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Manan Kumar singh's Blog (200)

लालटेन(लघुकथा)

स्कूटर फर्राटे से थाने के सामने निकला।यह बात थाने को नागवार गुजरी।एक सिपाही ने हाथ दिया।स्कूटर रुक गया।उसने थाने के कंपाउंड में चलने का इशारा किया।अब स्कूटर थाने के मेन गेट पर खड़े इंचार्ज के सामने खड़ा था।सवार बगल में थे।इंचार्ज ने गाड़ी के कागज की माँग की,जो दिखा दिए गए।उसे गाड़ी का नंबर पढ़ने में दिक्कत हो रही थी।बार बार बताने के बावजूद वह अटक रहा था।अंत में स्कूटर सवार बुजुर्ग ने ध्यान दिलाया कि नंबर तो ठीक ही लिखा हुआ है।हाँ, लिखावट थोड़ी फीकी हो गयी है।लजाया-सा इंचार्ज झिझक भरे लहजे में…

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Added by Manan Kumar singh on May 8, 2018 at 7:23am — 13 Comments

गजल(कहूँगा बात मैं....)

1222    1222    1222   1222

      ---------------------------------

कहूँगा बात हो जैसी,अरे मैं तो सलीके से

समझ लो बासमझ,झगड़ो नहीं ,आओ सलीके से।1



लगे हैं दाग ये कितने तुम्हारे आस्तीनों पर

अभी भी वक्त है पगले जरा धो लो सलीके से।2



बहाया खूं पता कितना शरीफों का, गरीबों का?

अगर सच में जिगर धड़के जरा रो लो सलीके से।3



बहुत इमदाद मुँह से बाँटते हो तुम गरीबों में

फ़टी झोली अभी भी है विलखते वो सलीके से।4



पटकने सर लगे कितने कहा…

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Added by Manan Kumar singh on May 3, 2018 at 8:09pm — 10 Comments

गजल(ओ प न बु क् स औ न ला इ न)

2122    2122  212
ओस की बूंदें भी' प्यासी हैं अभी
परकटी चाहें अधूरी हैं अभी।1

नश्तरों का हाल अब मत पूछना
बुत बनी रातें यूँ तारी हैं अभी।2

क्या करोगे जानकर सब सिलसिला?
सच मरा है, बातें' टेढ़ी हैं अभी।3

औरतों के नाम लेके आजकल
नख चले,घातें यूँ' माती हैं अभी।4

लाइलाजों का करो कुछ तो जतन
इल्म वाली बाँहें' बाकी हैं अभी।5

नर्म बिस्तर के सिवा झपकी नहीं?
नाखुदाओ! लपटें' खासी हैं अभी।6
"मौलिक व अप्र का शि त"

Added by Manan Kumar singh on April 22, 2018 at 8:49am — 8 Comments

गजल(अपना घाव...)

22  22  22  22           

अपना घाव छुपा के रखना

मन को भी समझा के रखना।1

ऊपर ऊपर जैसा भी हो

अंदर आग जला के रखना।2

और उजाला करना होगा

थोड़ा तेल बचा के रखना।3             

तीर चलेंगे जाने कितने

देखो ढ़ाल बढ़ा के रखना।4

कौन सुनेगा बातें  ढ़ब की

बाण-धनुष चमका के रखना।5

मंजिल कोई दूर नहीं है

ख्वाहिश को उमगा के रखना।6

रात अँधेरी,चंदा संगी,

रुनझुन बीन बजा के…

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Added by Manan Kumar singh on April 21, 2018 at 7:30pm — 10 Comments

गजल(हारकर बैठे जुआरी....)



     2122   2122   2122 2          

हारकर बैठे जुआरी,हो  नहीं सकता

बंदरों के सर हो टोपी,हो नहीं सकता।1

आसरों का सिलसिला चलता रहा कब से

जो सियासत में,करीबी?हो नहीं सकता।2

रास्ते जितना चले शायद मुनासिब हो

रुक गये तो तय हो बाकी,हो नहीं सकता।3

झूठ पर कुरबान सब हैं किस कदर देखो

सच कहो, हो वाहवाही,हो नहीं सकता।4…

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Added by Manan Kumar singh on April 17, 2018 at 7:26am — 9 Comments

गजल#(आज के दिन पर)

22  22  22  22

मूर्खों का सम्मेलन हो फिर,

बीतीं बातें,चिंतन हो फिर।1

उम्र हुई तो क्या होता है

सुन्नत,चाहे मुंडन हो फिर।2

अपने तर्क उठाते रहिये

औरों का बस खंडन हो फिर।3

जात-धरम अवसाद हुए कब?

