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अमीरुद्दीन 'अमीर'
  • Male
  • बाग़पत, उत्तर प्रदेश.
  • India
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अमीरुद्दीन 'अमीर''s Page

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Md. Anis arman's blog post ग़ज़ल
"जनाब अनीस 'अरमान' साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। शे'र के बोल्ड शब्दों को देखें- 7)मजनूँ के जैसा हूँ मैं बोलेंगे सारे पत्थर फ़रहाद सा है ये जू //ए शीर बोल उठेगी इस शे'र में शुतरगुर्बा दोष का ज़हूर मालूम होता…"
Jul 17
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post अभिव्यक्ति .......
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, प्रेम की गहराई को अभिव्यक्त करने की अभिलाषा की शानदार अभिव्यक्ति के रूप में सुन्दर रचना हुई है। बधाई स्वीकार करें।  सादर। "
Jul 15
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post सुलगते अन्धेरे. . . .
"आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, उत्तम मर्मस्पर्शी रचना हुई है, आह... बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Jul 14
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Md. Anis arman's blog post ग़ज़ल
"जनाब अनीस अरमान साहिब आदाब, क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है मज़ा आ गया, वाह. हर एक शे'र लाजवाब है। शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।"
Jul 12
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Admin's group सुझाव एवं शिकायत
"धन्यवाद आदरणीय प्रधान सम्पादक महोदय ।"
Jul 11
अमीरुद्दीन 'अमीर' posted a blog post

ग़ज़ल (मसनदों पर आज बैठे हो नहीं बैठोगे कल)

2122  -  2122  -  2122  -  212  फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फ़ाइलुन (बह्र- रमल मुसम्मन् महज़ूफ़) मसनदों  पर  आज  बैठे  हो  नहीं  बैठोगे  कल फ़र्श  पर आ जाओ वैसे  भी यहीं  बैठोगे  कलदेना  होगा  पूरा-पूरा  साहिबो  तुमको   हिसाब रू-ब-रू नज़रें  मिलाकर  यूँ  नहीं  बैठोगे  कलआज तुम हो होगा कल हाकिम ज़माना देखना जाग उट्ठा है बशर अब  छुप कहीं  बैठोगे  कलइल्म की इस शाख़ से गर उड़ चले हो आज तुम हो  जिहालत का अँधेरा  जाँ  वहीं  बैठोगे कलआज नीरो बन के जैसे  कर दिया है ख़ाक सब चैन  की  बंसी  बजाकर …See More
Jul 11
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Admin's group सुझाव एवं शिकायत
"आदरणीय प्रधान सम्पादक महोदय आदाब, मैंने अपनी एक ग़ज़ल "मसनदों पर आज बैठे हो..." को एडिट करने का अनुरोध पोर्टल पर किया है, इस सम्बन्ध में आपको ईमेल भी किया है। कृपया स्वीकृति प्रदान करने की कृपा करें। यदि एडिटिंग स्वीकार्य न हो तो ग़ज़ल को…"
Jul 11
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post मन का साहिल. . . .
"जनाब सुशील सरना जी आदाब, सुंदर, मनोहारी सृजन के लिए बधाई प्रस्तुत करता हूँ। कोरोना से उबर आने के लिए आपको सपरिवार विशेष बधाईयाँ। सादर। "
Jul 11
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post करके दिखाया देश में किसने कहा हुआ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। 'कारण से इनके नित्य ही शासन बुरा हुआ।६।' इस मिसरे को यूँ कहना उचित होगा -  "कारण सदा इन्हीं के ही शासन बुरा हुआ"     …"
Jul 11
अमीरुद्दीन 'अमीर' posted a blog post

ग़ज़ल (मेरी माँ)

2122 - 2122  तू  शफ़ीक़-ओ-मह्रबाँ  है तुझसा माँ  कोई कहाँ  है तेरे आँचल  का  ये साया  मुझको जन्नत का गुमाँ है तेरा  दामन  मेरी  दुनिया  औ क़दम  सारा जहाँ  है रंज हो या  हो ख़ुशी बस तू सदा  ही ख़ुश-बयाँ  है बिन  तेरे  ये  ज़िन्दगी तो ख़ाक़ है या फिर धुआँ है     तेरे  दामन  के ये  रौज़न     माँ  ये  मेरी कहकशाँ  है बारिशों   में  धूप  में  भी माँ का आँचल साएबाँ है माँ  के जैसा  कौन होगा माँ बड़ी ही सख़्त-जाँ  हैजान  है क़ुर्बान तुझ  पर  मेरी  माँ  तू  मेरी  जाँ  है"मौलिक व अप्रकाशित"See More
Jul 10
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कहते पुजारी मुझ से हैं तू देवता बदल- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें।  'किस्मत को जीतने के लिए हौसला बदल।२।' इस मिसरे में 'हौसला बदल' शब्द विन्यास खटक रहा है। देखियेगा,  सादर। "
Jul 10
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post भूख का व्यापार मत करवाइए- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ, 'हर नदी नाले को हम से पार मत करवाइए' बढ़िया है, 'शेर पाला है तो शेरों से लड़ाओ खूब पर गीदड़ों से तो उसे दो-चार मत करवाइए।२। 'चापलूसों को जमाकर…"
Jul 10
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (जगह दिल में तुम्हारे...)
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी तशरीफ़ आवरी को ख़ुश आमदीद। सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर।"
Jul 10
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (जगह दिल में तुम्हारे...)
"आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jul 10
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Md. Anis arman's blog post ग़ज़ल
"जनाब अनीस अरमान साहिब आदाब, रूहानी जज़्बात की अक्कासी करती ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। तीसरे शे'र में 'चादर' को चद्दर करना बहतर होगा। सादर।     "
Jul 9
अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"विनम्र श्रद्धांजलि।"
Jul 8

