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Manan Kumar singh
  • बिहार
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"आभार आदरणीय।"
Mar 9
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"आभार आदरणीय।"
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"आभार आदरणीय।"
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"आभार आदरणीय।"
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"आभार आदरणीय।"
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"बहुत बहुत आभार आदरणीया प्रतिभा जी।"
Mar 9
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"सच हुआ जाहिर जहाँ लोग कुछ चकरा गयेफिर पुरानी तख्तियाँ ले सड़क पर आ गये।1 कुछ मसीहा शांति के दफ्न माफिक थे इधर बोल इनके देखिये,दुश्मनों को भा गये।2 क्या कहें क्या ना कहें, कुछ पता इनको नहींसैनिकों के शौर्य पर क्यूँ भला चकरा गये?3 मुश्किलों से जूझता…"
Mar 9
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Mar 9
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-47
"आभार आदरणीया।"
Feb 28
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"आभार आदरणीय विनय जी।"
Feb 28
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"आभार आदरणीय मिथिलेश जी।प्रयास पसंद आया, यह खुशी का सबब है।"
Feb 28
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"आभार आदरणीय तसदीक जी।"
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"आदरणीय समर जी,आभार।"
Feb 28
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"आभार आदरणीय।"
Feb 28
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"आदरणीय योगराज जी , निवेदन करना चाहूँगा कि 'धर' यानि कबंध या सर विहीन है।"
Feb 28

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
E 52 Krishna Apt , Patna
Profession
Service
About me
A poet/ Writer

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मत समझना मैं...(गजल)

2122 2122 2122 2

मत समझना मैं पढ़ा अख़बार हूँ कल का

हमसफ़र हूँ,काबिले-आसार हूँ कल का।1

राह सिमटी जा रही है आज की पल-पल

देख लो मुझको जरा आधार हूँ कल का।2

कौड़ियों के मोल बिकता आज तुम्हारा

सच लिए चलता रहा मनुहार हूँ कल का।3

रोशनाई की उमंगों का…

Continue

Posted on February 8, 2019 at 11:00pm — 6 Comments

गजल(जैसे तैसे बात बनी है...)

22  22  22 22

जैसे-तैसे बात बनी है

रमई चादर हाथ लगी है।1

मंदिर-मंदिर घूम रहा मैं

चमचा-चमचा आस पली है।2

'बबुआ काम करेगा बढ़कर',

'दादाओं' ने बात कही है।3

'मम्मी' का मैं राजदुलारा

लगता, 'पगड़ी' माथ चढ़ी है।4

अपनी कुर्सी पर बैठा 'वह'

दिल में कितनी बात खली है!5

साँझ-सबेरे ईश-विनय कर

'राम-रमा' में प्रीत जगी है।6

रंगे आज सियार बहुत हैं

मुझपर सबकी आँख लगी है।7

चोट…

Continue

Posted on November 11, 2018 at 11:08am — 6 Comments

गजल(उठे हैं.....)

122 122  122 12

उठे हैं किसी को गिरा के मियाँ

चले पाग सर पे सजा के मियाँ।1

कहा था, डरेगा न कोई यहाँ

रहे खुद को हाफ़िज बना के मियाँ।2

रहेगा न सूखा शज़र एक भी--

कहें नीर सारा सुखा के मियाँ।3

मिटी भूख उनकी हुए सब सुखी

चहकते चले माल खा के मियाँ।4

किये लाख सज़दे, मिले कब सनम?

गये थे कभी सर नवा के…

Continue

Posted on October 29, 2018 at 7:15am — 10 Comments

गजल(था कभी...)

2122 2122 2122 212
था कभी कितना नरम वह! हर कदर आखर हुआ
जब हवाओं ने छुआ तब पात वह जर्जर हुआ।1

सूख जाती है सियाही आजकल जल्दी यहाँ
ख्वाहिशों के फ़लसफों पे आदमी निर्झर हुआ।2

मिट्टियों की कौन करता है यहाँ पड़ताल भी
हर शज़र गमला सजा आकाश पर निर्भर हुआ।3

जो उड़ाता था वहाँ बेपर घटाओं को कभी
देखते ही देखते वह आजकल बेपर हुआ।4

वक्त की मदहोशियाँ क्या-क्या करा देतीं यहाँ
गर्द के बस ढ़ेर जैसा एक दिन अकबर हुआ।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on October 23, 2018 at 10:00am — 5 Comments

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At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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