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Sushil Sarna
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Sushil Sarna commented on डॉ छोटेलाल सिंह's blog post अतुकांत
"आदरणीय डॉ छोटेलाल जी आपने न लिख के भी सब कुछ लिख दिया। ... अति सुंदर ... शब्द सौंदर्य देखते ही बनता है। इस अति उत्तम प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई।"
5 hours ago
Neelam Upadhyaya commented on Sushil Sarna's blog post चाँद बन जाऊंगी ..
" आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत सुंदर कविता । बधाई ।"
14 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post चाँद बन जाऊंगी ..
"जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
yesterday
Harash Mahajan commented on Sushil Sarna's blog post चाँद बन जाऊंगी ..
"बहुत ही सुंदर आदरणीय सुशील जी ।"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएं ....
"आद0  Neelam Upadhyayaजी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post निष्कलंक कृति ...
"आद0  Neelam Upadhyayaजी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post चाँद बन जाऊंगी ..
"आदरणीय श्याम नारायण जी सृजन को मान देने का दिल से आभार।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

चाँद बन जाऊंगी ..

चाँद बन जाऊंगी ..कितनी नादान हूँ मैं निश्चिंत हो गई अपनी सारी तरल व्यथा झील में तैरते चाँद को सौंपकरहर लम्हा जो एक शिला लेख सा मेरे अवचेतन में अंगार सा जीवित था निश्चिंत हो गई उसे झील में तैरतेचाँद को सौंपकरउम्र कैसे फिसल गई अपने तकिये पर तुम्हारी गंध को सहेजते -सहेजते कुछ पता न चला निश्चिंत हो गई अपनी चेतना के जंगल में व्याप्त श्वासों में जीवित श्वासों की गंध को झील में तैरतेचाँद को सौंपकरमिलूंगी मैं मेरे बाद भी यहीं तुम्हें ढूंढते हुए मिलोगे तुम भी मुझे यहीं इसी…See More
yesterday
Shyam Narain Verma commented on Sushil Sarna's blog post चाँद बन जाऊंगी ..
"सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीय, सादर"
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

चाँद बन जाऊंगी ..

चाँद बन जाऊंगी ..कितनी नादान हूँ मैं निश्चिंत हो गई अपनी सारी तरल व्यथा झील में तैरते चाँद को सौंपकरहर लम्हा जो एक शिला लेख सा मेरे अवचेतन में अंगार सा जीवित था निश्चिंत हो गई उसे झील में तैरतेचाँद को सौंपकरउम्र कैसे फिसल गई अपने तकिये पर तुम्हारी गंध को सहेजते -सहेजते कुछ पता न चला निश्चिंत हो गई अपनी चेतना के जंगल में व्याप्त श्वासों में जीवित श्वासों की गंध को झील में तैरतेचाँद को सौंपकरमिलूंगी मैं मेरे बाद भी यहीं तुम्हें ढूंढते हुए मिलोगे तुम भी मुझे यहीं इसी…See More
Monday
Neelam Upadhyaya commented on Sushil Sarna's blog post निष्कलंक कृति ...
"आदरणीय सुशिल सरना जी, बहुत ही अच्छी, भावपूर्ण अतुकांत कविता।  हार्दिक बधाई"
Monday
Neelam Upadhyaya commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएं ....
"आदरणीय सुशिल सरना जी।  बढ़िया क्षणिकाओं की प्रस्तुति।  बधाई  स्वीकार करें। "
Monday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएं ....
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन के भावों को आत्मीय सम्मान देने का दिल से आभार।"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएं ....
"आदरणीय हर्ष महाजन जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post निष्कलंक कृति ...
"आदरणीय नीलेश जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post निष्कलंक कृति ...
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन के भावों को आत्मीय सम्मान देने का दिल से आभार।"
Saturday

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur-Rajasthan
Native Place
New Delhi
Profession
Retired from Central Govt.Service as Superintending Officer
About me
I am a simple,sentimental and transparent person.Poetry is my hobby and passion

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Sushil Sarna's Blog

चाँद बन जाऊंगी ..

चाँद बन जाऊंगी ..

