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आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'
  • Male
  • Raipur, Chhattisgarh
  • India
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आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s Friends

  • Samar kabeer
  • डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव
  • गिरिराज भंडारी
  • मिथिलेश वामनकर
 

आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s Page

Latest Activity

डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव left a comment for आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'
"मित्र आपका ह्रदय से स्वागत है , सादर  ."
Oct 7, 2016
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव and आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' are now friends
Oct 7, 2016
Ravi Shukla commented on आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s blog post ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )
"आदरणीय आशीष जी बढि़या गजल हुई है बधाई ।   आदरणीय अशोक कुमार जी ने जिस मिसरे का जिक्र किया हैै उसके सानी में भी घूल उड़ने लगी होना चाहिये । देख लीजियेगा । सादर "
Oct 6, 2016
Ashok Kumar Raktale commented on आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s blog post ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )
"आदरणीय  आशीष सिंह  जी  सादर , बहुत  अच्छी  गजल  हुई  है. आदरणीय  गिरिराज जी  का  सुझाव  सही  लग  रहा है.  चौथे  शेर  में "पैर के धूल पर वक़्त मेहरबाँ," इस…"
Oct 6, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s blog post was featured

ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )

212  212  212   22ज़िन्दगी को मिरे रायगाँ करके,    चल दिये रंज को मेहमाँ करके,.बाँह के इस क़फ़स से उड़े, अब क्या?हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके,बेबसी आदमी की कहाँ ठहरे, रास्ते पर रहे आशियाँ करके,पैर के धूल पर वक़्त मेहरबाँ,धूल उड़ने लगे आँधियाँ करके,लज़्ज़तें कुछ नहीं, दर्द ओ आंसू,ये मिले फासले दरमियाँ करके,वक़्त यूँ ही गुज़रता रहा मेरा,एक पल को दुखद दास्ताँ करके ।रायगाँ- बरबाद ; रंज - दुख ; क़फ़स - क़ैद ;                 - आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'                 ~ मौलिक एवं अप्रकाशित ~See More
Oct 6, 2016
सुरेश कुमार 'कल्याण' commented on आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s blog post ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )
"आदरणीय आशीष जी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Oct 6, 2016

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s blog post ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )
"आदरनीय आशीष भाई , अच्छी गज़ल कही आपने दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ।सही शब्द - मेह्रबाँ  है , 212 में बांधा जाना चाहिये । देख लीजियेगा ।"
Oct 5, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' posted a blog post

ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )

212  212  212   22ज़िन्दगी को मिरे रायगाँ करके,    चल दिये रंज को मेहमाँ करके,.बाँह के इस क़फ़स से उड़े, अब क्या?हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके,बेबसी आदमी की कहाँ ठहरे, रास्ते पर रहे आशियाँ करके,पैर के धूल पर वक़्त मेहरबाँ,धूल उड़ने लगे आँधियाँ करके,लज़्ज़तें कुछ नहीं, दर्द ओ आंसू,ये मिले फासले दरमियाँ करके,वक़्त यूँ ही गुज़रता रहा मेरा,एक पल को दुखद दास्ताँ करके ।रायगाँ- बरबाद ; रंज - दुख ; क़फ़स - क़ैद ;                 - आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'                 ~ मौलिक एवं अप्रकाशित ~See More
Oct 4, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' commented on amita tiwari's blog post सीमा ने बलिदान क्यों माँगा
"आदरणीया अमिता तिवारी जी!!! बढ़िया  रचना है....बहुत बहुत बधाई आपको!! सादर!!!"
Oct 2, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post मेरे चेहरे पे कितने चेहरे हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय धर्मेन्द्र जी बढ़िया !!! बहुत बहुत बधाई आपको इस ग़ज़ल के लिए!!! सादर!!!"
Oct 2, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल -तब अलग थी, अब जवानी और है ( गिरिराज भंडारी )
"सफ़ल प्रयास है आ. श्री गिरिराज भंडारी जी!!! बधाई प्रेषित है!!!! सादर!!! बड़ा उम्दा शेर है ये!!! शक्ल में जिनकी कहानी और है क्या उन्होनें मन मे ठानी और है  "
Oct 2, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' commented on दिनेश कुमार's blog post ग़ज़ल -- हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए ( दिनेश कुमार 'दानिश' )
"आ. जनाब दिनेश कुमार 'दानिश' जी !!!बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है !!!सुन्दर प्रस्तुति के लिये दाद और मुबारक़बाद कबूल करें!!!मुझे ये सब शेर बड़े पसंद आये !!! सादर !!! ये क्या कि हम बँटते गए दैरो-हरम के नाम परजम्हूरियत जब हो, रेआया भी सयानी चाहिए उस…"
Sep 26, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' commented on Azeem Shaikh's blog post मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने
"आ. जनाब अज़िम शेख़ "हमदर्द" जी !!! सुन्दर प्रस्तुति के लिये दाद और मुबारक़बाद कबूल करें!!! मुझे ये सब शेर बड़े पसंद आये !!! काम थोडा कर लेते है लेकिन लोग सजा लेते है सहरे कितने मोहब्बत का पैगा़म सुनाना है मुझे देखिए तो ये लोग है बहरे…"
Sep 26, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' shared गिरिराज भंडारी's blog post on Facebook
Sep 26, 2016
आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल -चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है ( गिरिराज भंडारी )
"आ. श्री गिरिराज भंडारी जी.... एक और बेहद उम्दा ग़ज़ल आपके जानिब से !! वाह !!! वाह !!! वाह !!! बहुत अच्छी अदायगी के लिये आपको कोटिशः बधाईयां !!!"
Sep 26, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
रायपुर (छ. ग.)
Native Place
रायपुर

आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s Blog

ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )

212  212  212   22

ज़िन्दगी को मिरे रायगाँ करके,    

चल दिये रंज को मेहमाँ करके,.

बाँह के इस क़फ़स से उड़े, अब क्या?

हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके,

बेबसी आदमी की कहाँ ठहरे,

 रास्ते पर रहे आशियाँ करके,

पैर के धूल पर वक़्त मेहरबाँ,

धूल उड़ने लगे आँधियाँ करके,

लज़्ज़तें कुछ नहीं, दर्द ओ आंसू,

ये मिले फासले दरमियाँ करके,

वक़्त यूँ ही गुज़रता रहा…

Continue

Posted on October 2, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

नज़्म : अदाकार (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला')

किसी को हँसाये,किसी  को रुलाये,
कोई परेशां है,कोई हंसे कोई बिलखे,
कोई चुप- तो कोई चीखे,
उम्र के अलग अलग पड़ावों में,
अभिनय मिले नये-नये किरदारों में,
ज़िन्दगी तू मक़बूल अदाकार है,
कि क्या खूब अदायगी है तेरी...
सब कुछ बिल्कुल मौलिक लगे ।
और उस भगवान् का निर्देशन तो देखो !
कि हम जग के लोगों को सांसारिक लगे ।


आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'
मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 23, 2016 at 3:00pm

ग़ज़ल: इक नज़र देखा मुझे तो प्यार मुझसे कर गया,

2122. 2122. 2122. 212



इक नज़र देखा मुझे तो प्यार मुझसे कर गया,

देखकर सारे ज़माने की अदावत फिर गया,



टूटते हैं बेसबब जिस भी तरह पत्त्ती यहाँ,

वो नज़र से ख़ुद किसी के बेवजह ही गिर गया,



दर्द लेकर प्यार का ज़ख़्मी बना आशिक़ नया,

बन शराबी लड़खड़ाते उस तरफ़ से घर गया,



जानकर उसकी ख़ताओं की वजह,अहसास से,

आँख भरता हो दुखी का दिल मिरा बस भर गया,



लोग कहते थे उसे है साहसी कितना बड़ा,

प्यार के अंजाम के पहले निडर भी डर गया ।…



Continue

Posted on September 16, 2016 at 11:00pm — 10 Comments

एक नज़्म: सूनापन

सूनापन



एक ख़ला है, ख़ामोशी है,

जिधर देखो उदासी है,

समय सिफ़र हो गया,

आंसू निडर हो गए,

घेरे हैं लोग,पर कोई साथ नहीं,

सर पर किसी का हाथ नहीं,

शाम खाली गिलास सा,

टेबल पर औंधे मुंह पड़ा है,

मन में चिंता दीमक की तरह,

मन को खाये जा रही  है,

दिल की गली ऐसी सूनी है,

मानो दंगे के बाद कर्फ़्यू लगा हो,

शरीर सूखे पेड़ की तरह खड़ा तो है पर,

पीसा के मीनार सा, झुक सा गया है,

कब तक और कहाँ तक

इस सूनेपन, इस अकेलेपन का

बोझ…

Continue

Posted on September 1, 2016 at 6:30pm — 8 Comments

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At 9:22pm on October 7, 2016, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

मित्र आपका ह्रदय से स्वागत है , सादर  .

At 4:59pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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