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आँखों के सावन में ......

आँखों के सावन में ......

ओ ! निर्दयी घन
जाने कितनी
अक्षत स्मृतियों को
अपनी बूँदों में समेटे
तुम फिर चले आये
मेरे हृदय के उपवन में
शूल बनकर

क्यों
मेरे घावों की देहरी को
अपनी बूँदों की आहटों से
मरहम लगाने का प्रयास करते हो

बहुत रिस्ते हैं
ये
जब -जब बरसात होती है
बहुत याद आते हैं
मेरे भीगे बदन से
बातें करते
उसके वो मौन स्पर्श

वो छत की मुंडेर से
उसकी आँखों का
बरसात में भीगते हुए
मेरा पीछा करना

उफ्फ
कितना अंगार भरा था वो लम्हा
जब उसने बरसात में
मेरी जुल्फों से गिरी बूँद को
अपनी हथेली में समेटा था
मेरी ठोड़ी पर रुकी बूँद को
अपनी उंगली की पोर पर लपेटा था
बेशर्म ने
बड़ी निर्लज्जता से
मेरे लबों को छेड़ा था

वो पेड़
वो लैंप पोस्ट
वो भीगते हुए लम्हों में
चाय की चुसकियाँ
आज भी
उन भीगते हुए तन्हा लम्हों में
बादलों के बिस्तर पर
हसीन स्मृतियाँ
अंगड़ाईयाँ लेती हैं

ओ! निष्ठुर बादल
जा लौट जा
वहीं उस खारे सागर के पास
और डुबो दे इन यादों को
कहीं गहरे सागर में
फिर भी अगर तू आता है
तो आ
मगर
उन यादों को अपनी बूँदों में
समेट कर मत ला
वरना
मेरी आँखों के सावन से
तू शर्मिंदा हो जाएगा
तेरी लाखों बूँदों पर
मेरी एक बूँद
भारी हो जाएगी
मेरी आँखों के सावन में
तेरा सावन डूब जाएगा 

तेरा सावन
डू........ ब .... जा...... ए....... गा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 657

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Comment by Sushil Sarna on August 11, 2020 at 6:03pm

आदरणीय    लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर ठीक न होने के कारण प्रत्युतर में विलम्ब हुआ, दिल से क्षमा चाहूँगा।

Comment by Sushil Sarna on August 11, 2020 at 6:02pm

आदरणीय    अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर ठीक न होने के कारण प्रत्युतर में विलम्ब हुआ, दिल से क्षमा चाहूँगा।

Comment by Sushil Sarna on August 11, 2020 at 6:02pm

आदरणीय   Samar kabeerजी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर ठीक न होने के कारण प्रत्युतर में विलम्ब हुआ, दिल से क्षमा चाहूँगा।

Comment by Sushil Sarna on August 11, 2020 at 6:01pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। आदरणीय कम्प्यूटर ठीक न होने के कारण प्रत्युतर में विलम्ब हुआ, दिल से क्षमा चाहूँगा।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2020 at 5:32am

आ. भाई सुशील जी सादर अभिवादन। इस भावपूर्ण रचना पर हार्दिक बधाई ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 1, 2020 at 4:28pm

आदरणीय सुशील सरना जी, आदाब।

अहसास को लफ़्ज़ों में पिरो कर इस लाजवाब रचना के सृजन के लिए बहुत बहुत दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by Samar kabeer on June 28, 2020 at 4:47pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें l

Comment by नाथ सोनांचली on June 28, 2020 at 3:23pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। हर बार की तरह एक भावपूर्ण रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

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