For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Sushil Sarna's Blog (423)

जाने के बाद ... लघु रचना

जाने के बाद ... लघु रचना

गुजर गयी
एक आंधी
तुम्हारे स्पर्शों की
मेरी देह की खामोश राहों से
समेटती हूँ
आज तक
मोहब्बत की चादर पर
वो बिखरे हुए लम्हे
तुम्हारे
जाने के बाद

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 23, 2018 at 4:00pm — 3 Comments

कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

1

शुष्क काष्ठ

अग्नि से नेह

असंगत आलिंगन

परिणति

मूक अवशेष

................

2

त्वचा हीन

नग्न वृक्ष

अवसन्न खड़े

अकाल अंत की

आहटों के मध्य

.............................

3

ईश्वर

किसी देवता का

सर्जन नहीं

गढ़त है वो

इंसान की

..........................

4

करता रहा

प्रतीक्षा

एक शंख

नाद के लिए

चिर निद्रा में सोये

मरघट में…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 21, 2018 at 4:04pm — 6 Comments

बातें.....

बातें  ... 

लम्हों की आगोश में

नशीली सी रातों की

शीरीं से अल्फ़ाज़ों की

महकती बातें

बे-हिज़ाब रातों की

शोख़ी भरी शरारतों की

तन्हाई में भीगी

बरसाती बातें

आँखों के सागर में

जज़्बात की कश्ती में

यादों के साहिल पे

सुलगती बातें

जिस्म की पनाहों में

अनदेखी राहों में

दिल की गुफ़ाओं में

बहकती बातें

मोहब्बत के मौसम में

आँखों की शबनम में

ग़ज़ल की करवटों में

उफ़नती…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 21, 2018 at 12:54pm — 7 Comments

कुछ क्षणिकाएं(6) :

कुछ क्षणिकाएं(6) :

1

नैनों का मौन

आमंत्रण

परिणाम

अभ्यंतर में

हुआ आभूषित

मौन

समर्पण

...................

2

पलकों के घरौंदों में

स्वप्न बोलते हैं

नैन

प्रभात में

यथार्थ

तौलते हैं

........................

3

चलो

हो गई मुलाकात

स्पर्शों की आंधी में

बीत गयी रात

हो गई प्रभात

............................

4

प्रेम

मौन अभिव्यक्ति…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 18, 2018 at 4:30pm — 9 Comments

स्वप्न ....

स्वप्न ....
 
कल तक
चूजे से मेरे स्वप्न
रोशनी से डरते थे
हर वक्त
पलकों से…
Continue

Added by Sushil Sarna on June 18, 2018 at 3:30pm — 10 Comments

बरसात ....

बरसात ....

मेघों की गर्जना

चपला की अटखेलियां

फुहारों में भीगी तेज हवाएँ

वातायन के पटों का शोर

करवटों की रात

लो फिर आ गई

वस्ल की यादें लिए

फिर

आज बरसात

वो चेहरे से उसका

बूंदे हटाना

लटें सुलझाना

हौले से मुस्कुराना

सच कहाँ भूलेगी

वो शर्मीली सी बात

कि याद ले आई

फिर

आज बरसात

बारिश की बूंदों की

अजब सी अगन

स्पर्शों की आहट से

घबराया मन

न और हां की हो गयी…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 15, 2018 at 7:19pm — 10 Comments

कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

शर्मिन्दा हो गई

कुर्सी

बैठ गया

एक

नंगा इंसान

चुनावी साल में

वादों की गठरी लिए

.....................

शरमा गया

इंद्रधनुष

देखकर

धरा पर

इतनी

सफेदपोश

गिरगिटों को

..........................

सफ़ेद भिखारी

मांग रहे

भीख

छोटे भिखारी से

दिखा के

आश्वासनों की

चुपड़ी रोटी

.......................

आ गया

फिर से सावन

टरटराने लगे हैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 13, 2018 at 6:46pm — 5 Comments

उम्र के पन्नों पर ...

उम्र के पन्नों पर.... 

उम्र के पन्नों पर

कितनी दास्तानें उभर आयी हैं

पुरानी शराब सी ये दास्तानें

अजब सा नशा देती हैं

हर कतरा अश्क का

दास्ताने मोहब्बत में

इक मील का पत्थर

नज़र आता है

रुकते ही

वक़्त

ज़हन को

हिज़्र का वो लम्हा

नज़्र कर जाता है

जब

किसी अफ़साने ने

मंज़िल से पहले

किसी मोड़ पर

अलविदा कह दिया

नगमें

दर्द की झील में नहाने लगे

किसी के अक्स

आँखों के समंदर

सुखाने…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 8, 2018 at 6:24pm — 10 Comments

नमक सी जलन...

