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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s Blog (65)

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)

(१२२२ १२२२ १२२ )

.

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ

ख़ुदाया मैं भी कुछ खुशियाँ मना लूँ

**

मुझे भी तो अता कर चन्द मौक़े

ख़ुदा मैं भी तो जीवन का मज़ा लूँ

**

मुहब्बत में तिरी है जीत पक्की

भला फिर किसलिए सिक्का उछालूँ

**

हवा जब खुशबुएँ बिखरा रही है

ख़लल क्यों काम में बेकार डालूँ

**

पुराने दोस्त क्या कम हैं किसी से…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 12, 2019 at 10:30am — 5 Comments

तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम(६५ )



तूफ़ान जलजलों से नहीं आसमाँ-से हम

फ़ितरत से हैं ज़रूर कुछ अब्र-ए-रवाँ से हम

**

कितना लिए है बोझ ज़मीँ इस जहान का

मुमकिन है क्या कभी कि बनें धरती माँ-से हम

**

दिल तोड़ के वो कह रहे हैं सब्र कीजिए

सब्र-ओ-क़रार लाएँ तो लाएँ कहाँ से हम

**

ये तय नहीं कि प्यार की हासिल हों मंज़िलें

इतना है तय कि जाएँगे अब अपनी जाँ से हम

**

कुछ इस तरह से उनकी हुईं मेहरबानियाँ

खाते…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 8, 2019 at 10:30pm — 6 Comments

देखा इतना दर्द दिलों का इस बेदर्द ज़माने में(६४)

देखा इतना दर्द दिलों का इस बेदर्द ज़माने में

बस थोड़ा सा वक़्त बचा है सैलाबों को आने में

**

अपनापन का जज़्बा खोया और मरासिम भी टूटे

कंजूसी करते हैं सारे थोड़ा प्यार दिखाने में

**

उनकी फ़ितरत कैसी होगी ये अंदाज़ा मुश्किल है

जिनको खूब मज़ा आता है गहरी चोट लगाने में

**

वादा पूरा करना अपना इस सावन में आने का

वरना दिलबर क्या रक्खा है सावन आने जाने में

**

बात…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 23, 2019 at 7:30am — 6 Comments

ये ज़ीस्त रोज़ सूरत-ए-गुलरेज़ हो जनाब(६३)

ये ज़ीस्त रोज़ सूरत-ए-गुलरेज़ हो जनाब

राह-ए-गुनाह से सदा परहेज़ हो जनाब

**

मंज़िल कहाँ से आपके चूमें क़दम कभी

कोशिश ही जब तलक न जुनूँ-ख़ेज़ हो जनाब

**

क्या लुत्फ़ ज़िंदगी का लिया आपने अगर

मक़सद ही ज़िंदगी का न तबरेज़ हो जनाब

**

मुमकिन कहाँ कि ज़िंदगी की पीठ पर कभी

लगती किसी के ग़म की न महमेज़ हो जनाब

**

उस जा पे फ़स्ल बोने की ज़हमत न कीजिये

जिस जा अगर ज़मीं ही न ज़रखेज़ हो…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 15, 2019 at 4:00pm — 2 Comments

अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू नहीं (६२ )

अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू नहीं 

ख़त भी नहीं ख़बर नहीं है जुस्तजू नहीं 

***

दरिया-ए-इश्क़ जो कि उफ़नता था थम गया

यूँ लग रहा है जैसे कि दिल में लहू नहीं

***

ख़ामोश ताकते हैं दरीचा तिरा सनम
हालाँकि इल्म है कि वहां पे भी तू नहीं
***

यादें हैं ख्वाब भी है तस्सवुर भी है तेरा

अफ़सोस बस यही है कि तू…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 10, 2019 at 12:00am — 2 Comments

रब है ज़रूर आपको दिखता भले न हो (६१)

ग़ज़ल(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

.

रब है ज़रूर आपको दिखता भले न हो

हर सू है नूर आपको दिखता भले न हो

**

होता ज़रूर है किसी में कम किसी में ख़ूब

दिल का गुरूर आपको दिखता भले न हो

**

जोश-ओ-जुनून से किये हासिल कई मुक़ाम

होता फ़ितूर आपको दिखता भले न हो

**

मौज़ूदगी है उनकी तसव्वुर में आपके

जलवा-ए-हूर आपको दिखता भले न हो

**

अनजान कोई रह सके क्या उसके दर्द से

दिल चूर चूर आपको दिखता भले न हो

**

हर वक़्त डोलता रहे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 6, 2019 at 11:30pm — 3 Comments

कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा (६० )



कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा

हमारे गाँव की चौपाल तक अब आब आएगा

**

खिलौना जानकर कुछ लोग उसको तोड़ डालेंगे

अगर तालाब की तह में उतर महताब आएगा

**

हमेशा ख़्वाब देखें और मेहनत भी करेंगे तो

हक़ीक़त में उतर कर एक दिन वो ख़्वाब आएगा

**

नहीं था इल्म हमको ये कि जिस फ़रज़न्द को पाला

वही बेआब करने सूरत-ए-कस्साब आएगा

**

ग़रीबी से दिलाएगा  निज़ात अब कौन और कैसे

अमीरी का रियाया को कभी क्या ख़्वाब आएगा …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 2, 2019 at 11:00pm — 5 Comments

