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AMAN SINHA
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AMAN SINHA posted a blog post

ज़िंदा हूँ अब तक मरा नहीं

ज़िंदा हूँ अब तक मरा नहीं, चिता पर अब तक चढ़ा नहींसाँसे जब तक मेरी चलती है, तब तक जड़ मैं हुआ नहींजो कहते थे हम रोएंगे, कब तक मेरे ग़म को ढोएंगे?पहले पंक्ति में खड़े है, जो कहते है कैसे सोएँगे? मैं धूल नहीं उड़ जाऊंगा, धुआँ नहीं गुम हो जाऊँगाहर दिल में मेरी पहूंच बसी, मर के भी याद मैं आऊँगाकैसा होता है मर जाना, एक पल में सबको तरसानामूँह ढाके शय्या पर लेटा, मैं तकता हूँ सबका रोना साँसों को रोके रक्खा है, कफन भी ओढ़े रक्खा हैक्या हाल है मेरे अपनों का, मैंने देख सभी को रक्खा हैकुछ मूँह छुपाए खड़े रहे, …See More
yesterday
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post लडकपन
"आदरणीय समर कबीर साहब,  आपकी टिप्पणी के लिये तो मैं तरस गया था। जितने प्रेम से आप समझाते है वैसा कोई और नहीं समझाता।  मैं अवश्य हीं आप सभी गुरुजनो के सुझाव पर ध्यान दूँगा और सही-सही लिखने का प्रयास करुंगा।  धन्यवाद। "
Sep 21
Samar kabeer commented on AMAN SINHA's blog post लडकपन
"जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें  I  जनाब अशोक रक्ताले जी की बैटन पर ध्यान अवश्य दें I "
Sep 21
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post लडकपन
"आदरणीय अशोक साहब, सुझाव देने के लिए आपका बहुत धन्यवाद| मैं आपके सुझाव को ध्यान मे रखूँगा| सादर|"
Sep 20
Ashok Kumar Raktale commented on AMAN SINHA's blog post लडकपन
"आदरणीय अमन सिन्हा जी, सुंदर प्रवाहमय काव्य रचना की है आपने. बचपन का साथी, जीवन-साथी भी बने यह सौभाग्य की ही बात होती है. किन्तु सब मनचाहा हो ये कहाँ संभव है. रचना शिल्प की बात करें तो तुकांतता पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इससे रचना सौन्दर्य में कई गुना…"
Sep 20
AMAN SINHA posted a blog post

लडकपन

पहली बार उसको मैंने, उसके आँगन में देखा था उसकी गहरी सी आँखों में, अपने जीवन को देखा थामैं तब था चौदह का, वो बारह की रही होगी खेल खेल में हम दोनों ने, दिल की बात कही होगी  समझ नहीं थी हमें प्यार की, बस मन की पुकार सुनी बचपन के घरौंदे ने फिर, अमिट प्रेम की डोर बुनी उसे देखकर लगता था जैसे, बस ये जीवन थम जाए बस उसकी भोली सूरत पर, नज़रें मेरी ठहर जाए  कई और थे उसके साथी, पर उसने बस मुझको देखा उसके मन से मेरे मन तक, थी कोई एक अंजानी रेखा खेल खेल में हाथ पकड़ कर, फेरे कितनी बार…See More
Sep 19
Shyam Narain Verma commented on AMAN SINHA's blog post कितना कठिन था
"नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर और ज्ञान वर्धक प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Sep 12
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कुछ ढंग का लिख ना पाओगे

जब तक तुमने खोया कुछ ना, दर्द समझ ना पाओगे चाहे कलम चला लो जितना, कुछ ढंग का लिख ना पाओगे जो तुम्हारा हृदय ना जाने, कुछ खोने का दर्द है क्या पाने का सुकून क्या है, और ना पाने का डर है क्या कैसे पिरोओगे शब्दों में तुम,  उन भावों को और आंहों को जो तुमने ना महसूस किया हो, जीवन की असीम व्यथाओं को जब तक अश्क को चखा ना तुमने, स्वाद भला क्या जानोगे सुख और दु:ख में फर्क है कैसा, कैसे तुम पहचानोगे कैसे लिखोगे श्रुंगार का रस तुम, जो प्रेम ना दिल में बसता हो प्रीत के गीत लिखोगे कैसे, जब सौन्दर्य तुम्हें…See More
Sep 12
AMAN SINHA commented on Manan Kumar singh's blog post दिन ढले,रातें गईं....(गजल)
"वाह, लाजवाब।"
Sep 11
AMAN SINHA posted a blog post

