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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव
  • Male
  • Lucknow Uttar Pradesh
  • India
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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's Discussions

सीता-चरित्र के नए प्रतिमान गढ़ता हुआ उपन्यास ‘सीता सोंचती थीं’-   डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव

       राम भगवान थे या सामान्य मानव, अवतार थे या इतिहासपुरुष, काल्पनिक चरित्र थे या सचमुच कोई विश्रुत लोकनायक. इन सब बातों पर मतभेद हो सकता है, पर वे भारतीय लोक मानस की जीवंत आस्था है इस बात में कोई…Continue

Started Feb 19

कवयित्री संध्या सिंह कृत “मौन की झनकार” (गीत संकलन ) का लोकार्पण - एक विहंगम दृष्टि-डॉ0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव

ओपन बुक्स ऑनलाइन (ओ बी ओ) लखनऊ चैप्टर एवं अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 19-11-2017 को प्रख्यात गीतकार एवं साहित्यकार डॉ धनंजय सिंह की अध्यक्षता में हुए एक…Continue

Started Nov 24, 2017

ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की साहित्य-संध्या माह नवंबर,2017– एक प्रतिवेदन--डॉ . गोपाल नारायण श्रीवास्तव

दिनांक 18 नवम्बर 2017,  ओपन बुक्स ऑन लाइन (ओ बी ओ) के प्रधान सम्पादक श्री योगराज प्रभाकर का जन्म दिवस. इसी घोषणा के साथ SHEROES HANG-OUT लखनऊ में ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की साहित्य-संध्या माह नवंबर 2017…Continue

Started Nov 24, 2017

 

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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post पाँच दोहे (गणेश जी बाग़ी)
"छप कर बिकता था कभी, जिंदा था आचार। जबसे बिक छपने लगा, मृत लगते अखबार।। उत्कृष्ट . नयी पत्रकारिता पर बेहतरीन तंज आदरणीय"
Jul 10
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Jul 10
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on SudhenduOjha's blog post चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह
"चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह बूँद-बूँद में व्यथा समेटे दहके कोई देह क़ा० अपने सरसी छंद से प्रारम्भ किया , पर आगे 16, 11 का निर्वाह बिखर गया . बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता कटघरे में आ गयी . आगे ध्यान रखें . सादर ."
Jul 10
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on SudhenduOjha's blog post चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह
"चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह बूँद-बूँद में व्यथा समेटे दहके कोई देह क़ा० अपने सरसी छंद से प्रारम्भ किया , पर आगे 16, 11 का निर्वाह बिखर गया . बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता कटघरे में आ गयी . आगे ध्यान रखें . सादर ."
Jul 10
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on Alok Rawat's blog post ग़ज़ल
"प्रिय अलोक  मंच पर आपकी गजल देखकर बड़ा सुकून हुआ . यहाँ  बहुत  कुछ सीखने को मिलता है . अपनी कमियां  खुद को अक्सर नजर नही आती पर यह मंच आपको अवश्य टोकेगा  जैसे मतले के बारे में कहा  गया कि शायद दोनों पंक्तियों में राब्ते…"
Jul 10
babitagupta commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"वक्त की महत्वत्ता को वयां करती बेहतरीन रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय सर जी. "
Jul 7
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"वाह आदरणीय डा. साहब उत्तम कोटि की कविता..."
Jul 5
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"आद0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन भाव सम्प्रेषण। बहुत उम्दा लिखा आपने। बधाई इस प्रस्तुति पर। सादर"
Jul 5
Sushil Sarna commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"वाह आदरणीय गोपाल जी बहुत सुंदर। ... अंतर्मन की व्यथा का एक चुभन देता सत्य। सही बात है वक्त क्या है , ये पता ही तब चलता है जब वक्त शेष नहीं रहता। बहरहाल इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई सर। सादर नमन आपकी लेखनी को।"
Jul 4
Shyam Narain Verma commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर"
Jul 4
Samar kabeer commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,बहुत उम्दा,सोचने पर मजबूर कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । कुछ टंकण त्रुटियाँ देख लें ।"
Jul 4
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"आ. भाई गोपालनारायण जी, बेहतरीन रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Jul 4
Sheikh Shahzad Usmani commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"बढ़िया बिम्ब लेकर बढ़िया शीर्षक के साथ सबक़, हिदायत व हौसला और प्रेरणा देता बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहिब।"
Jul 3
Sheikh Shahzad Usmani commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"बढ़िया बिम्बब लेकर बढ़िया शीर्षक के साथ सबक़, हिदायत व हौसला और प्रेरणा देता बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहिब।"
Jul 3
TEJ VEER SINGH commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post ला-इलाज कैंसर की तरह
"हार्दिक बधाई आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी।बेहतरीन संदेशप्रद प्रस्तुति।"
Jul 3
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव posted a blog post

