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Retired Accountant from Collectorate,Jaipur and Rajasthan Vidhan Sabha,Jaipur. I had been co-editor of "AGRAMMI" monthli magazine since 1975 to 1978, and Editor of "Nirala-Samaj" Quarterly both are social magazines of Agrawal community.Jaipur. Articles published in Rajasthan Patrika, and Rastradoot daily from JAIPUR between 1970 and 1980..
Published books - छंद काव्य संकलन -'करते शब्द प्रहार' ओक्टुबर,2016 और 'लक्ष्मण की कुण्डलियाँ' साझा संकलन - 'कुंडलिया छंद के नए हस्ताक्षर', 'गीत गुनगुनाएं फेर से', और 'गीतिका संकलन'
ओ बी ओ में हो रहा, उत्सव का आगाज |
आठ वर्ष तक का सफ़र,साक्ष्य बना है आज ||
दूर दृष्टि बागी लिए, खूब बिछया साज |
योगराज के यत्न से, बना खूब सरताज | |
काव्य विधा को सीखते, विद्वजनों…
ContinuePosted on April 2, 2018 at 2:30pm — 27 Comments
मुक्त हृदय से आज करूँ मैं, सबका ही सत्कार,
माँ वीणा सद्ज्ञान मुझे दो, जग में करूँ प्रसार ||
माँ-बापू के सद्कर्मों से, आया माँ की गोद।
मिला छत्र छाया में उनके,जीवन का आमोद।।
किये बहत्तर वर्ष पार ये, बिना किसी अवसाद
स्वर्गलोक से मिलता मुझको,उनका आशीर्वाद।।
माँ-बापू से पाया मैंने,जीवन में संस्कार।
मिला सनातन धर्म रूप में, मुझको भारत वर्ष ।
ऋषि-मुनियों का देश यही है,इसका मुझको हर्ष ||
वन-उपवन में रोप सकूँ मै, कुछ सुन्दर से…
Posted on November 19, 2017 at 7:30am — 14 Comments
गीत - मुखड़ा -
करे तमस को दूर दीप ही, दूर भागता अँधियारा |
दीप निभाये धर्म सदा ही, जलकर करता उजियारा ||
सूर्य किरण उठ भोर झाँकती, नित्य सदा ही खिड़की से
दीन करे विश्राम डरे बिन, सदा मेघ की घुड़की से ।।
दीन-हीन के द्वार जहाँ भी, घिरने लगता अँधियारा
दीप निभाये धर्म सदा ही, जलकर करता उजियारा ।
दीप जलाएं द्वारें जाकर, छँटे दीन का अन्धेरा ।
सबको दे उजियार दीप ही,पर खुद का नही सवेरा ।।
दुख दर्दों की मार झेलता, दीन हीन सा…
Posted on November 3, 2017 at 2:00pm — 9 Comments
Posted on November 1, 2017 at 7:51pm — 4 Comments
माँ के निकाले हुए पुराने बर्तन बेचकर दीपावली त्योहार के लिए जरूरी सामान की सूची अनुसार पिताजी बाजार से पूजा का सामान, छोटे-छोटे पाँच फल, दो गन्ने, पाँव लड्डू-जलेबी, फूले-पतासे, लक्ष्मी जी का पाना, और रुई लाकर सामान माँ को देते हुए पूछा 21 की जगह 11 दीपक ही ले आता हूँ । इस पर माँ बोली -"मेरे पीहर के गांव कुंडा से कुम्हार आया था जो कल मना करने पर भी 21 दीपक रख गया है और पूछने पर भी रुपये नही बताये । अब उसे रुपये भाई-दूज के बाद दे आऊंगी । इस बार तो 21 दीपक ही…
Posted on October 18, 2017 at 6:28pm — 18 Comments
महिला दिवस पर रचित दोहे -
मही रूप देवी धरे, धैर्य गुणों की खान
साहस की प्रतिमूर्ति भी, नारी को ही मान |
सृष्टि सृजनकर्ता यही,यही मही का अर्थ,
रणचण्डी भी बन सके, नारी सभी समर्थ ।
महिला से महके सदा,घर आँगन में फूल
वही सजाती घर सदा, मौसम के अनुकूल ।
जीवन के हर रूप में, नारी मन उपहार,
आलोकित जीवन करे, खुशियों के…
Posted on March 9, 2017 at 4:30pm — 4 Comments
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Comment Wall (59 comments)
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जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएँ आपको आदरणीय लडीवाला जी
आदरणीय लडीवाला जी
आपको जन्मदिवस के अवसर पर ढेरो शुभ कामनाये i आप चिरायु हो और स्वस्थ रहें i
सदस्य कार्यकारिणीगिरिराज भंडारी said…
आदरणीय लक्ष्मण भाई , आपका बहुत्बहुत आभार !!
आदरणीय लक्षमण सर जी सादर धन्यवाद आपका स्नेह और आशीष यूँ ही बनाये रखिये
लक्ष्मण भाई- सप्रेम राधे- राधे । सही सलाह एवं गीत को दिल से पसंद करने के लिए हार्दिक् धन्यवाद ॥
आदरणीय लडीवाला सर प्रणाम , रचना पसंद करने के लिए आपका तहेदिल से आभार और धन्यवाद !
आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी हार्दिक आभार.
abhar laxman ji
aapke prem ke liye aabhari hun bahut bahut aabhaar evm dhnyavaad आपका स्नेह, दुलार, आशीष एवं आत्मीयता की सुगंध का झोंका मेरे जीवन में नया उजाला लाएगा ...ऐसा मुझे भरोसा है ........आपकी कृपादृष्टि के लिए कृतज्ञ हूँ
सादर
आदरणीय लक्ष्मण जी, हांलाकि मुझे दोहों का कुछ ख़ास ज्ञान नहीं है मगर क्या खूब कहा है आपने-
'बहका बहका दिख रहा, खुद का ही व्यवहार
जैसे सब कुछ ख़त्म है, मन मेरा लाचार | '
बधाई हो!
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