कितना कठिन था

कितना कठिन था बचपन में गिनती पूरी रट जाना अंकों के पहाड़ो को अटके बिन पूरा कह पाना जोड़, घटाव, गुणा भाग के भँवर में  जैसे बह जानाकिसी गहरे सागर के चक्रवात में फँस कर रह जाना बंद कोष्ठकों के अंदर खुदको जकड़ा सा पाना चिन्हों और संकेतों के भूल-भुलैया में खो जाना वेग, दूरी, समय, आकार, जाने कितने आयाम रहे रावण के दस सिर के जैसे इसके दस विभाग रहे  मूलधन और ब्याज दर में ना जाने कैसा रिश्ता था क्षेत्रमिति और त्रिकोणमिती में अपना हाल तो खस्ता था जैसे जैसे कक्षा लाँघें इसका कद भी बढ़ता जाता नए नए सवालों में…See More
Sep 5
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हिंदी क्या है?

हिंदी क्या है?बस एक लिपि?नहींबस एक भाषा?नहींबस एक अनुभव है?नहींहिंदी आत्मा है,सम्मान है, स्वाभिमान हैभारत की पहचान है हिंदी क्या है?बस एक बोली?नहींबस एक संवाद का माध्यम?नहींबस एक भाव?नहींहिंदी जान है, गुमान है,आर्याव्रत का अभिमान है हिंदी क्या है?एक रास्ता हैजिसपर चलकरहम खुदो को पहचानते हैंएक लक्ष्य हैजो हमारा व्यक्तित्व निखारती है हमारा रोना भी हिंदी है,और हँसना भी हिंदी हीं हैये हमेंजितना समझ मे आती हैहमेंउतना शहनशील बनाती है क्या कोई ऐसा शब्दइस संसार में है?जिसे हिंदी में लिखाया उसका…See More
Aug 31
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कुछ क्षण हीं शेष है अब तो

कुछ क्षण हीं शेष है अब तो, मिल जाओ तुम तो अच्छा है कैसे मैं समझाऊँ तुमको, जीवन का धागा कच्चा है साँस में आस  जगी है अब भी, तुम मुझसे मिलने आओगे आँखें बंद होने से पहले, आँखों की प्यास बुझाओगे  तुम बिन मेरा जीवन सूना, सूना है मन का हर कोना मन की व्यथा कम हो कैसे, साथ मेरे अगर तुम हो ना मैं तो तेरा हो ना पाया, ना तुम मेरे हो पाए मैं ना खुल के रो पाया कभी, ना तुम खुल के हँस पाए                 तन सोया है मरण शय्या पर, पर मन चौखट पर जा बैठा आहट तेरी छुट ना जाए, द्वार पर कान लगा बैठा आ जाओ के अब…See More
Aug 29
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अंतिम पाति

प्रथम प्रणाम उन मात-पिता को, जिन्होंने मुझको जन्म दिया शीर्ष प्रणाम उन गुरुजनों को, ज्ञान का जिन्होंने आशीष दिया फिर प्रणाम उन पूर्वजों को, मैं जिनका वंशज बनकर जन्मा शेष प्रणाम उन मित्रजनों को, जिनसे है मुझको प्रेम घना मैं न भुला उन बहनो को, राखी जिसने बांधी थी जिसकी सदा रक्षा करने की, मैंने कसमें खाई थी छोटे-बड़े सब भाई मे,रे हृदय में सदा हीं बसते है         मुझसे करते प्रेम बहुत वो, पलकों पर मुझको रखते है पाती मेरी सब तक पहुंचे, सबको स्मरण ये हो जाए सबसे मेरा है नाता गहरा, कोई ना विस्मित होने…See More
Aug 22
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एक जनम मुझे और मिले

एक जनम मुझे और मिले, मां, मैं देश की सेवा कर पाऊं दूध का ऋण उतारा अब तक, मिट्टी का ऋण भी चुका पाऊं  मुझको तुम बांधे ना रखना, अपनी ममता के बंधन में मैं उसका भी हिस्सा हूँ मां, तुमने है जन्म लिया जिसमे   शादी बच्चे घर संसार, ये सब मेरे पग को बांधे है लेकिन मुझसे मिट्टी मेरी, मां, बस एक बलिदान ही मांगे है  सब हीं आंचल मे छुपे रहे तो, देश को कौन संंभालेगा सीमा पर शत्रु सेना से, फिर कौन कहो लोहा लेगा  तुमने दुध पिलाया मुझको, तुमने हीं चलना सिखलाया है देश प्रेम है सबसे पहले, मां, ये तुमने ही पाठ…See More
Aug 15
AMAN SINHA posted a blog post

