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Sushil Sarna's Blog (896)

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस



बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।

कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।



घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।

जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।



जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।

घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।



बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।

छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम ।।



बाँछें खिलतीं मेज पर, जब भी  आता काम ।

बाबू भरता घूस से, अपने घर गोदाम ।।



खुलेआम अब घूस का,…

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Added by Sushil Sarna on February 18, 2026 at 8:00pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यार

प्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।

आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।

प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।

इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा  अनुराग ।।

प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।

प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।

निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध ।

इसके भावों में छुपे, प्रेम गीत के बंध ।।

प्यार रूह इसरार की, प्यार नहीं इंकार ।

गहरा होता प्यार में, प्यार भरा अभिसार…

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Added by Sushil Sarna on February 16, 2026 at 7:47pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 

अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।

मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।।

 

प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार ।

काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।।

 

अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद ।

शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।।

 

अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात ।

कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

बातें बीती रात की, कहते आए लाज ।

लाख छुपाया खुल गए, सुर्ख नयन से राज ।।

 

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 8, 2026 at 9:00pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिल

रात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।

फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।

उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान ।

सोच रहा वह  इश्क में, क्या पाया नादान ।।

आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।

नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार ।

जिस्मानी जन्नत मिली, दिल को मिला करार ।।

कैसी ख्वाहिश कर रहा  , पागल दिल नादान ।

आसमान सम चाँद पर, खो बैठा ईमान ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 4, 2026 at 8:30pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . .नैन

दोहा सप्तक. . . . नैन

नैन द्वन्द्व में नैन ही, गए नैन से हार ।

नैनों को मीठी लगे, नैनों से तकरार ।।

नैनों की तकरार है, बड़ा अजब आनन्द ।

हृदय पृष्ठ पर प्रेम के,  अंकित होते छन्द ।।

नैनों के संवाद की, होती मोहक नाद ।

नैन सुने बस नैन के, अनबोले संवाद ।।

नैनों की होती सदा, मौन सुरों में बात ।

नैनों की मनुहार में, बीते सारी रात ।।

बड़ा मनोरम नैन का, होता है संसार ।

नैनों के इसरार को, नैन करें स्वीकार ।।

नैन उदधि में प्रेम का, जब…

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Added by Sushil Sarna on February 3, 2026 at 8:02pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

मिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।

निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।

लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।

वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।

पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में  संबंध ।

आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।

वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।

संबंधों को लीलती , धन की झूठी शान ।।

रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।

अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 1, 2026 at 4:00pm — 2 Comments

कुंडलिया. . .बेटी

कुंडलिया. . . . बेटी

बेटी  से  बेटा   भला, कहने   की   है   बात ।
बेटा सुख का   सारथी, सुता   सहे  आघात ।।
सुता   सहे    आघात, पराई   हरदम   रहती ।
जीवन के वह दर्द, सदा ही चुप - चुप सहती ।।
जाने   कितने  रूप,सुता   यह   ओढ़े    लेटी ।
सृष्टि  सृजन  आधार, मगर  है   मानो   बेटी ।।

सुशील सरना / 20-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on January 20, 2026 at 2:21pm — 2 Comments

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर पर

दोहा एकादश   . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।

बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।

आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।

डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।

जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।

उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग ।।

किसी धर्म…

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Added by Sushil Sarna on January 14, 2026 at 3:03pm — 3 Comments

कुंडलिया. . . . .

कुंडलिया. . . .

किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।
आँखें   उसकी    वेदना, नित्य   करें    साकार ।।
नित्य  करें   साकार ,  दर्द  यह  कहा  न  जाता ।
उसे  भूख  का  दंश , सदा  ही   बड़ा   सताता ।।
पत्थर   पर  ही  पीठ , टिकाई   हरदम   इसने  ।
भूखी काली रात , भाग्य  में  लिख  दी  किसने ।।

सुशील सरना / 9-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on January 9, 2026 at 1:29pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोध

मानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।

सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।

बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।

बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।

हर लेता इंसान का, क्रोधी  सदा विवेक ।

मिटते  इसके ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।

क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम ।

घातक जिसके बाद में, अक्सर हों परिणाम ।।

पर्दे पड़ते अक्ल पर, जब  आता है क्रोध ।

दावानल में क्रोध की, बस लेता प्रतिशोध…

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Added by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 2:00pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . शृंगार

 

बात हुई कुछ इस तरह,  उनसे मेरी यार ।

सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।।

 

मौसम की मनुहार फिर, शीत हुई उद्दंड ।

मिलन ज्वाल के वेग में, ठिठुरन हुई प्रचंड ।

 

मौसम  आया शीत का, मचल उठे जज्बात ।

कैसे बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

स्पर्शों की आँधियाँ, उस पर शीत अलाव ।

काबू में कैसे रहे, मौन मिलन का भाव ।।

 

आँखों -आँखों में हुए, मधुर मिलन संवाद ।

संवादों के फिर किए , अधरों ने अनुवाद…

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Added by Sushil Sarna on November 16, 2025 at 7:30pm — 4 Comments

दोहा दशम्. . . निर्वाण

दोहा दशम्. . . . निर्वाण

कौन निभाता है भला, जीवन भर का साथ ।

अन्तिम घट पर छूटता, हर अपने का हाथ ।।

तन में चलती साँस का, मत करना विश्वास ।

साँसें तन की जिंदगी, तन साँसों का दास  ।।

साँसों की यह डुगडुगी, बजती है दिन-रात ।

क्या जाने कब नाद यह, दे जीवन को मात ।।

मौन देह से सूक्ष्म का, जब होता निर्वाण ।

अनुत्तरित है आज तक , कहाँ गए वह प्राण ।।

तोड़ देह प्राचीर को, सूक्ष्म चला उस पार ।

मौन देह के साथ तो, बस काँधे थे चार…

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Added by Sushil Sarna on November 5, 2025 at 9:00pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . सागर प्रेम

दोहा सप्तक. . . सागर प्रेम

जाने कितनी वेदना, बिखरी सागर तीर ।

पीते - पीते हो गया, खारा उसका नीर ।।

लहरों से गीले सदा, रहते सागर तीर ।

बनकर कितने ही मिटे, यहाँ स्वप्न प्राचीर ।।

बनकर मिटते नित्य ही, कसमों भरे निशान ।

लहरों ने दम तोड़ते, देखे हैं अरमान ।।

दो दिल डूबे इस तरह , भूले हर तूफान ।

व्याप्त शोर में सिंधु के, प्रखर हुए अरमान ।।

खारे सागर में उठे, मीठी स्वप्न हिलोर ।

प्रेमी देखें साँझ में, अरमानों की भोर ।।

लहर - लहर…

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Added by Sushil Sarna on October 31, 2025 at 8:45pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . .दीपावली

 

दीप जले हर द्वार पर, जग में हो उजियार  ।

आपस के सद्भाव से, रोशन हो संसार ।।

 

एक दीप इस द्वार पर,एक पास के द्वार ।

आपस के यह प्रेम ही, हरता हर अँधियार ।।

 

जले दीप से दीप तो, प्रेम बढ़े हर द्वार  ।

भेद भाव सब दूर हों , खुशियाँ मिलें अपार ।।

 

माँ लक्ष्मी का कीजिए, पूजन संग गणेश ।

सुख समृद्धि बढ़ती सदा, मिटते सभी कलेश ।

 

लाल चुनरिया पहन कर, मैया आई द्वार ।

पूजित कर हर्षित हुआ, पूरा घर परिवार…

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Added by Sushil Sarna on October 20, 2025 at 12:30pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .इसरार

दोहा पंचक. . . .  इसरार

लब से लब का फासला, दिल को नहीं कबूल ।

उल्फत में चलते नहीं, अश्कों भरे उसूल ।।

रुखसारों पर रह गए, कुछ ऐसे अल्फाज ।

तारीकी के खुल गए, वस्ल भरे सब राज ।।

जुल्फों की चिलमन हटी ,हया हुई मजबूर ।

तारीकी में लम्स का, बढ़ता रहा सुरूर ।।

ख्वाब हकीकत से लगे, बहका दिल नादान ।

बढ़ी करीबी इस कदर, मचल उठे अरमान  ।।

खामोशी दुश्मन बनी , टूटे सब इंकार ।

दिल ने कुबूल कर लिए, दिल के सब इसरार ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on September 15, 2025 at 8:57pm — 2 Comments