ला-इलाज कैंसर की तरह

वक्त आता हैचला जाता हैहमे नही लगता किवक्त के आने और जाने सेकुछ फर्क पड़ता हैक्योंकि हमअपने निकम्मेपन की धुन मेंही मग्न रहते है औरबीतती जाती है उम्रफिर एक दिन जब दर्पणहमे चेतावनी देता हैहम रह जाते हैंअवाक् और भय से देखते हैअपने उजले हो चुके बालधंसी हई आँखें  पोपला मुखऔर सारे चेहरे परअनगिनत वक्त के निशान   तब हम जान पाते हैं किवक्त हमे छूकर  यूँ ही नही गया था वह छोड़ गया था अपना निशानजिसे तब नही देख पाए थे हमक्योकि वह हमेशा   आख़री दहलीज पर प्रकट होता हैहठात्  एक संवर्धितला-इलाज कैंसर की…See More
Jul 3

Profile Information

Gender
Male
City State
LUCKNOW (UTTAR PRADESH)
Native Place
LUCKNOW
Profession
RETD. GOVT. SERVANT
About me
Ph.D. in Hindi Lit. AND ACTIVE IN CREATIVE HINDI LITERATURE

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ला-इलाज कैंसर की तरह

वक्त आता है

चला जाता है

हमे नही लगता कि

वक्त के आने और जाने से

कुछ फर्क पड़ता है

क्योंकि हम

अपने निकम्मेपन की धुन में

ही मग्न रहते है और

बीतती जाती है उम्र

फिर एक दिन जब दर्पण

हमे चेतावनी देता है

हम रह जाते हैं

अवाक् 

और भय से देखते है

अपने उजले हो चुके बाल

धंसी हई आँखें  

पोपला मुख

और सारे चेहरे पर

अनगिनत वक्त के निशान   

तब हम जान पाते हैं…

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Posted on July 3, 2018 at 11:26am — 9 Comments

समझ गया हूँ

मैं
आज से नहीं कहूँगा
तुम्हे साथी, मीत या हमनवां
क्योंकि अब
मैं जान गया हूँ कि
ये शब्द
बौना कर देते है
उन संबंधो
और अहसासों को
जो हमें देते रहे
जाने कब से ?
वे अज्ञात एवं रहस्यमय
अनगिन स्पंदन
जिनमें मैंने पाया
जीवन
और जीवन का अर्थ.

(मौलिक / अप्रकाशित )

Posted on May 12, 2018 at 6:00am — 3 Comments

विकल्पहीन (लघु कथा )

क्षीर सागर में ‘नारायण –नारायण’ की आवाज गूँज उठी . भगवान विष्णु ने स्वागत करते हुए कहा- ‘आइये मुनिवर ! क्षीरोदधि में आपका स्वागत है .’

‘भगवन कुछ चिंतित हैं ?’ नारद ने वीणा को हाथ में संभाला.

‘एक चिरंतन समस्या है, मुनिवर’ - भगवान ने उत्तर दिया .

‘समस्या और आपके सम्मुख ---? क्यों परिहास करते हैं प्रभु”

‘परिहास नही है मुने!  दुर्निवार समस्या है.

‘वह क्या प्रभो ?’

‘तुमने इंडियन टिपिकल सास के बारे में तो सुना होगा.’

‘हाँ हाँ प्रभो ---‘- नारद ने…

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Posted on April 16, 2018 at 11:30am — 9 Comments

प्रायश्चित (लघु कथा )

 वृद्धाश्रम के द्वार पर विधवा माँ को छोड़कर जाते समय बेटे ने उसका मोबाइल अपने कब्जे में किया और जाते हुए बोला, ‘तुम यहाँ आराम से रहना. इसकी अब तुम्हें जरूरत ही क्या. मैं आकर हाल लेता रहूँगा ‘

बेटा चला गया तब माँ की आँखों के रुके आंसू बाहर निकलने को बेताब हुए .