मुँहदेखी हो,मंडन हो फिर।4

भाषा,भनिति अबला जैसी

नाच नचा लें,ठन-ठन हो फिर।5

पीठ नहीं पूजी जाये तो

चलते-फिरते अनबन हो फिर।6

पढ़ने से परहेज भला है

मतलब कुछ हो, लेखन हो…

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Added by Manan Kumar singh on April 1, 2018 at 9:08pm — 14 Comments

बेवफा वे अब कहाँ(गजल)

2122   2122   2122

बेवफा वे अब कहाँ,अपने हुए हैं

वर्जनाएँ तोड़कर आगे बढ़े हैं।1

दो कदम उनके हुए तो कम नहीं हम

कुछ कदम चलकर मुरव्वत से मिले हैं।2

गालियाँ उनकी नहीं लगतीं बुरी अब

लफ्ज उनके चासनी में ज्यों सने हैं।3

दोस्ती का सिलसिला चलता रहेगा

लोग वैसे कह रहे,चिकने घड़े हैं।4

डर सताता हार जाने का हमेशा

इस कदर ही मोहरे कि त ने लुटे हैं।5

फूलती-फलती रहे अपनी तिजारत

नाव जिनकी डूबती वे आ…

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Added by Manan Kumar singh on March 13, 2018 at 9:30pm — 3 Comments

शरणार्थी(लघुकथा)

दो मित्र आपस में बातें कर रहे थे;एक मानवतावादी था और दूसरा समाजवादी।पहले ने कहा-
अरे भई!वो भी आदमी हैं,परिस्थिति के मारे हुए।बेचारों को शरण देना पुण्य-परमार्थ का काम है।
दूसरा:हाँ तभी तक,जबतक यहाँ के लोगों को शरणार्थी बनने की नौबत न आ जाये।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on March 7, 2018 at 8:25pm — 8 Comments

गजल(लूटकर घर का खजाना....)

लूटकर  घर का खजाना भाग जाता आदमी

चंद सिक्कों के लिए भी मार खाता आदमी।1

बिक रहे कितने पकौड़े,चुस्कियों में प्यालियाँ,

और ठगकर आपसे भी मुस्कुराता आदमी।2

योजनाएँ चल रहीं पर हो रहीं नादानियाँ

देखकर यूँ हाल अपना खुद लजाता आदमी।3

सच कहा जाता नहीं,कह दे अगर,बदकारियाँ

तिलमिलाती बात है फिर थरथराता आदमी।4

रोक सकता दुश्मनों को देख लो जाँबाज दिल

भेदियों से घर में लेकिन मात खाता आदमी।5

खेत में होते हवन से हाथ जलते हैं बहुत

कर चुकाने में फसल…

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Added by Manan Kumar singh on February 26, 2018 at 9:00pm — 7 Comments

हेडलाइन(लघुकथा)

-हेलो सर।

-हाँ, बोलो रवि',समाचार-संपादक ने खबर की बावत तफ्तीश की।

-जोरदार खबर है सर।

-बताओ भी जल्दी।जान मत खाओ।

-सर,शहर-कोतवाल की बीबी भाग गई।पहले बेटी,अब....।

-धत्त ससुरे!ये भी कोई खबर है?

-तहलका मच जायेगा सर,इस खबर से।

-नहीं रे,कुछ नहीं होगा।अभी घोटालों की खबर चाहिए, ....बस घोटालों की।

-वो भी है साहिब।

-तो बोल ना रे....।

-आज कलम वाली कंपनी के यहाँ छापे पड़ रहे हैं।

-कहाँ?

