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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत '
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Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)
" // मेहमान  को वजन में अधिकतर सुख़नवरोँ के कलाम में २२१ ही देखा है २१२१ नहीं | इतना ही नहीं जिस भी लफ्ज़ में दूसरा अक्षर "ह" होता है उसमें उससे पहले के अक्षर की एक मात्रा गिरती हुई देखी है | जैसे मेहरबानी =१२२२ ,मोहलत =२२ , मेहनत…"
Oct 14
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)
"आदरणीय Samar kabeer साहेब ,आदाब , आपकी पृरखलुस हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया |  मेहमान  को वजन में अधिकतर सुख़नवरोँ के कलाम में २२१ ही देखा है २१२१ नहीं | इतना ही नहीं जिस भी लफ्ज़ में दूसरा अक्षर "ह" होता है…"
Oct 13
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)
"आदरणीय Shyam Narain Verma जी , रचना की सराहना के लिए सादर आभार "
Oct 13
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । 'मुसीबत आ गई मेहमान बनकर' इस मिसरे में 'मेहमान' को "महमान" कर लें,क्योंकि 'मेहमान' का वज़्न 2121 है ।"
Oct 13
Shyam Narain Verma commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)
"प्रणाम आदरणीय, बहुत ही उम्दा प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Oct 12
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' replied to डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's discussion फर्क है ग़ज़ल  और छंद के मात्रिक विधान में     :: डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव in the group भारतीय छंद विधान
"बहुत सुन्दर आलेख के लिए आपको बधाई | निश्चय ही हिंदी छंदों को उनके मूल रूप में ही रहने देना चाहिए | लेकिन समस्या यही है कि परिश्रम कौन करे | आजकल वाचिक एक नया नाम रख दिया गया है ,जब कि छंद तो केवल दो प्रकार के ही रहे हैं वर्णिक और मात्रिक | लेकिन…"
Oct 12
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)

(१२२२ १२२२ १२२ ).नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ ख़ुदाया मैं भी कुछ खुशियाँ मना लूँ ** मुझे भी तो अता कर चन्द मौक़े ख़ुदा मैं भी तो जीवन का मज़ा लूँ ** मुहब्बत में तिरी है जीत पक्की भला फिर किसलिए सिक्का उछालूँ ** हवा जब खुशबुएँ बिखरा रही है ख़लल क्यों काम में बेकार डालूँ ** पुराने दोस्त क्या कम हैं किसी से नये क्यों आस्तीं में मार* पालूँ (साँप ) ** मुसीबत आ गई मेहमान बनकर बता कैसे ख़ुदा घर से निकालूँ ** ख़ुमारी चढ़ गई आँखों की मय की भला अब होश मैं कैसे सँभालूँ ** तुझे जब क़त्ल करना ही है मुझको मिरी…See More
Oct 12
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )
"भाई बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी , आपकी स्नेहिल सराहना के लिए दिल से आभार | "
Oct 12
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )
"आदरणीय Samar kabeer साहेब ,  आपके आशीर्वचनों  के आगे नतमस्तक हूँ | सादर आभार | पहले मैं ग़ज़ल के ऊपर मापनी लिखता था लेकिन एक एडमिन ने ऐसा न करने का निर्देश दिया तब से बंद कर दिया | भविष्य में आपकी आज्ञा का पालन होगा | "
Oct 12
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )
"बेहतरीन ग़ज़ल कही है आदरणीय..हरेक् शे'र खूबसूरत हुआ..."
Oct 12
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । एक निवेदन है कि कृपया ग़ज़ल के साथ अरकान भी लिख दिया करें,इससे नए सीखने वालों के लिए आसानी होती है ।"
Oct 11
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )
"आदरणीय Sushil Sarna जी , आपकी सराहनात्मक  प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय तल से आभार एवं सादर नमन |"
Oct 11
Sushil Sarna commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )
"बेकार है गुमान जमीं ज़र का ज़ीस्त भरजाएँगे खाली हाथ अगर इस जहाँ से हम वाह आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी .... आपकी हर ग़ज़ल खूबसूरत अहसासों का वो मंज़र पेश करती है कि दिल वाह करने को मज़बूर हो जाता है। इस बेशकीमती ग़ज़ल की पेशकश के लिए दिल से मुबारकबाद कबूल…"
Oct 10
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )

तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हमफ़ितरत से हैं ज़रूर कुछ अब्र-ए-रवाँ से हम**कितना लिए है बोझ ज़मीँ इस जहान कामुमकिन है क्या कभी कि बनें धरती माँ-से हम**दिल तोड़ के वो कह रहे हैं सब्र कीजिएसब्र-ओ-क़रार लाएँ तो लाएँ कहाँ से हम**ये तय नहीं कि प्यार की हासिल हों मंज़िलेंइतना है तय कि जाएँगे अब अपनी जाँ से हम**कुछ इस तरह से उनकी हुईं मेहरबानियाँखाते हैं ख़ौफ़ आज तलक मेहरबाँ से हम**जिस दिन से हमने हिज़्र को अपना बना लियाआज़ाद तब से हो गए आह-ओ-फुगाँ से हम**बेकार है गुमान जमीं ज़र का ज़ीस्त भरजाएँगे खाली हाथ अगर इस…See More
Oct 9
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post क्यों चिंता की लहरें मुख पर आखिर क्या है बात प्रिये ? (५७)
"आपकी सराहनात्मक  प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय तल से आभार एवं सादर नमन | बृजेश कुमार 'ब्रज जी "
Sep 30
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post क्यों चिंता की लहरें मुख पर आखिर क्या है बात प्रिये ? (५७)
"वाह बहुत ही खूबसूरत गीत है आदरणीय भावों से परिपूर्ण "
Sep 30

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नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)

(१२२२ १२२२ १२२ )

.

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ

ख़ुदाया मैं भी कुछ खुशियाँ मना लूँ

**

मुझे भी तो अता कर चन्द मौक़े

ख़ुदा मैं भी तो जीवन का मज़ा लूँ

**

मुहब्बत में तिरी है जीत पक्की

भला फिर किसलिए सिक्का उछालूँ

**

हवा जब खुशबुएँ बिखरा रही है

ख़लल क्यों काम में बेकार डालूँ

**

पुराने दोस्त क्या कम हैं किसी से…

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Posted on October 12, 2019 at 10:30am — 5 Comments

तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )



तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम

फ़ितरत से हैं ज़रूर कुछ अब्र-ए-रवाँ से हम

**

कितना लिए है बोझ ज़मीँ इस जहान का

मुमकिन है क्या कभी कि बनें धरती माँ-से हम

**

दिल तोड़ के वो कह रहे हैं सब्र कीजिए

सब्र-ओ-क़रार लाएँ तो लाएँ कहाँ से हम

**

ये तय नहीं कि प्यार की हासिल हों मंज़िलें

इतना है तय कि जाएँगे अब अपनी जाँ से हम

**

कुछ इस तरह से उनकी हुईं मेहरबानियाँ

खाते…

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Posted on October 8, 2019 at 10:30pm — 6 Comments

देखा इतना दर्द दिलों का इस बेदर्द ज़माने में(६४)

देखा इतना दर्द दिलों का इस बेदर्द ज़माने में

बस थोड़ा सा वक़्त बचा है सैलाबों को आने में

**

अपनापन का जज़्बा खोया और मरासिम भी टूटे

कंजूसी करते हैं सारे थोड़ा प्यार दिखाने में

**

उनकी फ़ितरत कैसी होगी ये अंदाज़ा मुश्किल है

जिनको खूब मज़ा आता है गहरी चोट लगाने में

**

वादा पूरा करना अपना इस सावन में आने का

वरना दिलबर क्या रक्खा है सावन आने जाने में

**

बात…

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Posted on September 23, 2019 at 7:30am — 6 Comments

ये ज़ीस्त रोज़ सूरत-ए-गुलरेज़ हो जनाब(६३)

ये ज़ीस्त रोज़ सूरत-ए-गुलरेज़ हो जनाब

राह-ए-गुनाह से सदा परहेज़ हो जनाब

**

मंज़िल कहाँ से आपके चूमें क़दम कभी

कोशिश ही जब तलक न जुनूँ-ख़ेज़ हो जनाब

**

क्या लुत्फ़ ज़िंदगी का लिया आपने अगर

मक़सद ही ज़िंदगी का न तबरेज़ हो जनाब

**

मुमकिन कहाँ कि ज़िंदगी की पीठ पर कभी

लगती किसी के ग़म की न महमेज़ हो जनाब

**

उस जा पे फ़स्ल बोने की ज़हमत न कीजिये

जिस जा अगर ज़मीं ही न ज़रखेज़ हो…

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Posted on September 15, 2019 at 4:00pm — 2 Comments

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