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कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा (६० )


कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा
हमारे गाँव की चौपाल तक अब आब आएगा
**
खिलौना जानकर कुछ लोग उसको तोड़ डालेंगे
अगर तालाब की तह में उतर महताब आएगा
**
हमेशा ख़्वाब देखें और मेहनत भी करेंगे तो
हक़ीक़त में उतर कर एक दिन वो ख़्वाब आएगा
**
नहीं था इल्म हमको ये कि जिस फ़रज़न्द को पाला
वही बेआब करने सूरत-ए-कस्साब आएगा
**
ग़रीबी से दिलाएगा  निज़ात अब कौन और कैसे
अमीरी का रियाया को कभी क्या ख़्वाब आएगा 
**
सफ़र जारी रखो  पैहम  अगर हैं आप तिश्नालब 
कि ख़ुद  चलकर नहीं कोई कभी   तालाब आएगा 

**
हमें उम्मीद बिलकुल भी न थी जो दूर रहता है
उसी पर एक दिन नादाँ दिल-ए-बेताब आएगा
**
ख़यालों से परे था ये कि उलफ़त में कोई मजनूँ
छिड़कने को जबीं पर ले कभी तेज़ाब आएगा
**
'तुरंत' इतने ग़मों के ज़ीस्त में हम हो गए आदी
अगर फिर आया ग़म तो बस ग़म-ए-नायाब आएगा
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी |
०२/०९/२०१९
(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Samar kabeer on September 7, 2019 at 12:16pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मुबाइल से हुए रिश्ते मुतासिर आज हैं इतने 
कि रहते मुंतज़िर हैं हम कोई अहबाब आएगा'

इस शैर के ऊला में 'सहीह शब्द है "मुतास्सिर",और सानी में "अहबाब" शब्द 'हबीब' का बहुवचन है,देखियेगा ।

'ग़रीबी से दिलाएँगे निज़ात अब कौन और कैसे 
क़फ़स में कब तलक देखें हसीँ सुरख़ाब आएगा'

इस शैर के ऊला में 'दिलाएँगे' की जगह "दिलाएगा" शब्द उचित होगा,और सानी में बात तार्किकता के विरुद्ध है,'सुरख़ाब' पानी का परिन्दा है,ग़ौर करें ।

'मुक़द्दर में कोई चश्म-ए-सितारा-याब आएगा'
इस शैैैर में 'चश्म-ए-सितारा-याब' 

की तरकीब ठीक नहीं लगती ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 5, 2019 at 9:09pm

भाई Sushil Sarna जी , आपकी हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया | अहसासों को कागज़ पर उतारने के मामले में आप सिद्धहस्त हैं ,तभी अहसास समझ सकते हैं | चंद गिनती के लोग हैं जो गद्य में पद्य सा आनंद प्रदान करते हैं ,आप उनमें से एक हैं ,वरना अधिकतर लोग तो अतुकांत में घास ही काटते हैं | सादर नमन | 

Comment by Sushil Sarna on September 5, 2019 at 4:47pm

कभी देखा नहीं सुनते रहे सैलाब आएगा
हमारे गाँव की चौपाल तक अब आब आएगा
**
खिलौना जानकर कुछ लोग उसको तोड़ डालेंगे
अगर तालाब की तह में उतर महताब आएगा

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी ऐसे खूबसूरत अहसासों को आप कैसे लफ़्ज़ों में उत्तर लेते हैं , ये आप ही के बस की बात है। शेर दर शेर दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर।
सोचते ही रहे कि हम भी सागर बनेंगे इक दिन
लफ्ज़ किनारों पर ही मगर डर के रह गए
जूनून कम न था अहसासों का दिल में लेकिन
दर्द दिल के हम उफ़नती लहरों से कह गए
सरना

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 5, 2019 at 4:16pm

आदरणीय प्रदीप देवीशरण भट्ट  स्नेहिल सराहना से उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय तल से आभार एवं नमन 

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 5, 2019 at 3:53pm

गिरधारी जी शानदार गज़ल्म बधाई

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