सीखे सबक़ हयात से भूला नहीं कोई (५९ )



सीखे सबक़ हयात से भूला नहीं कोई

जीती हैं बाज़ियाँ सभी हारा नहीं कोई

**

कैसे भटक सके है भला शाख शाख पर

दिल आपका हुज़ूर परिंदा नहीं कोई

**

फ़रज़न्द की वजह से परेशान कोई है

कुछ हैं हताश इसलिए बच्चा नहीं कोई

**

इक बार हो गया है तो आसाँ न छोड़ना

ये इश्क़ दोस्त खेल तमाशा नहीं कोई

**

दरिया में जब उतर गया तो सीख तैरना

इसके सिवाय और है रस्ता नहीं कोई

**

दुनिया में हुस्न देखिये बिखरा पड़ा बहुत

फिर भी सिवाय आपके जँचता नहीं कोई…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 29, 2019 at 1:30am — 4 Comments

रस्सा-कशी खेल था जीवन(५८ )

एक विरह गीत

===========

रस्सा-कशी खेल था जीवन

एक तरफ का रस्सा छोड़ा |

इतनी भी क्या जल्दी थी जो

मीत अचानक नाता तोड़ा |

**

जीवन नदिया अपनी धुन में

अठखेली करती बहती थी |

और खुशी भी इस आँगन में

अपनी मर्जी से रहती थी |

सब कुछ अपने काबू में था

कैसे रहना क्या करना है,

हाँ थोड़े से दुख के झटके

कभी ज़िंदगी भी सहती थी |

लेकिन तुम थे साथ हमेशा

हँस हँस कर सह ली हर…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 25, 2019 at 1:30pm — 6 Comments

क्यों चिंता की लहरें मुख पर आखिर क्या है बात प्रिये ? (५७)

एक गीत प्रीत का 

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क्यों चिंता की लहरें मुख पर आखिर क्या है बात प्रिये ? 

पलकों के कोरों पर ठहरी क्यों कर है बरसात प्रिये ?

**

शुष्क अधर क्यों बाल बिखर कर अलसाये हैं शानों पर ?

काजल क्रोधित होकर पिघला जा पहुँचा है कानों पर | 

मीत कपोलों पर जो रहती वह गायब है अरुणाई | 

ऐसा लगता है ज्यों खो दी चंद पलों में तरुणाई…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 20, 2019 at 9:00am — 4 Comments

किसी के प्यार की ख़ातिर हमारा दिल तरसे (५६ )

किसी के प्यार की ख़ातिर हमारा दिल तरसे

घटा-ए-इश्क़ तो छाई न जाने कब बरसे

**

न तीर दिल पे चला यार ज़ख़्म गर देना

कि इस पे ज़ख़्म हुआ करते जब गुल-ए-तर से

**

क़दम बढ़ाना भी मुश्किल है जानिब-ए-मंज़िल

मिला फ़रेब हमें इस क़दर है रहबर से

**

करेगा चूर अगर ज़ुल्म की हदें टूटें

उमीद और है क्या आईने को पत्थर से

**

ख़ुदाया देख ज़रा भी किसी को, दर्द नहीं

किसी के दर्द बड़े हो गए समंदर से

**

लकीरें हाथों की जिसने बनाई मेहनत से

उसे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 18, 2019 at 1:00am — 2 Comments

मिटाने फासले तुझको अगर है गुफ़्तगू कर ले (५५ )



मिटाने फासले तुझको अगर हैं  गुफ़्तगू कर ले 

सियेगा ज़ख्म कोई सोच मत ख़ुद ही रफ़ू कर ले 

**

मुक़ाबिल ख़ौफ़-ए-ग़म होजा अगर पीछा छुड़ाना है

ग़मों से भाग मत इक बार तू रुख़ रूबरू कर ले 

**

नहीं महफ़ूज़ गुलशन में कली कच्ची अभी तक भी 

बचा है कौन अब उसकी जो फ़िक्र-ए-आबरू कर ले 

**

कोई तो दर्द है दिल में लबों पर आ नहीं पाता …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 26, 2019 at 5:30pm — 2 Comments

बीच समंदर कश्ती छोड़े धोका गर मल्लाह करे (५४)

बीच समंदर कश्ती छोड़े धोका गर मल्लाह करे 

मंज़िल कैसे ढूंढोगे जब रहबर ही गुमराह करे 

**

आज हुआ है इंसानों में प्यार मुहब्बत क्यों ग़ायब 

घर घर की चर्चा है अपने अपनों से ही डाह करे 

**

पानी मांग नहीं पाता है साँपों का काटा जैसे 

ऐसा काम भयानक अक़्सर मज़्लूमों की आह करे 

**

आज अक़ीदत और इबादत का जज़्बा गुम सा देखा 

दिल में जब…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 22, 2019 at 8:00pm — 2 Comments

