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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan'
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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s Page

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।"
May 21
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय | "
May 20

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरनीय बहुत बहुत शुक्रिया तस्दीक साहब की इस्स्लाह से  मैं भी सहमत हूँ "
May 19
Tasdiq Ahmed Khan commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"जनाब गंगा धर साहिब , ग़ज़ल की अच्छी कोशिश , मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं | sher4 में क़फ़िया  नहीं है , सानी मिसरा यूं कर सकते हैँ "चाँद में है कहाँ ज़िया भाई" |"
May 18
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' posted a blog post

ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)

लाज माँ बाप की बचा भाई.हो सके तो कमा के खा भाई.सौ में नम्बर मैं सौ भी ले लूँगा.नौकरी है कहाँ बता भाई.खून का रंग एक है लेकिन.राज जातों में बाँटता भाई.नूर भी आफ़ताब से लेता.चाँद में रोशनी कहाँ भाई.आज 'हिन्दोस्तान' को देखो.दीखता है खफा खफा भाई.(मौलिक व अप्रकाशित)See More
May 18
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' updated their profile photo
May 18
Samar kabeer commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.
"जनाब गंगाधर शर्मा जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करे । गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।"
Mar 6
Tasdiq Ahmed Khan commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.
"जनाब गंगाधर साहिब ,ग़ज़ल को होली के रंग में डुबोने का अच्छा प्रयास किया है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें। ग़ज़ल के हिसाब से अभी पहले मिसरे को देखें तो उस बह्र में कोई मिसरा नज़र नहीं आता है ,ग़ज़ल वक़्त चाहती है ,कोशिश कीजिये ,कामयाबी ज़रूर मिलेगी ।"
Mar 5
Mohammed Arif commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.
"आदरणीय गंगाधर जी आदाब,                      विविध विचारों की बानगी पेश करती बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र माक़ूल है । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । आपने ग़ज़ल की बह्र…"
Mar 5
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' posted a blog post

ग़ज़ल : लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.

लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.मुठ्ठी में होगी आपके बहार देखिये. चम्मचों से मात वो चक्की भी खा गई.आटा भी पाता  रहा संसार देखिये. अच्छे को अच्छा दिखता, दिखता बुरा बुरे को.आईने सा है मेरा किरदार देखिये. आज़ादी की कीमत आज़ाद ने चुकाई.लाखों हैं आज इसके हक़दार देखिये. पीतल भी आज देखो स्वर्ण हो गया.खोटा-खरा बताती झनकार देखिये. आसूदगी को मेरी कुछ और न समझ.गर्के-उल्फत है मेरा संसार देखिये. हल्ला मचा-मचा के मोहल्ला जगा दिया.मुर्गों की हो रही हो भरमार देखिये. ‘हिन्दोस्तां’ की रातें रोशन इन्हीं से…See More
Mar 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए
"★★☆★"
Mar 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : सरसों के फूल खिलते, धानी फसल में जैसे.
"हार्दिक बधाई, गुणी जनों की बात का संज्ञान लें ।"
Mar 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : कुत्तों से सिंह मात जो खाएँ तो क्या करें.
"हार्दिक बधाई.."
Mar 1
Samar kabeer commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए
""आँखों में आप इतना न काजल लगाइये तारीकियों को और न ऐसे बढ़ाइये हिन्दोस्तां की दुनिया तो रोशन इन्हीं से है वल्लाह इन अँधेरों से इसको बचाइये""
Feb 28
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : सरसों के फूल खिलते, धानी फसल में जैसे.
"आद0 गंगाधर जी सादर अभिवादन। अगर अरकान लिख दें तो उसके हिसाब से कुछ कहा जाए क्योंकि कई जगह लय भंग हो रही है। सादर"
Feb 27
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : कुत्तों से सिंह मात जो खाएँ तो क्या करें.
"आद0 गंगाधर जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल का प्रयास और आद0 समर साहब की इस्लाह के बाद और निखर गयी है। बहुत बहुत बधाई आपको। सादर"
Feb 27

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Male
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Jaipur
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...
Profession
Poet
About me
A Poet.

सावण सूखो क्यूँ !

सावण सूखो क्यूँ !

