For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

राजस्थानी साहित्य

Information

राजस्थानी साहित्य

इस ग्रुप मे राजस्थानी साहित्य लिखा जा सकता है |

Location: विश्व
Members: 37
Latest Activity: Mar 2, 2019

Discussion Forum

एक राजस्थानी मुसल्सल ग़ज़ल -यादड़ल्याँ रा घोड़ां ने थे पीव लगावो एड़ |

एक राजस्थानी मुसल्सल ग़ज़ल ***यादड़ल्याँ रा घोड़ां ने थे पीव लगावो एड़ | सुपणे मांयां आय पिया जी छोड़ो म्हासूँ छेड़ | १| ***इंया तो म्हें गेली प्रीतड़ली में थांरी भोत चालूँ थांरे लारे लारे ज्यूँ सीधी सी भेड़…Continue

Started by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' Jan 11, 2019.

सावण सूखो क्यूँ !

सावण सूखो क्यूँ !इबकाळ रामजी न जाण के सूझी, क बरसण क दिनां मं च्यारूँ कान्या तावड़ की  बळबळती सिगड़ी सिलागायाँ बठ्यो है | जठे देखो बठे…Continue

Started by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' Mar 4, 2016.

बिठाऊँ केइया नाव म- - -- - - (राजस्थानी गीत)

बिठाऊँ केइया नाव म- - -- - - छोटी सी या म्हारी  है नाँव,जादू भरया लागे थारा पाँव |मनै डर सता रह्यों है राम,थानै बिठाऊँ केइया नाँव में | म्हारी तो या लकड़ी री नाँव,थे बणाद्यों भाटा न भी नार |ई सूं मनै…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Jun 27, 2015.

राजस्थानी कविता उत्सव 26 फरवरी से 28 फरवरी तक आयोजित 1 Reply

राजस्थानी साहित्य प्रेमियों को यह जानकार प्रसन्नता होगी कि साहित्य अकादमी, दिल्ली और राजस्थान अध्ययन केंद्र, राजथान यूनिवर्सिटी, जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में 26 से 28 फरवरी,2015 तक राजस्थान…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला. Last reply by डिम्पल गौड़ 'अनन्या' Feb 27, 2015.

धरती रंग सुरंगी ...

धरती रंग सुरंगी सी मन मां रस जगावे रे ऊँचा ऊँचा टीबा इण रांजीवण री आस जगावे रेलहर लहर लहरियों उड़ उड़आसमान पर छावे रेपंछी भी तो गीत धरा का मधुर स्वरां म गावे रे धरती रंग सुरंगी सी मन मां रस जगावे…Continue

Tags: कविता

Started by डिम्पल गौड़ 'अनन्या' Feb 15, 2015.

कस्तूरी री महक 1 Reply

थारे बिण म्हारो जियो रे  भटके सुण क्यूं न  लेवे   तू म्हारी पुकार म्हाने रात्यां में नींद कोणी  आवे रे थारी ओल्युं ढोला म्हाने जगावे  रे बन मां व्याकुल घुमे रे हिरणीकस्तूरी री महक  लागे मनभावन आ…Continue

Tags: .., रचना, राजस्थानी

Started by डिम्पल गौड़ 'अनन्या'. Last reply by डिम्पल गौड़ 'अनन्या' Feb 2, 2015.

मीरा बाट जोवे थारी ..... 2 Replies

म्हारी आँख्यां  बाट जोवे थारी ओ  सावरिया म्हारा  गिरधारी मीरा रे मन री  बातां समझे रे कुणआ तो दरस निहारे थारी ओ बनवारीवीणां रां तार बाज्ये जद जद नाच्युं म तो प्रेम म  दिवानी होकर लीलाधर री लीला जाणे…Continue

Started by डिम्पल गौड़ 'अनन्या'. Last reply by डिम्पल गौड़ 'अनन्या' Jan 31, 2015.

फरक है याद रै मांय / राजस्थानी कविता/ कृष्ण वृहस्पति

म्हूं तेरै पांती रैमेह मांय भीजै हो जणा तू तपै ही मेरै हिस्सै रै तावड़ै मांय।आज भी तूं म्हारी याद रै मरूथळ मांय बळै है दिन-रात अर म्हे बैठ्यो हूं तेरी याद री ओढ्यां बादळी।मौलिक/ अप्रकाशितContinue

Started by Krishan Vrihaspati Sep 13, 2013.

सुप्रभात राजस्थान

लाल सुरंगो सूरज ऊग्यौ, सुरंगो हुयौ असमान।कहे बिरकाळी भायां नै, सुप्रभात राजस्थान।।बात बताऊं एक पते गी, सुणल्यौ ध्यान लगाय।आपणी भाषा राजस्थानी री, सरकारी मान्यता दिलाय।।अनुसूचि अठारवीं में, जुङै…Continue

Tags: दुहा, राजस्थानी

Started by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' Feb 28, 2013.

राजस्थानी भाषारी मान्यता र वास्ते

राजस्थानी भाषारी मान्यता र वास्ते  विकास बारे में राजस्थान साहित्य अकादमी न पुरजोर मांग कर राजस्थानी भाषा न  मान्यता दिलाबा र वास्ते जितरी कोशिश करनी चाहिए, कोणी हो रही।रानी लक्ष्मी कुमारी चुडावत रा…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Feb 19, 2013.

 

Members (37)

 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sarfaraz kushalgarhi's blog post नाज़ नख़रों का अंदाज़....
"मुहतरम जनाब सरफ़राज़ साहिब आदाब, बहतरीन ग़ज़ल से अपनी मौजूदगी दर्ज करने के लिए आपको दाद के साथ…"
1 minute ago
Sarfaraz kushalgarhi commented on Sarfaraz kushalgarhi's blog post नाज़ नख़रों का अंदाज़....
"आदरणीय रवि भाई बहुत बहुत शुक्रियः नवाज़िश"
2 minutes ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Sarfaraz kushalgarhi's blog post नाज़ नख़रों का अंदाज़....
"आदरणीय Sarfaraz kushalgarhi भाई, इस सुंदर ग़ज़ल से अपने ओबीओ के सफ़र का आग़ाज़ करने पर आपको…"
13 minutes ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post एक नया दस्तूर (ग़ज़ल - शाहिद फिरोज़पुरी)
"आदरणीय Sarfaraz kushalgarhi भाई, आपका हार्दिक आभार। मंच पर आपका बहुत स्वागत है।"
18 minutes ago
Sarfaraz kushalgarhi posted a blog post

नाज़ नख़रों का अंदाज़....

212 212 212 212 नाज़   नख़रों   का  अंदाज़  अच्छा  लगा इस  मुहब्बत  का  आग़ाज़  अच्छा  लगा-1सोचा  था …See More
20 minutes ago
Rupam kumar -'मीत' posted blog posts
20 minutes ago
Sarfaraz kushalgarhi commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post एक नया दस्तूर (ग़ज़ल - शाहिद फिरोज़पुरी)
"बहुत ख़ूब भाई लाजवाब "
24 minutes ago
रवि भसीन 'शाहिद' left a comment for Sarfaraz kushalgarhi
"आदरणीय Sarfaraz kushalgarhi भाई, आपका बहुत स्वागत है!"
48 minutes ago
Sarfaraz kushalgarhi is now a member of Open Books Online
1 hour ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post ३ क्षणिकाएँ : याद
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया ।"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post मोहब्बत क्या है .......
"आदरणीय लक्ष्मण धामी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से शुक्रिया ।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post मोहब्बत क्या है .......
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
7 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service