नमक सी जलन  ..... 

मत समेटो
हृदय में
शूल सी स्मृतियों को
ये
जब तक रहेंगी
अपने लावे से
विगत पलों को
सुलगाती रहेंगी
इसलिए
रोको मत
बह जाने दो
इन
नमक सी जलन देती
स्मृतियों की खारी ढेरियों को
आंसूओं के
प्रपात में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 25, 2018 at 8:37pm — 8 Comments

क्षणिकाएं :

क्षणिकाएं :

१.
तूफ़ान का अट्टहास
विनाश का आभास
काँपती रही
लौ दिए की
झील की लहरों पर
देर तक
आंधी के साथ हुए
जीवन मृत्यु के संघर्ष को
याद करके

२.
श्वास
नितांत अकेली
देह
चिता की सहेली
जीवन
अनबुझ पहेली

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 23, 2018 at 6:37pm — 10 Comments

स्मृति ...

स्मृति ...

ज़िंदगी
जब
ढलान पर होती है
उसके अंतस में
बुझे अलाव होते हैं
एक शाश्वत डर की आहट होती है
कुछ अनसुलझे सवाल होते हैं
कुछ अधूरे जवाब होते हैं

ज़िंदगी
धीरे -धीरे
बिना पड़ाव के पथ पर
अग्रसर होती है
आँखों में ओस होती है
प्रभात और साँझ एक हो जाते हैं
आहट यथार्थ हो जाती है
और एक श्वास
अंतिम हो जाती है
ज़िंदगी
स्मृति हो जाती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 21, 2018 at 5:45pm — 1 Comment

ज़रा से रूठ जाने पर ...

ज़रा से रूठ जाने पर ...





अजब

मिज़ाज है

नादाँ दिल का

तोड़ देता है

हर रस्म

उनके

ज़रा से रूठ जाने पर



जो लम्हे

मेरी हयात

बन कर आये थे

तारीकियों में

रूठ गए

हयात-ए-शरर के

ज़रा से रूठ जाने पर



क्या ख़बर

बाद मेरे फ़ना होने के

क्या गुजरी होगी

ख्वाब-ए-माहताब पर

यक़ीनन

मैंने ही नहीं

उनके लम्हों ने भी

पायी होगी सज़ा

ज़ार ज़ार रोने की

तन्हाईयों में

ख़ुद के ही

ज़रा से रूठ… Continue

Added by Sushil Sarna on May 17, 2018 at 1:01pm — No Comments

हरजाई ....

हरजाई ....

ये

वो गालियां हैं

जहां

अंधेरों में

सह्र होती है

उजाले उदास होते हैं

पलकों में

खारे मोती

होते हैं

बे-लिबास जिस्म,

लिपे -पुते चेहरे,

शायद

बाजार में

बिकने की

ये पहली जरूरत है

इक रोटी के लिए

सलवटों से खिलवाड़

रौंदे गए जिस्म की

बिलखती दास्ताँ हैं

भोर

एक कह्र ले कर आती है

पेट की लड़ाई

शुरू हो जाती है

दिन ढलने के साथ -साथ…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 16, 2018 at 11:30am — 2 Comments

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती

तुम किस धागे से

रिस्ते हुए ज़ख्मों पर

ख़्वाबों का

पैबंद लगाओगे

नहीं जानती

तुम किस चाशनी में डुबोकर

ज़ख़्मी लम्हों को

मेरी आँखों की हथेली पर

सजाओगे

नहीं जानती

तार तार हुए

ख़्वाबों के लिबास

कैसे बेशर्मी को

नज़रअंदाज़ कर पाएंगे

मगर

जानती हूँ

तुम फिर से

मेरे

संग-रेज़ों में तकसीम ख़्वाबों को

अपने शीरीं…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 14, 2018 at 5:30pm — 4 Comments

यौवन रुत ...

यौवन रुत ...

चक्षु आवरण पर

प्रत्यूष का सुवासित स्पर्श

यौवन रुत की प्रथम अंगड़ाई का

प्रतीक था

आँखों की स्मृति वीचियों पर

अखंडित लालसाओं की तैरती नावें

बहुबंध में सिमटी

अमर्यादित अभिलाषाओं की

प्रतीक थी

मौन अनुबंधों के अंतर्नाद

निष्पंद देह में

उन्माद क्षणों के चरम अनुभूति के

प्रतीक थे

मयंक मुख पे

केश मेघों की अठखेलियाँ

कामनाओं की अनंत तृषा की

प्रतीक…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 14, 2018 at 4:59pm — 12 Comments

डूब गए ...