इबकाळ रामजी न जाण के सूझी, क बरसण क दिनां मं च्यारूँ कान्या तावड़ की  बळबळती सिगड़ी सिलागायाँ बठ्यो है | जठे देखो बठे ई लोग-लुगावड़ियां में कि बाट देखता-देखता आकता होगा | खेतां मायलो बीज निपजणों भूलगो | तपत  तावड़ के मायनं टाबरां का पसीन स चिड़पड़ा होयोड़ा मूंडां न देखतां निगावां होठां प आयोड़ी सूखी फेफड़ी पर जाक थम ज्याव | पण कर तो के कर , सारो कुण् लगाव | सगळा एक-दूसर न  देख ले और फेरूँ आसमान कानी देखण लागज्या हैं |
एक कानी जांटी कि छाया म बठ्यो गण्डकङो जीब बारणै काड राखी है | गर्मी क मार ऊंकी  ल्हक-ल्हक डट ई कोन्या | 
रामजी सैँकी पत् राखण हाळो है, बं ई न याद करो., सगळा मिल रामजी न याद करण लागज्या है....
रामजी , गेर दे छाँट र |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र | 

तीतरपंखी बादळ आव |
बिन बरसे  पाछा जाव |
पीण न  पाणी कोनी |
तुरत तरस दिखलाव |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र |

ळियाँ काची कई  तोड़ली |
 मँहगाई है घणी खोड़ली |
पण राम-रुखाळा सबका |
तू निठुराई  कयां ओढ़ली |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र |
देखतां -देखतां छांट पड़ण लागज्या है, बो रामजी घणों दयालु है. 
(गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान')
मौलिक व अप्रकाशित

 

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ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)

लाज माँ बाप की बचा भाई.
हो सके तो कमा के खा भाई.

सौ में नम्बर मैं सौ भी ले लूँगा.
नौकरी है कहाँ बता भाई.

खून का रंग एक है लेकिन.
राज जातों में बाँटता भाई.

नूर भी आफ़ताब से लेता.
चाँद में रोशनी कहाँ भाई.

आज 'हिन्दोस्तान' को देखो.
दीखता है खफा खफा भाई.
(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on May 18, 2018 at 4:27pm — 4 Comments

ग़ज़ल : लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.

लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.

मुठ्ठी में होगी आपके बहार देखिये.

 

चम्मचों से मात वो चक्की भी खा गई.

आटा भी पाता  रहा संसार देखिये.

 

अच्छे को अच्छा दिखता, दिखता बुरा बुरे को.

आईने सा है मेरा किरदार देखिये.

 

आज़ादी की कीमत आज़ाद ने चुकाई.

लाखों हैं आज इसके हक़दार देखिये.

 

पीतल भी आज देखो स्वर्ण हो गया.

खोटा-खरा बताती झनकार देखिये.

 

आसूदगी को मेरी कुछ और न समझ.

गर्के-उल्फत है…

Continue

Posted on March 5, 2018 at 5:35pm — 3 Comments

आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए

....................ऑंखें...........................

आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए.

तारीकियों को इनकी न इतना बढाइए.

हिन्दोस्तां की दुनिया रोशन इन्हीं से है.

अँधेरों से आज इसको वल्लाह बचाइए.

गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान'

अजमेर (राज.)

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on February 26, 2018 at 5:46pm — 2 Comments

ग़ज़ल : सरसों के फूल खिलते, धानी फसल में जैसे.

तेरी अधखुली सी आँखें, भंवरे कँवल में जैसे.

मदहोश सो रहे हों , अपने महल में जैसे.

 

चुनरी पे तेरी सलमा-सितारे हैं यूँ जड़े.

सरसों के फूल खिलते, धानी फसल में जैसे.

 

शर्मो-हया है इनकी वैसी ही बरक़रार.

देखी थी इनमें मैंने पहली-पहल में जैसे.

 

जुर्मे-गौकशी को कानूनी सरपनाही.

जी रहे हैं अब भी, दौरे-मुग़ल में जैसे.

 

वैसे ही होना होश जरूरी है जोश में.

है अक़ल का होना कारे-नक़ल में जैसे.

 

बहके बहर…

Continue

Posted on February 26, 2018 at 5:35pm — 3 Comments

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At 7:51pm on March 15, 2017, Sushil Sarna said…

aadrneey Gangadyar jee aapke saath mitarta, mera soubhagya hai.thanks

At 11:25am on October 24, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

जनाब गंगा धर साहब आदाब, होसला अफज़ाइ का शुक्रिया

At 9:44pm on October 22, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

good night gangadhar bhai .....aap ka bahut bahut shukriya

At 5:58am on November 1, 2014,
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
said…

आदरणीय गंगा धर भाई जी , मेरी रचनायें आपको अच्छी लगीं जान कर बडी खुशी हुई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया । व्यस्तताओं के कारण देर से जवाब दे पाया , क्षमा चाहता हूँ ।

 
 
 

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