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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत '
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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )

(१२१२२ १२१२२ १२१२२ १२१२२ ).मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है  उक़ूल पर ज्यों पड़े हैं ताले अदब का ख़ुर्शीद ढल रहा है  ** किसी की माँ का नहीं है रिश्ता किसी भी दल से मगर यहाँ पर ये पाक रिश्ता भरी सभा में बिना सबब ही उछल रहा है ** किसी ने की याद सात पुश्तें किसी को कह डाले चोर कोई जुबान बस में नहीं किसी की जुबाँ का लहज़ा बदल रहा है  ** कोई करा दे कहीं पे दंगे किसी भी मज़हब की आड़ लेकर कहीं पे जादू चला किसी का कहीं पे फ़तवा भी चल रहा है ** ग़रीब के सब हिमायती हैं तमाम वादे उसी की ख़ातिर यहाँ…See More
Wednesday
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )
"// उरूज़  का अर्थ बुलंदी से लिया है// तो इसे "उरूज" कर लें,'ज्' के नीचे से बिंदी हटा लें ।"
Tuesday
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )
"आदरणीय Samar kabeer साहेब | आदाब | हौसला आफजाई के लिए दिली शुक्रिया | अवाम शब्द पढ़ने सुनने में स्त्रीलिंग ही लगता है अच्छा हुआ सर ,आपने बता दिया मैंने तो हमेशा स्त्रीलिंग में ही प्रयोग किया है | उरूज़  का अर्थ बुलंदी से लिया है |सादर…"
Tuesday
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'अवाम चुपचाप देखती है अजब नज़ारे सियासतों के' आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ "अवाम" शब्द पुल्लिंग है । 'गिरा है मेयार मीर का जो…"
Tuesday
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )

(१२१२२ १२१२२ १२१२२ १२१२२ ).मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है  उक़ूल पर ज्यों पड़े हैं ताले अदब का ख़ुर्शीद ढल रहा है  ** किसी की माँ का नहीं है रिश्ता किसी भी दल से मगर यहाँ पर ये पाक रिश्ता भरी सभा में बिना सबब ही उछल रहा है ** किसी ने की याद सात पुश्तें किसी को कह डाले चोर कोई जुबान बस में नहीं किसी की जुबाँ का लहज़ा बदल रहा है  ** कोई करा दे कहीं पे दंगे किसी भी मज़हब की आड़ लेकर कहीं पे जादू चला किसी का कहीं पे फ़तवा भी चल रहा है ** ग़रीब के सब हिमायती हैं तमाम वादे उसी की ख़ातिर यहाँ…See More
Apr 13
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)
"आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'  साहेब  खाकसार का कलाम पसन्द करने और हौसला आफजाई का बेहद शुक्रिया "
Apr 5
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)
"बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीय..बधाई"
Apr 4
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)
"आदरणीय Samar kabeer साहेब |  तह-ए-दिल  से  शुक्रिया  क़बूल  करें  . ज़र्रा -नवाज़ी  है  आपकी  |"
Apr 3
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 3
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)

मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही और क़ुदरत भी कोई जादू दिखाने से रही ***हौसला आपका दे साथ करम हो रब का फिर किसी सिम्त बला कोई सताने से रही ***हो सके जितना हक़ीक़त ये समझ लो सारे मौत मर्ज़ी से कभी आपकी आने से रही ***इम्तिहाँ रोज़ ही देने हैं यहाँ जीने को रोने धोने से तरस ज़िंदगी खाने से रही ***हो अगर कोई तसव्वुर में तभी ख़्वाब सजे कोई मूरत तो कभी ख़्वाब सजाने से रही ***होशियारी भी ज़रूरी है सदा जीवन में गर पड़ी कोई भी खू जल्द वो जाने से रही ***हर ख़ुशी क़ीमती है ज़श्न मना लो वरनालौट कर कोई ख़ुशी फिर से तो…See More
Apr 2
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)
"आदरणीय Samar kabeer साहेब | आदाब |  बे'पनाह, मुहब्बतों, नवाज़िशों का दिल से बे'हद शुक्रिया ! शाद-औ-आबाद रहें"
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Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)
"जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी,आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 31
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)
"आदरणीय  Hariom Shrivastava जी ,आपकी हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया | "
Mar 29
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर(३९ )
"आदरणीय  Hariom Shrivastava जी ,उत्साहवर्धन के लिए दिल से आभार | "
Mar 29
Hariom Shrivastava commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)
"वाह,वाहह,बहुत सुंदर ग़ज़ल आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी।"
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Hariom Shrivastava commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर(३९ )
"वाह,वाहह,बहुत सुंदर ग़ज़ल आदरणीय गहलोत जी।"
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मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )

(१२१२२ १२१२२ १२१२२ १२१२२ )

.

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है 

उक़ूल पर ज्यों पड़े हैं ताले अदब का ख़ुर्शीद ढल रहा है 

**

किसी की माँ का नहीं है रिश्ता किसी भी दल से मगर यहाँ पर

ये पाक रिश्ता भरी सभा में बिना सबब ही उछल रहा है

**

किसी ने की याद सात पुश्तें किसी को कह डाले चोर कोई

जुबान बस में नहीं किसी की जुबाँ का लहज़ा बदल रहा है …

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Posted on April 13, 2019 at 1:00am — 3 Comments

मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)



मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही 

और क़ुदरत भी कोई जादू दिखाने से रही 

***

हौसला आपका दे साथ करम हो रब का 

फिर किसी सिम्त बला कोई सताने से रही 

***

हो सके जितना हक़ीक़त ये समझ लो सारे 

मौत मर्ज़ी से कभी आपकी आने से रही 

***

इम्तिहाँ रोज़ ही देने हैं यहाँ जीने को 

रोने धोने से तरस ज़िंदगी खाने से रही 

***

हो…

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Posted on April 1, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

.

मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं 

रुख़्सत अगर वतन से हुई भुखमरी नहीं 

**

उल्फ़त जनाब होती नहीं है रियाज़ियात 

चलती है इश्क़ में कोई दानिशवरी * नहीं


**

उम्र-ए-ख़िज़ाँ में आप जतन कुछ भी कीजिये 

नक्श-ओ-निग़ार-ए-रुख़ की कोई इस्तरी नहीं 

**

बरसों से काटती है ग़रीबी में रोज़-ओ-शब

कैसी अवाम है कहे खोटी खरी नहीं

**

घर में न…

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Posted on March 26, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर(३९ )

रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर
आज फिर सजने सँवरने का सबब क्या आखिर
***
आइना बोल उठा अब्र कहाँ बरसेंगे
काकुल-ए-पेचाँ बिखरने का सबब क्या…
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Posted on March 23, 2019 at 7:00pm — 6 Comments

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