-यू पी में।हजारों करोड़ की बात…

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Added by Manan Kumar singh on February 20, 2018 at 8:30am — 6 Comments

वेलेंटाइन गिफ्ट(लघु कथा)



शहरी छोरा देहात घूमने आया है,मौसी के यहाँ।गाँव का नाम पंडितपुर है,देहात यहाँ दिखता है। उजड्ड लोग,अनपढ़ औरतें,गिल्ली-डंडा, कबड्डी और तिलंगी में अझुराये लड़के-बच्चे।बकरी चराती, मवेशियों को सानी देती लड़कियाँ, बस।गाँव के स्कूल की पढ़ाई का आलम है कि तीन-तीन बार मैट्रिक में फेल हुए तीन मास्टर दिहाड़ी जितनी रकम पर उसे संभाले हुए हैं।रही बात विद्यार्थियों की ,तो खिचड़ी के नाम पर कुछ घर से समय निकालकर आ जाते हैं।फिर खिचड़ी खतम, स्कूल खतम।मुखियाजी से मिलकर रजिस्टर -लिखाई हो जाती है।वही झुनिया जरा…

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Added by Manan Kumar singh on February 14, 2018 at 10:04pm — 8 Comments

बातचीत(लघु कथा)


-मेरी तो पक गयी।
-मेरी भी छन गयी।
-तो चल सब को छकाया जाय',पकौड़ी और छकौड़ी छहकती हुई एक साथ बोलीं।
-लेकिन उसके लिए चाय चाहिए,जो मेरे ही पास है',केतली ने कहर भरी नजर से  दोनों को देखा।
-आ जा राम प्यारी! चल साथ-साथ चलते हैं',छकौड़ी और पकौड़ी केतली को गले लगाने लगीं।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on February 7, 2018 at 10:06am — 1 Comment

बीरबल की खिचड़ी(लघु कथा)

-कब फिरेंगे अपने दिन?

-फिर ही तो रहे हैं।सुबह से शाम,फिर बातें तमाम।

-अरे भइये!अच्छे दिन आनेवाले थे।सुना था कभी।

-सब दिन अच्छे होते हैं।सब ईश्वर प्रदत्त हैं।

-सो तो ठीक है,अकलू।पर यहाँ तो 'नून-तेल-तरकारी,पड़ रही है भारी।'

-ठीके बोलते हो ,बकलू।ई नयको बजटवा में तरकारी महंगी हुई है।और वनस्पति तेल भी।

-ऊपर से होरी आई है।रंग फीका हो गया भाई।

-सो तो है।

-अरे का खुसर-पुसर चल रहल बा रे तू दुनो में?' टकलू ने टिटकारी भरी।

-लो आ गया अपन टकलू।'जोरू न…

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Added by Manan Kumar singh on February 4, 2018 at 11:30pm — 5 Comments

बातचीत(लघु कथा)


-उन्हें कुत्तों ने बुरी तरह काट खाया है।
-क्यूँ?
-उनकी बड़ाई करने की आदत जो न करा दे।
-बड़ाई?
-हाँ भई।उन्होंने कुत्तों को आदमी कह दिया था।
-अरे,घोर अनर्थ',अदीब चिल्लाया।@

Added by Manan Kumar singh on January 28, 2018 at 10:29pm — 2 Comments

गजल(मसाला मिलाओ...)

मसाला मिलाओ बनाओ मूवी
किसी को नचाओ सजाओ मूवी।1

चलें लात मुक्के डिगो मत निडर
बड़ी हसरतें हैं दिखाओ मूवी।2

लजाते नहीं आजकल सब बेढ़ब
लगे आग चाहे चलाओ मूवी।3

बँधी आँख पर पट्टियाँ कितनी हैं!
दिखेगा नहीं जो जलाओ मूवी।4

"कहाँ मोल खूं का रहा पहले का
बहाओ, बहाओ,बहाओ, मूवी!"5

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Manan Kumar singh on January 25, 2018 at 10:00am — 8 Comments

अपनी अपनी समझ (लघु कथा)

गुरु द्रोणाचार्य ने दुर्योधन एवं युधिष्ठिर को एक-एक अच्छे और बुरे व्यक्ति को ढूँढ़ कर लाने को कहा।शाम को दोनों खाली हाथ वापस आ गए।

-क्यूँ, क्या हुआ?खाली हाथ क्यूँ आया',गुरूजी ने दुर्योधन से पूछा।

-गुरुदेव! मैंने बहुत कोशिश की,पर कोई भी ऐसा न मिला जिसमें एक भी बुराई न हो।

-युधिष्ठिर ,तुम क्यूँ खाली हाथ आ गए?'