डूब गए ...

तिमिर
गहराने लगा
एक ख़ामोशी
सांसें लेने लगी
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


तैर रहे थे
निष्पंद से
कुछ स्पर्श
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


सुलग रहे थे
कुछ अलाव
चाहतों की
अदृश्य मुंडेरों पर
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


डूब गए
कई जज़ीरे
ख़्वाबों के
खामोश से तूफ़ान में
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 9, 2018 at 3:21pm — 2 Comments

संग दीप के .....

संग दीप के  ... 

जलने दो

कुछ देर तो

जलने दो मुझे

मैं साक्षी हूँ

तम में विलीन होती

सिसकियों की

जो उभरी थी

अपने परायों के अंतर से

किसी की अंतिम

हिचकी पर

मैं साक्षी हूँ

उन मौन पलों की

जब एक तन ने

दुसरे तन को

छलनी किया था

मैं

बहुत जली थी उस रात

जब छलनी तन

मेरी तरह एकांत में

देर तक

जलता रहा

मैं साक्षी हूँ

उस व्यथा की

जो…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 9, 2018 at 2:30pm — 4 Comments

क्षणिकाएं : ....


क्षणिकाएं : ....

१,
मौत
देती है
ज़िंदगी
मौत को

२.
शूल के
प्रतिबन्ध से
पुष्प
वंचित रहा
स्पर्श से

३.

मयंक
आधी खाई रोटी से
लुभा रहा था
अन्धकार को

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 8, 2018 at 12:27pm — 2 Comments

सुलगन :....

सुलगन :

तुम
अपना तमाम धुआँ
मुझे सौंप
चले गए
मुझे अकेला छोड़

मेरी देह
तुम्हारे धुएँ की गर्मी से
देर तक
ऐसे सुलगती रही
जैसे
गरम सिगरेट की
झड़ी हुई राख से
सुलगती है
कोई
ऐश -ट्रे
देर तक

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 7, 2018 at 4:21pm — 8 Comments

अपने भीतर ...

अपने भीतर ...





थक गया था

बरसों तक

अपने भीतर के एकांत को

जीते जीते

इसीलिये

एक दिन

अपने भीतर की दीवार को तोड़

मैं अदृश्य अदेह में

चला गया



अब जब मैं

स्वयं से बहुत दूर जा चुका हूँ

भूल चुका हूँ

भीतर लौटने की

तमाम राहें

तो अब मुझे

उद्वेलित कर रही हैं

अपने भीतर की

तमाम सुखद स्मृतियाँ

जो कभी गुजारी थी

मैंने

अपने भीतर के एकांत में



अब

सम्पूर्ण सृष्टि की भटकन

मेरा… Continue

Added by Sushil Sarna on May 5, 2018 at 4:39pm — 6 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय सत्यनारायण भाई चित्र को परिभाषित करती इस सुंदर सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई।"
5 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी चित्र को परिभाषित करती इस सुंदर सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई। अंतिम छंद के लिए…"
7 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय तस्दीक भाईजी पारखी नजर रखते हुए चित्र को परिभाषित करती दोनों सार्थक रचना के लिए हार्दिक…"
15 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अजय भाई चित्र को परिभाषित करती इस  रचना के लिए हार्दिक बधाई।"
19 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी सुंदर शुरुवात , चित्र को परिभाषित करती इस सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई। पहली…"
31 minutes ago
sunanda jha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"हमेशा की तरह लाजवाब सृजन के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।"
32 minutes ago
sunanda jha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"उत्साहवर्धन के लिये हार्दिक आभार आदरणीय ।"
34 minutes ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर आभार आदरणीया "
42 minutes ago
sunanda jha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"वाहहहहह आदरणीय रक्ताले सर हमेशा की तरह लाजवाब सृजन ।हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर।"
43 minutes ago
sunanda jha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"वाहहहहहह आदरणीय सत्यनारायण साहब बहुत ही बेहतरीन तरीके से प्रदत्त चित्र को शब्दों में ढाला ।दिली…"
44 minutes ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया सुनंदा झा जी प्रदत्त चित्रनुकूल सुन्दर सृजन सादर बधाई प्रेषित है "
50 minutes ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 86 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश जी प्रदत्त चित्र को परिभाषित करते सुंदर एवं सार्थक चौपई छंद का सृजन हुआ है सादर बधाई…"
52 minutes ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service