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SANDEEP KUMAR PATEL
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Profile Information

Gender
Male
City State
jabalpur
Native Place
Sihora, jabalpur (M.P.)
Profession
Lecturer
About me
i m a chemical engineer

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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog

आज यों निर्लज्जता सरिता सी बहती जा रही है

आज यों निर्लज्जता सरिता सी बहती जा रही है  

द्वेष इर्षा और घृणा ले साथ बढती जा रही है

 

बिन परों के आसमाँ की सैर के सपने संजोते

पा रहे पंछी नए आयाम सब कुछ खोते खोते

 

लालसा भी कोयले पर स्वर्ण मढ़ती जा रही है

 

दिन गए वो खेल के जब खेलते थे सोते सोते  

अब गुजरता है लडकपन पुस्तकों का बोझ ढोते  

 

दौड़ है बस होड़ की जो क्या क्या गढ़ती जा रही है

 

काश के पंछी ही होते लौट आते शाम होते

कोसते भगवान् को…

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Posted on July 28, 2014 at 1:00am — 3 Comments

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा



देख हताशा की मिट्टी मन में लिपटी है

स्वार्थ सिद्धि में लिप्त भावना भी सिमटी है

ले आओ तूफान के मिट्टी ये उड़ जाए

मन का दिव्य प्रकाश देख तम भी घबराए



कब तक अनुमानों के दुनिया मे खोएगा

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा





स्वाभिमान खो गया तुम्हारा क्यूँ ये बोलो

तनमन से नंगे होकर तुम जग भर डोलो  

संस्कार मर्यादाओं का भान नहीं है

यकीं मुझे आया के तू इंसान नहीं है

   

जन्म…

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Posted on December 15, 2013 at 8:45pm — 4 Comments

हूँ प्यासा इक महीने से /ग़ज़ल/ संदीप पटेल "दीप"

हजज मुरब्बा सालिम

१२२२/१२२२

हूँ प्यासा इक महीने से

मुझे रोको न पीने से



पिला साकी  सदा आई

शराबी के दफीने से  



पिला बेहोश होने तक

हटे कुछ बोझ सीने से 



न लाना होश में यारो

नहीं अब रब्त जीने से 

 

उतर जाने दो रग रग में 

उड़े खुशबू पसीने से

जिसे हो डूबने का डर 

रखे दूरी सफीने से



हुनर आता है जीने का

है क्या लेना करीने से  



गिरा न अश्क उल्फत में

ये…

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Posted on December 15, 2013 at 11:30am — 14 Comments

पहले थे हम इक हकीकत अब कहानी हो गए/ ग़ज़ल

पहले थे हम इक हकीकत अब कहानी हो गए

जब से अपने ख्वाब यारो आसमानी हो गए

 

पांच सालों में महल सा अपने घर को कर लिया

चोर डाकू करके मेहनत खानदानी हो गए

 

तुम जियो खुश जिन्दगी भर ऐसा उसने जब कहा

एक सिक्का था उछाला हम भी दानी हो गए

 

यूँ हमारी हर ग़ज़ल खुशबू हुई औ सर चढ़ी 

देखते देखते हम जाफरानी हो गए

 

“दीप” गम के पर्वतों को तुमने क्या पिघला दिया  

गर्दिशों की कौम के सब पानी पानी हो गए

 

संदीप…

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Posted on December 6, 2013 at 2:00pm — 21 Comments

Comment Wall (27 comments)

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At 9:13pm on November 28, 2013, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

पटेल जी

आपके विचारो का  स्वागत है  i  मैंने  और भी ऐसे छंद लिखे है पर सब अतुकांत ही लिखे पर आपकी अभिलाषा जरूर पूरी करूंगा यदि माँ सरस्वती की कृपा रही i  क्योंकि ऐसे कठिन  छंदों  में वे ही मार्ग दिखाती  है i माँ शारदे को प्रणाम i  आपका आभार i

At 9:09pm on September 23, 2013,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 1:42pm on September 23, 2013, लक्ष्मण रामानुज लडीवाला said…

जन्म दिवस की हार्दिक मंगल कामनाए भाई श्री संदीप कुमार पटेल जी | प्रभु आपको निरंतर प्रगति की और अग्रसर होने में मदद करे | आपका और हाम्रारा स्नेह बना रहे | शुभ शुभ 

At 1:06am on September 23, 2013, जितेन्द्र पस्टारिया said…

" जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें " आदरणीय संदीप जी

At 2:38am on August 16, 2013, vijay nikore said…

प्रिय मित्र संदीप जी:

आपका हार्दिक धन्यवाद।

आपके परिवार के लिए शुभकामनाओं सहित।

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

At 9:02pm on July 23, 2013, Albela Khatri said…

aapke prem ke liye aabhari hun bahut bahut aabhaar evm dhnyavaad आपका स्नेह, दुलार, आशीष एवं आत्मीयता की सुगंध का झोंका मेरे जीवन में नया उजाला लाएगा ...ऐसा मुझे भरोसा है ........आपकी कृपादृष्टि के लिए कृतज्ञ हूँ

सादर

At 7:38pm on May 4, 2013, Dr Dilip Mittal said…

आपके प्रोत्साहन भरे भावों के लिए शुक्रिया 

At 9:23am on April 19, 2013, डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा said…

संदीपजी,

कभी कभी सुझाव भी दिया करिये, मार्ग दर्शन होता रहे तो मुझे आसानी होगी. वैसे सोने के काजल की कल्पना ही बेतुकी लगती है, पर कर ली. सन्दर्भ था स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयंती- उस समय लिखी रचना  पुनरन्कित कर प्रस्तुत की है.

At 4:43pm on April 16, 2013, annapurna bajpai said…

संदीप जी आपकी सभी कवितायें बहुत अच्छी एवं सुरुचि पूर्ण है मन को प्रसन्न करने वाली

At 7:56am on January 6, 2013, Abhinav Arun said…

श्री संदीप जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका !

 
 
 

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