For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जग में करूँ प्रसार (गीत) - रामानुज लक्ष्मण

मुक्त हृदय से आज करूँ मैं, सबका ही सत्कार,

माँ वीणा सद्ज्ञान मुझे दो, जग में करूँ प्रसार ||

माँ-बापू के सद्कर्मों से, आया माँ की गोद।
मिला छत्र छाया में उनके,जीवन का आमोद।।

किये बहत्तर वर्ष पार ये, बिना किसी अवसाद 
स्वर्गलोक से मिलता मुझको,उनका आशीर्वाद।।
माँ-बापू से पाया मैंने,जीवन में संस्कार।

मिला सनातन धर्म रूप में, मुझको भारत वर्ष ।
ऋषि-मुनियों का देश यही है,इसका मुझको हर्ष ||
वन-उपवन में रोप सकूँ मै, कुछ सुन्दर से वृक्ष,
मिले सफलता जनमानस को,पूर्ण करें सब लक्ष्य || 
चुका सकूँ मैं भारत माँ का, अंशमात्र भी भार।

संस्कारी परिवार हमारा,खुशबूं करें प्रदान। 
मिला मुझे सहयोग सभी का,पाने को मुस्कान।।
गुरुवर को मैं दे पाऊँ क्या, ऐसी कुछ सौगात?
रवि के ख कहाँ दीप की,क्या कोई औकात।।
प्राण प्रिया का सदा रहेगा, जीवन भर आभार।

मुक्त हृदय से आज करूँ मैं, सबका ही सत्कार।
माँ वीणा सद्ज्ञान दो ऐसा, जग में करूँ प्रसार ।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

- लक्ष्मण रामानुज लडीवाला

Views: 773

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 29, 2017 at 6:01pm

जी | सही कहा आपने आदरणीय Vijay Nikore जी | आजकल ऐसी भावनाएं देखने में नहीं आती | जिन्दगी तनावभरी हो गई और संवेदनाएं मर गई | एक साहित्यकार का रचना धर्म निभाते हुए समाज को दिशा दे सके | यह कर्त्तव्य तो अपना है ही | सादर आभार आपका आदरनी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 27, 2017 at 4:21pm

आपकी सम्बल प्रदान करती प्रेरक प्रतिक्रया देकर उत्साहवर्धन करने और सार्थक सुझावों के लिए हार्दिक आभार आदरणीय रामबली गुप्ता जी | संशोधन कर दिया है |  सादर नमन 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 27, 2017 at 3:49pm

आपकी प्रेरक प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार आपका श्री सुरेन्द्र कुंमर शुक्ल भ्रमर जी | सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 27, 2017 at 3:48pm

बहुत बहुत आभार आपका श्री बृजेश कुमार बृज जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 27, 2017 at 3:46pm

गीत रचना सराहने के लिए हार्दिक आभार आपका श्री मोहम्मद आरिफ साहब 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 27, 2017 at 3:45pm

हार्दिक आभार आपका श्री सुरेन्द्र नाथ सिंह कुश्क्षत्रप जी 

Comment by vijay nikore on November 23, 2017 at 11:32am

//माँ-बापू के सद्कर्मों से, आया माँ की गोद।
मिला छत्र छाया में उनके,जीवन का आमोद।।//

माता-पिता के प्रति ऐसी भावना हम सभी में जीवन भर कायम रहे  तो कितना अच्छा है।

सुन्दर गीत के लिए बधाई।

Comment by रामबली गुप्ता on November 23, 2017 at 6:31am
सरल, सहज भावों और शब्द चयन के साथ बहुत ही सुन्दर गीत रचा है आपने आदरणीय भाई रामानुज लक्ष्मण जी। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।सादर
आपने उक्त गीत के लिए सरसी छंद को आधार बनाया है जिसकी मधुरिम गेयता के कारण रचना और सुंदर हो गयी है।
वर्ष पार किये बहत्तर,,,,,, में गेयता भंग है यद्यपि शब्दकल ठीक हैं। इसे इस प्रकार कर लें-'किये बहत्तर वर्ष पार ये'
लक्ष को लक्ष्य के स्थान पर प्रयुक्त करना उचित होगा क्या? जरा विचारें
'सूरज सम्मुख' के बीच एक कारक चिन्ह 'के'की आवश्यकता प्रतीत हो रही है । इसे 'रवि के सम्मुख' कर लें।
'क्या कोई औकात' के स्थान पर 'है कोई औकात' कर लें। शेष सब शुभ शुभ।सादर
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on November 21, 2017 at 6:24pm

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति और सार्थक
भ्रमर ५

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 21, 2017 at 1:03pm
उत्तम भावपूर्ण गीत हुआ आदरणीय..सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । हार्दिक बधाई "
21 minutes ago
Sushil Sarna commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं…"
23 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

ग़ज़ल

   ग़ज़ल2122  2122  212 कितने काँटे कितने कंकर हो गयेहर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये रास्तों  पर …See More
3 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोधमानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध…See More
6 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"आदरणीय जी भविष्य के लिए  स्पष्ट हुआ ।हार्दिक आभार आदरणीय जी "
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .दीपावली
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन की समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दुओं का भविष्य…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ * ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, इस गजल को अभी तनिक और समय दिया जाना था.  सादर  "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .दीपावली
"आदरणीय सुशील सरना जी,  दीप जले हर द्वार पर, जग में हो उजियार ...       …"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,  तीर्थ जाना  हो  गया है सैर जबभक्ति का यूँ भाव जाता तैर…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . शृंगार
"किसने कहा छंद स्वर आधारित 'ही' हैं। तब तो शब्दों के अशुद्ध उच्चारण करने वाले छांदसिक…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service