’तुम्हारी कोई बेटी नही है क्या ?’- अचानक व्यवस्थापिका ने आकर उससे पूछा .

‘नही, पर क्यों ?’- उसने धीरे से कहा.

‘इसलिए कि आज तक कोई बेटी अपनी माँ को वृद्धाश्रम छोड़ने नही आयी’

‘सच कहती हो बहन, मैंने दो…

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Posted on April 4, 2018 at 9:05pm — 8 Comments

Comment Wall (55 comments)

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At 7:06pm on October 30, 2017, Alok Rawat said…

आदरणीय डॉक्टर साहेब
आपके द्वारा रचित खंडकाव्य मेघदूत का कथानक पढ़ा .बड़ा साहसिक कदम उठाया है आपने .आपने मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ा दी है .पूरा मेघदूत पढ़ने के लिए मन लालायित हो उठा है . आशा करता हूँ की बहुत जल्दी आपका खंडकाव्य पढ़ने को मिलेगा .महाकवि कालिदास की रचना का हिंदी काव्यानुवाद कितना बड़ा कार्य है और इसके लिए कितनी हिम्मत चाहिए मैं समझ सकता हूँ .किन्तु आपने इस कार्य को पूर्ण करके सामान्य जनमानस को भी मेघदूत की जो सौगात भेंट की है उसके लिए हिंदी साहित्य सदैव आपका ऋणी रहेगा . आप ऐसे ही पुनीत कार्य करते रहें .हमारी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ हैं .

At 9:17pm on June 27, 2016, Sulabh Agnihotri said…

स्वागत है आदरणीय !

At 7:02pm on January 3, 2016, Sushil Sarna said…

नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।

सुशील सरना

At 12:44pm on September 23, 2015, gaurav bhargava said…

वह अगले साल आएगा - इस वाक्य में कौन सा कारक है?
1)  कर्म कारक
2) अपादान कारक
3) अधिकरण कारक
4) सम्बन्ध कारक

At 6:35pm on August 6, 2015, Harash Mahajan said…

आदरणीय डा. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी कृतज्ञ हूँ सर !!

At 8:06pm on August 1, 2015, Prashant Priyadarshi said…

आ. गोपाल नारायन सर, ये घटना मेरे सामने की है(मेरे परम मित्र के साथ घटी हुई) इसीलिए मैंने इस पर लिखने का प्रयास किया है. एक प्रयास थी इस संवेदनशील मुद्दे पर लिखने की, काफ़ी कमियाँ रह गई हैं. सुधरा हुआ रूप निकट भविष्य में पुनः आप सभी श्रेष्ठ एवं गुणीजनों के समक्ष प्रस्तुत करूँगा. कहानी पर समय देकर मार्गदर्शन के लिए आपको कोटिशः धन्यवाद. आपके द्वारा इंगित किए गए बिन्दुओं  पर काम करके यह कहानी पुनः पोस्ट करूँगा.

At 12:16am on July 19, 2015, kanta roy said…
नतमस्तक हुई मै पाकर यह सम्मान , आदर में श्री माननीय डा. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आपके साथ ही ओबीओ की भी करती हूँ गुणगान ।
At 9:23am on June 5, 2015, Manan Kumar singh said…

'

यही है कविता का मर्म

नियम नहीं, धर्म नहीं

बस केवल कर्म'.....आदरणीय गोपाल भाईजी, बहुत बढ़िया, कविता कर्म प्रधान हो यह लक्ष्य होना चाहिए, सादर। 

At 2:07pm on April 16, 2015, jaan' gorakhpuri said…

बहुत बहुत आभार! आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर! स्नेह बनाये रक्खे!

At 5:37pm on February 28, 2015, maharshi tripathi said…

आ. डॉ गोपाल नारायण जी ,,,कविता के इस मंच पर ,,अपना मित्र बनाकर  आपने  मुझे पुरस्कार  दिया ,,आपका हार्दिक आभार और आशा है ,यूँ ही हम छोटों को आशीष देते रहेंगे |

 
 
 

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