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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan'
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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s Page

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur
Native Place
...
Profession
Poet
About me
A Poet.

सावण सूखो क्यूँ !

सावण सूखो क्यूँ !

इबकाळ रामजी न जाण के सूझी, क बरसण क दिनां मं च्यारूँ कान्या तावड़ की  बळबळती सिगड़ी सिलागायाँ बठ्यो है | जठे देखो बठे ई लोग-लुगावड़ियां में कि बाट देखता-देखता आकता होगा | खेतां मायलो बीज निपजणों भूलगो | तपत  तावड़ के मायनं टाबरां का पसीन स चिड़पड़ा होयोड़ा मूंडां न देखतां निगावां होठां प आयोड़ी सूखी फेफड़ी पर जाक थम ज्याव | पण कर तो के कर , सारो कुण् लगाव | सगळा एक-दूसर न  देख ले और फेरूँ आसमान कानी देखण लागज्या हैं |
एक कानी जांटी कि छाया म बठ्यो गण्डकङो जीब बारणै काड राखी है | गर्मी क मार ऊंकी  ल्हक-ल्हक डट ई कोन्या | 
रामजी सैँकी पत् राखण हाळो है, बं ई न याद करो., सगळा मिल रामजी न याद करण लागज्या है....
रामजी , गेर दे छाँट र |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र | 

तीतरपंखी बादळ आव |
बिन बरसे  पाछा जाव |
पीण न  पाणी कोनी |
तुरत तरस दिखलाव |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र |

ळियाँ काची कई  तोड़ली |
 मँहगाई है घणी खोड़ली |
पण राम-रुखाळा सबका |
तू निठुराई  कयां ओढ़ली |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र |
देखतां -देखतां छांट पड़ण लागज्या है, बो रामजी घणों दयालु है. 
(गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान')
मौलिक व अप्रकाशित

 

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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s Blog

ग़ज़ल..गले में झूलते बाँहों के नर्म हार की बात।

गले में झूलते बाँहों के नर्म हार की बात।

ये बात है मेरे मौला हसीं हिसार की बात।

रखोगे आग पे माखन तो वो पिघल ही जायेगा।

भला टली है कभी , है ये होनहार की बात।

ये इंकलाब की बातें है जोश वालों की।

कहीं पढ़ी थी जो मैंने वो बुर्दबार की बात।

कहूँ किसी से भला क्यों , छुपा के रखे हैं।

उन्हीं की आँखों के किस्से उन्ही के प्यार की बात।

बड़ी कठिन है ये शेरो-सुखन नवाजी जनाब।

बेइख़्तियार से हालात , क़ि बारदार की बात।

ख़याल ही जब हिन्दोस्ताँ का हो न तो…

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Posted on February 26, 2017 at 12:39am — 3 Comments

चाँद बोला चाँदनी, चौथा पहर होने को है.

चाँद बोला चाँदनी, चौथा पहर होने को है.

चल समेटें बिस्तरे वक्ते सहर होने को है.

चल यहाँ से दूर चलते हैं सनम माहे-जबीं.

इस जमीं पर अब न अपना तो गुजर होने को है.

है रिजर्वेशन अजल, हर सम्त जिसकी चाह है.

ऐसा लगता है कि किस्सा मुख़्तसर होने को है.

गर सियासत ने न समझा दर्द जनता का तो फिर.

हाथ में हर एक के तेगो-तबर होने को है.

जो निहायत ही मलाहत से फ़साहत जानता.

ना सराहत की उसे कोई कसर होने को…

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Posted on January 30, 2017 at 2:30pm — 9 Comments

आज तिरंगे को देखा तो जख़्म पुराने याद आये

आज तिरंगे को देखा तो जख़्म पुराने याद आये

जलियाँ वाला याद आया तोपों के निशाने याद आये

हर और तबाही बरपा थी जुल्म ढहाया जाता था

हुस्न के हाथों आशिक के ख़्वाब मिटाने याद आये

अपने  पीछे दौड़ रहे उस बालक को जब देखा तो 

तुम याद आये और तुम्हारे साथ ज़माने याद आये

फूटी कौड़ी भी ना दूँगा जब भी कोई कहता है

कौरव-पांडव वाले तब ही सब अफ़साने याद आये…

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Posted on December 25, 2016 at 12:00am — 3 Comments

तेरी याद आई, तो आती चली गई|

तेरी याद आई, तो आती चली गई|

गहरे तक दिल को जलाती चली गई||

.

कितने दिन हुए तुमसे मिले हुए|

याद तेरी हमको, याद दिलाती चली गई||

कौन मानेगा , हम तड़प रहे हैं यहाँ|

तुम वहां दूर, ललचाती चली गई||

.

मुझको यकीन है हम एक ही तो हैं|

यही सोच दूरी, मिटाती चली गई||

.

कितने मंजर नजर के सामने से गुजरे|

हर मंजर में तू, झलक दिखलाती चली गई||

.

लिखने को गज़ल लिख रहा हूँ मैं|

सच तो ये है कि तू लिखती…

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Posted on November 17, 2015 at 4:56pm — 1 Comment

Comment Wall (4 comments)

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At 7:51pm on March 15, 2017, Sushil Sarna said…

aadrneey Gangadyar jee aapke saath mitarta, mera soubhagya hai.thanks

At 11:25am on October 24, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

जनाब गंगा धर साहब आदाब, होसला अफज़ाइ का शुक्रिया

At 9:44pm on October 22, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

good night gangadhar bhai .....aap ka bahut bahut shukriya

At 5:58am on November 1, 2014,
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
said…

आदरणीय गंगा धर भाई जी , मेरी रचनायें आपको अच्छी लगीं जान कर बडी खुशी हुई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया । व्यस्तताओं के कारण देर से जवाब दे पाया , क्षमा चाहता हूँ ।

 
 
 

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