मैं ऐसा हीं हूँ

गुमसुम सा रहता हूँ, चुप-चुप सा रहता हूँ लोग मेरी चुप्पी को, मेरा गुरूर समझते है भीड़ में भी मैं, तन्हा सा रहता हूँ मेरे अकेलेपन को देख, मुझे मगरूर समझते हैं         अपने-पराये में, मैं घुल नहीं सकता मैं दाग हूँ ज़िद्दी बस, धूल नहीं सकता         मैं शांत जल सा हूँ, बड़े राज़ गहरे है बहुरूपिये यहाँ हैं सब, बडे  मासूम चेहरे है         झूठी हंसी हँसना,आता नहीं मुझे आँसू कभी निकले, परवाह नहीं मुझे कोई कहेगा क्या, ये सोचना है क्युं फिजूल बातों से, भला डरूँ मैं क्युं ख़ुशामदी करना, आदत नहीं…See More
Aug 10
AMAN SINHA posted a blog post

बस मेरा अधिकार है

ना राधा सी उदासी हूँ मैं, ना मीरा सी  प्यासी हूँ मैं रुक्मणी हूँ अपने श्याम की, मैं हीं उसकी अधिकारी हूँ ना राधा सी रास रचाऊँ ना, मीरा सा विष पी पाऊँमैं अपने गिरधर को निशदिन, बस अपने आलिंगन मे पाऊँक्यूँ जानु मैं दर्द विरह का, क्यों काँटों से आंचल उलझाऊँ मैं तो बस अपने मधुसूदन के, मधूर प्रेम में गोते खाऊँक्यूँ ना उसको वश में कर लूँ, स्नेह सदा अधरों पर धर लूँ अपने प्रेम के करागृह में, मैं अपने कान्हा को रख लूँ क्यों अपना घरबार त्याग कर, मैं अपना संसार त्यागकर फिरती रहूँ घने वनों में, मोह माया…See More
Aug 1

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ज़िंदा हूँ अब तक मरा नहीं

ज़िंदा हूँ अब तक मरा नहीं, चिता पर अब तक चढ़ा नहीं

साँसे जब तक मेरी चलती है, तब तक जड़ मैं हुआ नहीं

जो कहते थे हम रोएंगे, कब तक मेरे ग़म को ढोएंगे?

पहले पंक्ति में खड़े है, जो कहते है कैसे सोएँगे?

 

मैं धूल नहीं उड़ जाऊंगा, धुआँ नहीं गुम हो जाऊँगा

हर दिल में मेरी पहूंच बसी, मर के भी याद मैं आऊँगा

कैसा होता है मर जाना, एक पल में सबको तरसाना

मूँह ढाके शय्या पर लेटा, मैं तकता हूँ सबका रोना

 

साँसों को रोके रक्खा है, कफन भी…

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Posted on September 26, 2022 at 2:00pm

लडकपन

पहली बार उसको मैंने, उसके आँगन में देखा था 

उसकी गहरी सी आँखों में, अपने जीवन को देखा था

मैं तब था चौदह का, वो बारह की रही होगी 

खेल खेल में हम दोनों ने, दिल की बात कही होगी 

 

समझ नहीं थी हमें प्यार की, बस मन की पुकार सुनी 

बचपन के घरौंदे ने फिर, अमिट प्रेम की डोर बुनी 

उसे देखकर लगता था जैसे, बस ये जीवन थम…

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Posted on September 19, 2022 at 2:51pm — 4 Comments

कुछ ढंग का लिख ना पाओगे

जब तक तुमने खोया कुछ ना, दर्द समझ ना पाओगे 

चाहे कलम चला लो जितना, कुछ ढंग का लिख ना पाओगे 

जो तुम्हारा हृदय ना जाने, कुछ खोने का दर्द है क्या 

पाने का सुकून क्या है, और ना पाने का डर है क्या 

कैसे पिरोओगे शब्दों में तुम,  उन भावों को और आंहों को 

जो तुमने ना महसूस किया हो, जीवन की असीम व्यथाओं को 

जब तक अश्क को चखा ना तुमने, स्वाद भला क्या…

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Posted on September 12, 2022 at 2:09pm

कितना कठिन था

कितना कठिन था बचपन में गिनती पूरी रट जाना 

अंकों के पहाड़ो को अटके बिन पूरा कह पाना 

जोड़, घटाव, गुणा भाग के भँवर में  जैसे बह जाना

किसी गहरे सागर के चक्रवात में फँस कर रह जाना

 

बंद कोष्ठकों के अंदर खुदको जकड़ा सा पाना 

चिन्हों और संकेतों के भूल-भुलैया में खो जाना 

वेग, दूरी, समय, आकार, जाने कितने आयाम रहे 

रावण के दस सिर के जैसे इसके दस विभाग रहे 

 

मूलधन और ब्याज दर में ना जाने कैसा रिश्ता था 

क्षेत्रमिति और…

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Posted on September 5, 2022 at 2:58pm — 1 Comment

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