरा घर जग जगमगाया।

आपक नजर कर मुझे कुछ सुझाव देंगे तो आगे से मुझे कुछ सीखने में मदद मिलेगी। सादर
At 11:29am on September 26, 2016, Kalipad Prasad Mandal said…

आदरणीय समीर कबीर साहिब आदाब , आपको थोड़ा कष्ट दे रहा हूँ क्योंकि ग़ज़ल में जितनी जानकारी आपको है शायद मेरी जानकारी में और कोई नहीं है | मैं कुछ शे'र ग़ालिब के पढ़ रहा था और उनके बहर जांच कर रहा था अपनी जानकारी केलिए | दो शेर में अटक गया हूँ ,नीचे लिखा है :-

बेनिया/जी हद से गुज/री , बन्दा पर/वर कब तलक 

२१२/ २२१ २/           1222        / २२१२ 

हम कहें/गे हाले  दिल, और आ/प फरमाएं/गे क्या 

२१२/     २२१    २ /   २१२ /    १  222   /२२(१२)

गर किया /नासेह ने/ हमको कै/द ,अच्छा यूं स/ही 

२१२/      २२१२/      212     /२२ २१/२ 

ये जुनू/ने -इश्क के /अंदाज़ छुट /जायेंगे क्या 

212/   २२१२/        221२/       2212

कृपया आप इस्नके सही बहर बताने का कष्ट करें |

सादर 

At 11:08pm on September 24, 2016, Samar kabeer said…
सरिता जी आप किस विषय में
पूछ रही हैं ?
At 9:14pm on September 24, 2016, sarita panthi said…
आदरणीय सर क्या मैंने अब सही जगह पोस्ट की है ?
At 3:16pm on September 19, 2016, Dipu mandrawal said…
आदरणीय समीर कबीर जी आपने मेरी कविताओं को पढ़ा और पसंद किया इसके लिए मेरा प्रणाम स्वीकार करें । Dipu Mandrawal
At 12:07pm on July 26, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय समर सर मेरे मित्रता के निवेदन को स्वीकार करके आपने मुझे अपना आशीर्वाद दिया है मेरे तकरीबन हर रचना को आपका मार्गदर्शन मिलता  रहा है इससे अगले रचना में एक नयी सोच मिलती है आपका स्नेह और आशीवाद यूं ही सतत मिलता रहे इस कामना के और सदर प्रणाम के साथ सादर 

At 9:46pm on February 1, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय Samar kabeer जी,

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 11:06am on October 24, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

janab samar kabeer sahab aadab,    hosla afzayi ke liye shukriya ,  1. ar ka matlab hai agar...aur 2.chhar ka matlab hai  ..khayal.

At 6:40pm on March 18, 2015, pratibha tripathi said…

आदरणीय समर कबीर जी आपको माह कि सर्वश्रेष्ठ रचना के हेतु चुने जाने के लिए बधाई प्रेषित करती हूँ । ये सच है कि ग़ज़ल को लिखना और उसमे खिताब पाना बहुत ही प्रशंशनीय है ,आपको एक बार फिरसे बधाई हो सादर । 

At 7:09pm on March 16, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ०समर कबीर जी

सर्वश्रेष्ठ लेखन  कोई हंसी खेल नहीं  .आपको यह पुरस्कार प्राप्य हुआ . आपको मेरी भूरि-भूरि  बधायी .

 
 
 

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