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सीखे सबक़ हयात से भूला नहीं कोई (५९ )


सीखे सबक़ हयात से भूला नहीं कोई
जीती हैं बाज़ियाँ सभी हारा नहीं कोई
**
कैसे भटक सके है भला शाख शाख पर
दिल आपका हुज़ूर परिंदा नहीं कोई
**
फ़रज़न्द की वजह से परेशान कोई है
कुछ हैं हताश इसलिए बच्चा नहीं कोई
**
इक बार हो गया है तो आसाँ न छोड़ना
ये इश्क़ दोस्त खेल तमाशा नहीं कोई
**
दरिया में जब उतर गया तो सीख तैरना
इसके सिवाय और है रस्ता नहीं कोई
**
दुनिया में हुस्न देखिये बिखरा पड़ा बहुत
फिर भी सिवाय आपके जँचता नहीं कोई
**
मैदान-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में उतरें तो सोच लें
हथियार बंद सब हैं निहत्था नहीं कोई
**
साये ने साथ छोड़ दिया जब से ज़ीस्त में
मेरा है आज ख़ुद के अलावा नहीं कोई
**
जितना लुटाएंगे मिले ये दोगुना 'तुरंत '
दुनिया में प्यार-जैसा ख़ज़ाना नहीं कोई
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी |
२९/०८/२०१९

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 1, 2019 at 7:38pm

आपकी क़ीमती दाद मेरे लिए वाइस-ए-फ़ख्र है मोहतरम Samar kabeer   साहेब | नवाज़िश-ओ-करम का दिल से शुक्रिया |

Comment by Samar kabeer on September 1, 2019 at 3:06pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 29, 2019 at 4:26pm

भाई प्रदीप देवीशरण भट्ट जी  रचना की सराहना के लिए सादर आभार एवं अभिनन्दन | 

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 29, 2019 at 4:12pm

 वाह वाह क्या कहने गिरधारी सिंह जी, तबियत प्रस्नन्न हो गई, अच्छी गज़ल के लिए बधाई

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