कितनी नादान हूँ मैं

निश्चिंत हो गई

अपनी सारी

तरल व्यथा

झील में तैरते

चाँद को सौंपकर

हर लम्हा जो

एक शिला लेख सा

मेरे अवचेतन में

अंगार सा जीवित था

निश्चिंत हो गई

उसे

झील में तैरते

चाँद को सौंपकर

उम्र कैसे फिसल गई

अपने तकिये पर

तुम्हारी गंध को

सहेजते -सहेजते

कुछ पता न चला

निश्चिंत हो गई

अपनी चेतना के जंगल में व्याप्त …

Continue

Posted on April 23, 2018 at 11:30am — 5 Comments

निष्कलंक कृति ...

निष्कलंक कृति .....



अवरुद्ध था

हर रास्ता

जीवन तटों पर

शून्यता से लिपटी

मृत मानवीय संवेदनाओं की

क्षत-विक्षत लाशों को लांघ कर

इंसानी दरिंदों के

वहशी नाखूनों से नोची गयी

अबोध बच्चियों की चीखों से

साक्षात्कार करने का

रक्त रंजित कर दिए थे

वासना की नदी ने

अबोध किलकारियों को दुलारने वाले

पावन रिश्तों के किनारे

किंकर्तव्यमूढ़ थी

शुष्क नयन तटों से

रिश्तों की

टूटी किर्चियों की

चुभन…

Continue

Posted on April 20, 2018 at 4:25pm — 6 Comments

क्षणिकाएं ....

क्षणिकाएं ....

१.
खेल रही थी
सूर्य रश्मियाँ
घास पर गिरी
ओस की बूंदों से
वो क्या जानें
ये ओस तो
आंसू हैं
वियोगी
चाँद के

....................

२.

जीवन
मिटने के बाद भी
ज़िंदा रहता है
स्मृति के गर्भ में
अवशेष बन
श्वासों का

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 20, 2018 at 12:16pm — 6 Comments

इन्तिजार ....

इन्तिजार ....

दफ़्न कर दिए

सारे जलजले

दर्द के

इश्क़ की

किताब में

ढूंढती रही

कभी

ख़ुद में तुझको

कभी

ख़ुद में ख़ुद को

मगर

तू था कि बैठा रहा

चश्म-ए -साहिल पर

इक अजनबी बन के

मैं

तैरती रही

एक ख़्वाब सी

तेरे

इश्क़ की

किताब में

राह-ए-उल्फ़त में

दिल को

अजीब सी सौग़ात मिली

स्याह ख़्वाब मिले

मुंतज़िर सी रात मिली

यादों के सैलाब मिले

चश्म को बरसात…

Continue

Posted on April 18, 2018 at 12:30pm — 8 Comments

Comment Wall (34 comments)

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At 11:15pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुशील सरना जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी "कविता : कितना अच्छा होता" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 1:35am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका मेल बॉक्स ब्लॉक होने के कारण मेल सेंड नहीं हो रहा है. 

At 1:29am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय सुशील सरना सर, विलम्ब से प्रत्युत्तर हेतु क्षमा. आपको मेल कर दिया है. सादर 

At 10:17pm on April 7, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ० सरना भाई जी, सादर  प्रणाम!

आपका हार्दिक स्वागत है.  मित्रता से भाग्योदय होता है ,  मैं धन्य हुआ. सादर

At 9:46am on April 1, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय सुशील जी ..महीने का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 6:02am on March 20, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ०  सुशील सरना भाई जी, सादर प्रणाम!  आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" चुने जाने पर बहुत-बहुत बधाई. सादर

At 4:22pm on March 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

सुशील सरना जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 9:00pm on February 17, 2016, Tasdiq Ahmed Khan said…

मोहतरम जनाब सुशील सरना  साहिब ,  यह  आप सब की हौसला अफ़ज़ाई का नतीजा है  , जिसके लिए   आप का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

At 8:47pm on January 11, 2016, सतविन्द्र कुमार राणा said…
धन्यवाद आदरणीय sushil Sarna जी।आपको भी सपरिवार सादर हार्दिक शुभकामनाएं!
At 2:33pm on January 5, 2016, अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव said…

तन स्वस्थ रहे मन में उमंग...सुशील भाईजी आपको भी सपरिवार नव वर्ष की ढेरों  शुभकामनायें

 
 
 

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