"मुहब्बत की नहीं मुझसे " , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |  (५३ )

एक गीत प्रीत का

===========

"मुहब्बत की नहीं मुझसे " , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |

**

लता के सम लिपट जाना , नखों से पीठ खुजलाना |

अधर से चूम लेना मुख,नयन से कुछ कहा जाना |

कभी पहना दिया हमदम,गले में हार बाहों का

अचानक गोद में लेकर,तुम्हारा केश सहलाना |

हथेली से छुपा लेना, तुम्हारा नैन को मेरे

इशारे प्यार के थे या, शरारत भेद यह खोलो |

"मुहब्बत की नहीं मुझसे " , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 20, 2019 at 4:00pm — 8 Comments

ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी (५२)

(११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ )

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ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी

न किसी को ग़ैर पे है यक़ीं न मुक़ीम अब है यहाँ ख़ुशी

**

कहीं रंज़िशें कहीं साज़िशें कहीं बंदिशें कहीं गर्दिशें

कहाँ जा रहा है बता ख़ुदा ये नए ज़माने का आदमी

**

कहीं तल्ख़ियों का शिकार है कहीं मुफ़्लिसी की वो मार है

मुझे शक है अब ये बशर कभी हो  रहेगा ज़ीस्त में शाद भी

**

कहीं वहशतों का निज़ाम है कहीं दहशतें खुले-आम हैं 

मिले आदमी से यूँ आदमी मिले अजनबी से जूँ…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 30, 2019 at 2:30am — 1 Comment

ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए(५१)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए

अपना ही दर्द ग़ैर का लगता है इसलिए'

**

जब और कोई राह न सूझे ग़रीब को

रस्ता हुज़ूर ज़ुर्म का चुनता है इसलिए

**

बाज़ार के उसूल हुए लागू इश्क़ पर

बिकता है ख़ूब इन दिनों सस्ता है इसलिए

**

आसाँ न दरकिनार उसे करना ज़ीस्त से

दिल का हुज़ूर आपके टुकड़ा है इसलिए

**

उनके ज़मीर के हुए चर्चे जहान में

मिट्टी के भाव में…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 28, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )



सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़

अगर पैहम है तकलीफ़-ए-अवाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

निज़ामत देखती रहती वतन में क़त्ल-ओ-गारत क्यों

नज़रअंदाज़ की खू-ए-निज़ाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

न रोके तिफ़्ल की परवाज़ कोई भी ज़माने में

कभी सपने के घोड़े पर लगाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

किसी को हक़ नहीं है ये कि ले क़ानून हाथों में

मगर सूरत वतन में है ये आम अच्छी नहीं हरगिज़

**

क़ज़ा को घर बुलाना है तुम्हें तो ख़ूब पी लेना

वगरना मय है पक्की या है ख़ाम अच्छी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 27, 2019 at 9:15pm — 5 Comments

हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी (४९)

हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी

इस चमन में साथ साथ फूल भी हैं ख़ार भी

**

देखते बदलते रंग मौसमों के इश्क़ में

हिज्र की ख़िज़ाँ कभी विसाल की बहार भी

**

इंतज़ार की घड़ी नसीब ही नहीं जिसे

क्या पता उसे है चीज़ लुत्फ़-ए-इंतिज़ार भी

**

कीजिये सुकून चैन की न बात इश्क़ में

इश्क़ में क़रार भी है इश्क़ बे-क़रार भी

**

चश्म इश्क़ में ज़ुबान का हुआ करे बदल

जो शरर बने कभी कभी है आबशार भी

**

प्यार एक फ़लसफ़ा है और नैमत-ए-ख़ुदा

रंज़ है इसे बनाते लोग…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 24, 2019 at 1:30pm — 4 Comments

मन के आँगन में फूटा जो प्रीतांकुर नवजात |(४८ )

एक गीत

==========

मन के आँगन में फूटा जो

प्रीतांकुर नवजात |

खाद भरोसे की देकर अब

सींच इसे दिन-रात |

**

ध्यान रहे यह इस जीवन का

बीत गया बचपन |

आतुर है दस्तक देने को

अब मादक यौवन |

उर-आँगन में जगमग हर पल

सपनों के दीपक

और रही झकझोर हृदय को

यह बढ़ती धड़कन |

वयः संधि का काल हृदय में

भावों का उत्पात |

खाद भरोसे की देकर अब

सींच इसे दिन-रात…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 23, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै (४७ )

ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै 

क़ायम रखना रिश्ता है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

सिर्फ़ शनासाई से होता प्यार कहाँ मुमकिन 

इश्क़ मुक़म्मल करना है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

पहले के दिल के ज़ख़्मों का भरना है बाक़ी 

ज़ख़्म नया गर देना है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

ख़्वाब कभी क्या बुनने से ही होता है कामिल 

पूरा करना सपना है तो वक़्त ज़रा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 13, 2019 at 1:30am — 2 Comments

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