-आचार्य! मुझे कोई ऐसा न मिला जिसमें एक भी अच्छाई न हो।'

आचार्य मुस्कुराये।

-"युधिष्ठिर समझ गए,पर दुर्योधन आज भी नासमझ बना बैठा है;चाहे लेखन में हो,पत्रकारिता…

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Added by Manan Kumar singh on January 23, 2018 at 8:00am — 9 Comments

समय का फेर(लघु कथा)

कभी उनकी खूब चलती थी।कोर्ट-कचहरी सब वही थे।और सरकार तो थे ही।सचिव लोग गाहे-बेगाहे जरूरी फाइलें लेकर उनके आवास जाते,तो झिड़की मिलती।टका-सा मुँह लिए लौट आते।अपने नसीब को रोते कि कहाँ से कहाँ कलक्टर हुए,अर्दली ही रहते तो बेहतर होता।चैता के ताल पर 'रे ठीक से नाच बुरबक' तो न सुनना पड़ता। सुरती ठोंककर हाकिम को तो नहीं खिलानी पड़ती। उन्हें अपने लिए 'हाकिम,साहिब' जैसे शब्द गाली लगने लगे थे।वैसे अब हाकिम-सरकार के लोग इन लोगों को अर्दली जैसे ही समझते थे,आर्डर देते थे।

फिर समय ने करवट बदली। साहब जी…

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Added by Manan Kumar singh on January 18, 2018 at 9:45am — 3 Comments

ब्रेन वाश(लघु कथा)

ब्रेन वाश

---

-हाँ, मैंने कहा था।

-‎क्यूँ?

-‎क्योंकि मुझे असहिणुता दिखी थी।

-‎कैसे?

-‎पूरे देश में हो-हल्ला मचा हुआ था।अभिव्यक्ति की आजादी छीनी जा रही थी।

-‎कैसी आजादी?'मातृभूमि को मुर्दा कहने और इसके टुकड़े होने' के नारों की आजादी?

-‎वे लोग व्यवस्था से क्षुब्ध थे।

-‎और यह बताने वाले दुश्मन देश की नुमाइंदे थे,कि नहीं?

-‎वह तो बाद में पता चला न?

-‎तो पहले क्या आपलोग घास छील रहे थे,कि धूप में बाल पका रहे थे?

-‎अरे भाई,तुमुल जन-रव ने मुझे घसीट…

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Added by Manan Kumar singh on January 16, 2018 at 8:31pm — 9 Comments

विमोचन(लघु कथा)



-धन्यवाद, पैसे खाते में आ गये।प्रयाग में विमोचन हो जाये?

-‎अच्छा रहेगा।

-‎हॉल वगैरह बुक कर दिया है।बस कुछ लोगों की व्यवस्था आप करा लीजिये।

-‎आपके प्रकाशन की और पुस्तकें भी हैं न?

-‎थीं,पर अब उनका विमोचन शायद अलग से हो।

-‎क्यूँ?

-‎लेखकों की भागीदारी पूरी नहीं हो रही है।

-‎फिर?

-‎यह कार्यक्रम आपका ही होगा।सम्मानित भी हो जायेंगे आप।

-‎बात तो समूह में पुस्तकों के विमोचन की थी।

-‎सम्भव नहीं है।

-‎फिर अलग से देखेंगे।मेरे पैसे में कितनी प्रतियाँ…

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Added by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 12:40pm — 15 Comments

गजल(क्या क्या बदलोगे...)

22 22 22 22 22 22 22 2

क्या क्या बदलोगे बाबूजी, जान रहे सब ,बोलो तो

छोड़ो औरों की बातें अब खुद अपने को तोलो तो।1

बोल रहे सब बोल बढ़ाकर,लगता हो तुमको जो ऐसा

अपनी करनी का खाता अब,मत शरमाओ,खोलो तो।2



पहुँचा देते लोग कहाँ तक ,बजा-बजाकर ताली भी

जन-सेवा करते-करते अब ठौर मिला है, सो लो तो।3



रंज हुईं मजबूर हवाएँ रह-रह आज बताती हैं

धुलता दामन,दाग चढ़े हैं,और जहर मत घोलो तो।4



चिट्ठी आई है चंदू की,चाचा और भतीजों…

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Added by Manan Kumar singh on January 8, 2018 at 10:00am — 10 Comments

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