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‘मीलॉर्ड! इसने मुझे हमेशा गलत ढ़ंग से छुआ है,मेरी रजा के खिलाफ भी।’

‘और?’

‘मुझे नींद से भी जगाता रहा है।’

‘कब से?’

‘शुरू से ही।’

‘फिर भी?’

‘तबसे जब मैं कली हुआ करता था।’ फूल ने अपनी वेदना का इजहार किया।

जज ने अपने कोट में लगे फूल की तरफ देखा।वह अपनी जगह पर कायम था,शांतिपूर्वक।जज को तसल्ली हुई।

‘फिर आज क्या हुआ?’

‘आज तो कुछ नहीं हुआ,मीलॉर्ड! पर अब भी इसकी आदतें तब्दील नहीं हुईं।यह आज भी कलियों को परेशान करता है।फूलों की नींद हराम करता है।’

‘तो फिर आपकी फरियाद क्या है?वादी कौन है, आप?’

‘नहीं हुजूर।मैं तो आज का जगा हुआ ईमान हूँ।कल की चुप्पी पर मर्सिया पढ़ने का ख्वाहिशमंद हूँ,जहां आलम।’

‘वादी हैं हुजूर।हम वादी है।’ यह कहते हुए दस-बारह फूल अकस्मात् उठ खड़े हुए।अदालत में थोड़ी अफरातफरी का माहौल हो गया।जोर- जोर से कानाफूसी होने लगी।जज ने मेज पर हथौड़ा पटका।फिर जाकर शांति बहाल हुई।

फिर 'मुझे भी,मुझे भी......' की ध्वनि अदालत में गूँजने लगी।

अर्दली ने आवाज बुलंद की।’ भौंरा हाजिर हो।'

भिनभिनाता हुआ भौंरा पेश हुआ।उसे उसपर लगे आरोप की जानकारी दी गई।फिर जज ने सवाल किया

तो बताओ,तुमने इन सब के साथ इतनी ज्यादती क्यों की?’

‘..मौन...।और फिर फिर ....मौन।' जज भड़क गया

तुम जवाब क्यों नहीं देते?' उसने तर्जनी भौंरे की तानकर,हाथ हिलाते हुए पूछा।

न्यायपति! आपके हाथ हिलाकर गुस्सा होने से मुझे ज्ञात होता है कि आप मुझसे कुछ पूछना चाहते हैं।पर मैं सुनता नहीं।बोल सकता हूँ...गुन गुन गुन गुन.... जी बस।और आप कहें,तो कुछ कहूँ।जज ने इशारा किया।भ्रमर ने कहना शुरू किया--

मैं गाता हूँ,बस।ये फूल मेरे गीत के दीवाने हैं।मेरे गीत से इनकी बेचैनी शांत होती है।फिर शांति से बेचैन हो जाते हैं।फिर मुझे गाना पड़ता है।कभी इन्हें शांत करने के लिए,तो कभी इन्हें बेचैन करने के लिए।हाँ,दोनों ही दशाओं में मर्जी इनकी ही होती है।'

ऐसी बात है?' जज ने इशारे में सवाल किया।

जी।'

फिर ये कलियाँ?इनका क्या कसूर है,जो तुमने इन्हें परेशान किया?’ जज ने अदालत में फरियादी बन उपस्थित हुईं कलियों की तरफ उँगली घुमाकर भौंरे से पूछा।

मैंने किसी को परेशान नहीं किया,हुजूर।हाँ,इन्हें खिलने की जल्दी थी।और खिलने के लिए मेरे गीत जरूरी थे।मैंने गा दिए,बस।'

तो फिर यह फरियाद कैसी?’

कोई कुछ नहीं बोला।फूल,कलियाँ सभी मौन थे।कुछ जा भी चुके थे।जज भिन्नाया---

यह सब क्या हो रहा है आजकल?’

आजकल यही सब हो रहा है,मीलार्ड! नजर उठे न उठे,उँगलियाँ उठायी जा रही हैं।आजकल हर आदमी एक- दूसरे पर उँगलियाँ उठा रहा है।किसी ने आईना नहीं देखा,न्यायाधिपति।'

कमाल है।' जज दहाड़ा।

कुछ कमाल वगैरह नहीं है,हुजूर।' जज के कोट में टँगा गुलाब कहने लगा---

याद है ,मैंने आपसे इज्जतबख्शी की रजा जताई थी।फिर आपने मुझे सीने से लगा लिया था।अब दीगर बात है कि मुझे आजतक फुर्सत ही नहीं मिली।मैं तबसे यहाँ लटका हुआ हूँ।जज सहसा बीती बातों में खो गया।अतीत उसके मानस पटल पर उभरने लगा।फूल जज के सीने में चुभने लगा ।वह बड़बड़ाया--

-‘यह क्या हो रहा है आजकल?'

कभी का फूल, कभी काँटा, मीलार्ड!' गुलाब ने ठहाका लगाया।

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on October 4, 2022 at 5:06pm

लघुकथा आपको अच्छी लगी,अच्छा है। आ.समर जी,आपका शुक्रिया।नमन।

Comment by Samar kabeer on October 4, 2022 at 4:25pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, अच्छी लघुकथा लिखी आपने , बधाई स्वीकार करें.

Comment by Manan Kumar singh on October 3, 2022 at 5:42pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीय सुशील सरना जी। 

Comment by Sushil Sarna on October 3, 2022 at 4:42pm
वाह आदरणीय बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति है सर ।हार्दिक बधाई सर

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