दोहा दशम्. . . . . गुरु

दोहा दशम्. . . . गुरु

शिक्षक शिल्पी आज को, देता नव आकार ।

नव युग के हर स्वप्न को, करता वह साकार ।।

बिना स्वार्थ के बाँटता, शिक्षक अपना ज्ञान ।

गढ़े ज्ञान से वह सदा, एक सभ्य  इंसान ।।

गुरुवर  अपने  ज्ञान से , करते अमर प्रकाश ।

राह दिखाते सत्य की, करते तम का नाश ।।

शिक्षक करता ज्ञान से , शिष्यों का उद्धार ।

लक्ष्य ज्ञान से सींचता,  उनका नव संसार ।।

गुरु बिन संभव ही नहीं, जीवन का उत्थान ।

पैनी छेनी ज्ञान की, गढ़ती नव पहचान…

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Added by Sushil Sarna on September 5, 2025 at 3:00pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . नजर

नजरें मंडी हो गईं, नजर हुई  लाचार ।

नजरों में ही बिक गया, एक जिस्म सौ बार ।।

 

नजरों से छुपता नहीं,कभी नजर का प्यार ।

उठी नजर इंकार तो, झुकी नजर  इकरार ।।

 

नजरें समझें जो हुए, नजरों से संवाद ।

बिन बोले ही बोलते , नजरों के उन्माद ।।

 

नजरों को झूठी लगे, नजरों की मनुहार ।

कामुकता से है भरा, नजरों का संसार ।

 

नजरें ही करने लगी, नजरों से व्यापार ।

नजर पाश में हो गई, नजर बड़ी लाचार  ।।

 

नजरों…

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Added by Sushil Sarna on August 31, 2025 at 3:00pm — 7 Comments

कुंडलिया. . . . .

कुंडलिया. . .

चमकी चाँदी  केश  में, कहे उम्र  का खेल ।
स्याह केश  लौटें  नहीं, खूब   लगाओ  तेल ।
खूब  लगाओ  तेल , वक्त  कब  लौटे  बीता ।
भला उम्र की दौड़ , कौन है आखिर जीता ।
चौंकी बढ़ती  उम्र , जरा जो बिजली दमकी ।
व्यग्र  करें  वो  केश , जहाँ पर चाँदी चमकी ।

सुशील सरना / 22-8-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 22, 2025 at 1:30pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . . . विविध

मंजिल हर सोपान की, केवल है  अवसान ।

मुश्किल है पहचानना, जीवन के सोपान ।।

 

छोटी-छोटी बात पर, होने लगे तलाक ।

पल में टूटें आजकल, रिश्ते सारे पाक ।।

 

छोटे से परिवार में, सीमित  है औलाद ।

उस पर भी होते नहीं, आपस में संवाद ।।

 

पति-पत्नी के प्रेम का, अजब हुआ है हाल ।

प्रेम जाल में गैर के, दोनों हुए हलाल ।।

 

कत्ल प्रेम में आजकल, हर दिन  होते आम ।

नाता जोड़ें गैर से, फिर होते बदनाम ।।

 

धोखा…

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Added by Sushil Sarna on August 19, 2025 at 3:00pm — 6 Comments

कुंडलिया. . . .

 

धोते -धोते पाप को, थकी गंग की धार ।
कैसे होगा जीव का, इस जग में उद्धार ।
इस जग में उद्धार , धर्म से रिश्ते झूठे ।
मन में भोग-विलास, आचरण दिखें अनूठे ।
कर्मों के परिणाम , देख फिर हरदम रोते ।
करें न मन को शुद्ध , गंग में बस तन धोते ।

सुशील सरना / 10-8-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 10, 2025 at 7:00pm — 4 Comments

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