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Manan Kumar singh
  • बिहार
  • India
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Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(झूठ बहुत ...)
"आभार आदरणीय बृज जी।"
1 hour ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(झूठ बहुत ...)
"बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय..सादर"
2 hours ago
Manan Kumar singh posted blog posts
9 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"आदरनीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें । आ. समर भाई जी की सलाहों कर गौर कीजियेगा ।"
May 23
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"जैसे,मतले के सानी में 'हो'शब्द भर्ती का है,'हो'की जगह 'ये'होना चाहिये । 'हो गई होती भली अपनी ग़ज़ल मैं पराई ही कथा कहता रहा' इस शैर में शुतरगुर्बा का दोष है,ऊला यूँ होना था:- 'हो गई होती भली मेरी ग़ज़ल'"
May 22
narendrasinh chauhan commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"लाजवाब रचना "
May 22
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"बहुत बहुत आभारी हूँ आदरणीय समर साहिब।कृपया कुछ इंगित करते,तो सहूलियत होती,सादर।"
May 22
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"आभार आदरणीय आरिफ भाई।"
May 22
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें । शिल्प पर ध्यान देने की ज़रूरत है ।"
May 22
Mohammed Arif commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)
"आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, बहुत बेहतरीन प्रयास । बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ,इंतज़ार करें ।"
May 22
Manan Kumar singh commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,
"जी सही है।"
May 22
Manan Kumar singh posted a blog post

गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)

2122  :    2122         212 ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::वह जमीं पर आग यूँ बोता रहाऔर चुप हो आसमां सोया रहा।1आँधियों में उड़ गये बिरवे बहुतसाँस लेने का कहीं टोटा रहा।2डुबकियाँ कोई लगाता है बहकऔर कोई खा यहाँ गोता रहा।3पर्वतों से झाँकती हैं रश्मियाँभोर का फिर भी यहाँ रोना रहा।4हो गयी होती भली अपनी गजलमैं पराई ही कथा कहता रहा।5चाँदनी छितरा गयी अपनी सिफतगिनतियों में आजकल बोसा रहा।6पोंछ देता अश्क मुंसिफ,था सुना,वज्म में करता वही सौदा रहा।7मर्तबा जिसको मिला,सब भूलकररास्तों पर किर्चियाँ फैला…See More
May 22
Manan Kumar singh commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,
"एक अच्छी गजल के लिए बधाइयाँ आदरणीय। हाँ, दूसरे शेर में     '......... पार मैं लगा दूँगी       ....... मझधार झूठ बोले हैं ।' की संगतता असहज प्रतीत होती है शायद । देखिएगा, सादर।  "
May 22
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल( बेखुदी में यार मेरे....)
"आदरणीय सतविंदर भाई,शुक्रिया।"
May 18
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(आइये,आज का चलन.....)
"आदरणीय लक्ष्मण भाई,दिल से आभारी हूँ।"
May 18
laxman dhami commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(आइये,आज का चलन.....)
"आ. भाई मनन जी,बढ़िया ग़ज़ल है, हार्दिक बधाई I"
May 18

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
E 52 Krishna Apt , Patna
Profession
Service
About me
A poet/ Writer

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गजल(झूठ बहुत ...)

22 22 22 22

झूठ बहुत तुमने बोले हैं

भाव सभीने ही तोले हैं।1



नासमझी का दामन पकड़े

छोड़े तुमने बस गोले हैं।2



कर्त्ता हो,बलिहारी समझो,

शब्दों के पीछे झोले हैं।3(झटके)



निज करनी मत पर्दा डालो,

राज कहाँ हमने खोले हैं?4



लिंग-वचन नियमित रहने दो,

कथ्य बहुत क्यों कर डोले हैं?5



चाहे कुछ भी कर लोगे क्या?

तथ्यों के अपने झोले हैं।6(झोलियाँ)



तुमने कुछ समझा है?,बोलो-

शेर बने क्या मुँहबोले हैं?7

@'मौलिक… Continue

Posted on May 28, 2017 at 10:30pm — 2 Comments

गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)

2122  :    2122         212 

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा

और चुप हो आसमां सोया रहा।1



आँधियों में उड़ गये बिरवे बहुत

साँस लेने का कहीं टोटा रहा।2



डुबकियाँ कोई लगाता है बहक

और कोई खा यहाँ गोता रहा।3



पर्वतों से झाँकती हैं रश्मियाँ

भोर का फिर भी यहाँ रोना रहा।4



हो…

Continue

Posted on May 22, 2017 at 8:27am — 7 Comments

गजल(आइये,आज का चलन.....)

212 212 212 212

^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

आइये,आज का जो चलन,देखिये,

सच हुआ झूठ का जो कथन,देखिये।1



मैं सही,वह गलत,घोषणा हो रही,

जिंस बन बिक रहे वे,रटन देखिये।2



देख लें सूट-बूटी वदन आज कल

फट गयी जेब चमके बटन देखिये।3



बेतरह ढूँढ़ते आपकी गलतियाँ

ढूँढ़ते आप, फटता गगन देखिये।4



नेमतें खुद गिनाते , हुए मौन कब?

लग रहा, बढ़ गया है वजन, देखिये।5



चाँद पर थूकना है मुनासिब कहीं?

दाग लगता नहीं क्या? फलन… Continue

Posted on May 14, 2017 at 8:00am — 14 Comments

गजल( बेखुदी में यार मेरे....)

2122   2122  2122  212

बेखुदी में यार मेरे याद आना छोड़ दो

मुस्कुराने की अदा है कातिलाना, छोड़ दो।1

 

सूखती-सी जो नदी उम्मीद की, बहती रही

कान में पुरवाइयों-सी गुनगुनाना छोड़ दो।2

 

ख्वाहिशों के दौर में थमती नहीं है जिंदगी 

उँगलियों पर अब जरा मुझको नचाना छोड़ दो।3

 

चाँद ढलता जा रहा फिर है पड़ी सूनी गली

बेबसी में अब कभी मुझको बुलाना छोड़ दो।4

राह अपनी मैं चलूँ तुमको मुबारक रास्ते

अनकही बातें बता रिश्ते…

Continue

Posted on May 10, 2017 at 9:11pm — 10 Comments

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At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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