Profile Information

Gender
Male
City State
BAGHPAT , UTTAR PRADESH.
Native Place
BARAUT
Profession
Private job
About me
उर्दु शायरी हिन्दी में लिखने और पढ़ने का शौक़ है॥

अमीरुद्दीन 'अमीर''s Blog

ग़ज़ल (मसनदों पर आज बैठे हो नहीं बैठोगे कल)

2122  -  2122  -  2122  -  212 

फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फ़ाइलुन

(बह्र- रमल मुसम्मन् महज़ूफ़)



मसनदों  पर  आज  बैठे  हो  नहीं  बैठोगे  कल

फ़र्श  पर आ जाओ वैसे  भी यहीं  बैठोगे  कल

देना  होगा  पूरा-पूरा  साहिबो  तुमको   हिसाब

रू-ब-रू नज़रें  मिलाकर  यूँ  नहीं  बैठोगे  कल

आज तुम हो होगा कल हाकिम ज़माना देखना

जाग उट्ठा है बशर अब  छुप कहीं  बैठोगे  कल…

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Posted on July 11, 2021 at 3:54pm — 6 Comments

ग़ज़ल (मेरी माँ)

2122 - 2122 



तू  शफ़ीक़-ओ-मह्रबाँ  है

तुझसा माँ  कोई कहाँ  है



तेरे आँचल  का  ये साया 

मुझको जन्नत का गुमाँ है



तेरा  दामन  मेरी  दुनिया 

औ क़दम  सारा जहाँ  है



रंज हो या  हो ख़ुशी बस

तू सदा  ही ख़ुश-बयाँ  है



बिन  तेरे  ये  ज़िन्दगी तो

ख़ाक़ है या फिर धुआँ है    



तेरे  दामन  के ये  रौज़न    

माँ  ये  मेरी कहकशाँ …

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Posted on July 10, 2021 at 6:47pm

कोविड 19 - 2021

221 - 2121 - 1221 - 212 

है कौन  ऐसा  जिसको  यहाँ आज  ग़म नहीं 

हर दिल में याद यादों के नश्तर भी कम नहीं 

दहलाता हर किसी को ये मंज़र है ख़ौफ़नाक

साँसें  हुईं   मुहाल  कि  मसला  शिकम  नहीं 

ग़म  को  वसीह  करते  ये अटके  हुए  बदन

नदियों के तट भी गोर-ए-ग़रीबाँ से कम नहीं 

आई  वबा ये कैसी  कि मातम  है  हर तरफ़ 

ग़मगीन  चहरे  लाशों पे  लाशें भी कम नहीं 

मस्कन भी थी ये गंगा है मद्फ़न भी आज…

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Posted on July 2, 2021 at 11:15pm — 17 Comments

ग़ज़ल (जगह दिल में तुम्हारे...)

1222 - 1222 - 1222 - 1222 

(बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम) 

जगह  दिल में  तुम्हारे अब  भी थोड़ी  सी बची  है  क्या

मेरे  बिन  ज़िन्दगी  में  जो  कमी  सी  थी  वही  है  क्या

अभी  तक  आरज़ू  जो  दफ़्न  कर  रक्खी  है  सीने  में 

तड़प  उसकी जो  सुनता हूँ  वो तुमने भी  सुनी है  क्या

तेरे  साँसों   की  गर्मी  से  पिघल  कर   रह  गया  हूँ  मैं 

जो    हालत   हो   गई   मेरी  वही   तेरी  हुई   है   क्या 

मिले  हो जब भी…

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Posted on July 2, 2021 at 6:04pm — 7 Comments

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At 6:21pm on March 9, 2020, Samar kabeer said…

जनाब अमीरुद्दीन साहिब,ओबीओ पर आपका स्वागत है,मैं हर ख़िदमत के लिए हाज़िर हूँ ।

 
 
 

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