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Manan Kumar singh
  • बिहार
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Manan Kumar singh posted a blog post

गजल

जुबां से फूल झड़ते हैं मगर पत्थर उछालें वेगजब दिलदार हैं, महबूब हैं बस खार पालें वे।1लगाते आग पानी में, हमेशा ही लगे रहतेबुझे क्यूँ रार की बाती, नई तीली निकालें वे।2दिलों की आग जब उठकर दिलों को यूँ बुलाती हैकरेंगे और क्या बस शीत जल हर बार डालें वे।3समझना हो गया मुश्किल चलन अब के रफ़ीकों कासियाही लिख नहीं सकती है' कितना रोज सालें वे।4हकीकत फासलों में कैद होकर छटपटाती हैसुनेंगे तो नहीं कुछ गाल जितना भी बजालें वे।5"मौलिक व अप्रकाशित"See More
Monday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल
"आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय समर जी,नमन।"
Sep 10
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post गजल
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई,बधाई ।"
Sep 10
Manan Kumar singh posted a blog post

गजल

चाँद से अब दोस्ती का सिलसिला चलता रहेगाकब तलक वह मुस्कुराता भेदमय मामा रहेगा?1कौड़ियों का खेल हम करते नहीं, सब जानते हैंमुँह दिखाई तक हमारा हर कदम पहला रहेगा।2दूरियों का गम नहीं करते कभी हम इश्क वालेपाँव रखने में सतह पर जोर कुछ ज्यादा रहेगा।3आज इसरो की तपिश में तन-बदन पिघला जरा-साकल सुहाने और होंगे साथ में नासा रहेगा।4क्यूँ लजाना कोटि नजरें प्यार से फिर फिर निहारेंमन हुआ जाता व्यथित, पर हाथ में खाका रहेगा।5वक्त की रुसवाइयों का हम रहे कायल हमेशाआँधियों में कब थमे, वह फेंकता पासा रहेगा।6"मौलिक व…See More
Sep 8
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल
"आभार आदरणीय समर जी,नमन।"
Sep 7
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post गजल
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।"
Sep 7
Manan Kumar singh posted a blog post

गजल

फूल को काँटा चुभाना तो कभी अच्छा नहीं घाव देकर मुस्कुराना तो कभी अच्छा नहीं।1प्रेम के बिरवे उगें तो वादियाँ गुलजार हों बेरहम पत्थर उठाना तो कभी अच्छा नहीं।2रोशनी का सिलसिला चलने लगा,चलने भी' दो भोर का सूरज चुराना तो कभी अच्छा नहीं।3प्यास धरती की बढ़ा क्यूँ फिर चले काली घटा? जल रहे को फिर जलाना तो कभी अच्छा नहीं।4दाग औरों को लगाने को सभी बेताब हैं, आँख से काजल उड़ाना तो कभी अच्छा नहीं।5इल्म हो कुछ तो मुकर्रर मंजिलों के वास्ते राह में काँटें बिछाना तो कभी अच्छा नहीं।6 "मौलिक व अप्रकाशित"See More
Sep 2
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"आभार आदरणीया"
Aug 31
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"बहुत बहुत आभार आदरणीय मोहन जी।"
Aug 31
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"बहुत बहुत आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी।"
Aug 31
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"बहुत बहुत आदरणीय अजय जी! आपकी स्नेहिल टिपण्णी मेरे लिए पाथेय है।वैसे भाव उमगते हैं,तो शब्द ढूँढ़ लिए जाते हैं।"
Aug 31
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"आपका आभार आदरणीय।"
Aug 31
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"शुक्रिया आदरणीय।"
Aug 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-53 (विषय अधिकार)
"अधिकार --- 'आजाद मुहल्ले कबीलों-से हो गए। ताकतवर मुहल्लों के मुखिया सरदार मुक़र्रर हुए।मुहल्लों की छीनाझपटी तेज हो गई।कमजोर मुहल्ले चाहे-अनचाहे किसी न किसी कबीले के हिस्से बने।किसी कबीले ने अपने किसी मुहल्ले को कुछ विशेष सुविधाएँ मुहैया कराई,तो…"
Aug 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-52 (विषय: अस्तित्व)
"बहुत बहुत आभार आदरणीया।"
Jul 31
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-52 (विषय: अस्तित्व)
"जी आपका आभार।"
Jul 31

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
E 52 Krishna Apt , Patna
Profession
Service
About me
A poet/ Writer

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गजल

जुबां से फूल झड़ते हैं मगर पत्थर उछालें वे

गजब दिलदार हैं, महबूब हैं बस खार पालें वे।1

लगाते आग पानी में, हमेशा ही लगे रहते

बुझे क्यूँ रार की बाती, नई तीली निकालें वे।2

दिलों की आग जब उठकर दिलों को यूँ बुलाती है

करेंगे और क्या बस शीत जल हर बार डालें वे।3

समझना हो गया मुश्किल चलन अब के रफ़ीकों का

सियाही लिख नहीं सकती है' कितना रोज सालें वे।4

हकीकत फासलों में कैद होकर छटपटाती है

सुनेंगे तो नहीं कुछ गाल जितना भी बजालें वे।5

"मौलिक व…

Continue

Posted on September 16, 2019 at 8:10am

गजल

चाँद से अब दोस्ती का सिलसिला चलता रहेगा

कब तलक वह मुस्कुराता भेदमय मामा रहेगा?1

कौड़ियों का खेल हम करते नहीं, सब जानते हैं

मुँह दिखाई तक हमारा हर कदम पहला रहेगा।2

दूरियों का गम नहीं करते कभी हम इश्क वाले

पाँव रखने में सतह पर जोर कुछ ज्यादा रहेगा।3

आज इसरो की तपिश में तन-बदन पिघला जरा-सा

कल सुहाने और होंगे साथ में नासा रहेगा।4

क्यूँ लजाना कोटि नजरें प्यार से फिर फिर निहारें

मन हुआ जाता व्यथित, पर हाथ में खाका रहेगा।5

वक्त की रुसवाइयों का…

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Posted on September 8, 2019 at 4:45pm — 2 Comments

गजल

फूल को काँटा चुभाना तो कभी अच्छा नहीं

घाव देकर मुस्कुराना तो कभी अच्छा नहीं।1

प्रेम के बिरवे उगें तो वादियाँ गुलजार हों

बेरहम पत्थर उठाना तो कभी अच्छा नहीं।2

रोशनी का सिलसिला चलने लगा,चलने भी' दो

भोर का सूरज चुराना तो कभी अच्छा नहीं।3

प्यास धरती की बढ़ा क्यूँ फिर चले काली घटा?

जल रहे को फिर जलाना तो कभी अच्छा नहीं।4

दाग औरों को लगाने को सभी बेताब हैं,

आँख से काजल उड़ाना तो कभी अच्छा नहीं।5

इल्म…

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Posted on September 1, 2019 at 8:30am — 2 Comments

शरणार्थी (लघुकथाएं )

शरणार्थी

(1)

---

दो मित्र आपस में बातें कर रहे थे;एक मानवतावादी था, दूसरा समाजवादी।पहले ने कहा-

अरे भई!वो भी आदमी हैं,परिस्थिति के मारे हुए।बेचारों को शरण देना पुण्य-परमार्थ का काम है।

दूसरा:हाँ तभी तक,जबतक यहाँ के लोगों को शरणार्थी बनने की नौबत न आ जाये।



(2)

---

-हाँ,जुझारूपन हमारे खून में है।

-हमारी खातिर तुम क्या करोगे?

-जान भी दे सकते हैं।

-हमें वोट चाहिए।जान…

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Posted on June 8, 2019 at 8:53am — 2 Comments

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At 11:05pm on June 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय मनन कुमार सिंह जी बहुत शुक्रिया आपने जो हौसला बढ़ाया है
At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
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सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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