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AMAN SINHA
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  • अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी
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PHOOL SINGH commented on AMAN SINHA's blog post वक़्त को भी चाहिए वक़्त
"बहुत बढ़िया महोदय "
Jan 27
AMAN SINHA posted a blog post

वक़्त को भी चाहिए वक़्त

वक़्त को भी चाहिए वक़्त, घाव भरने के लिएज़ख्म कितने है लगे, हिसाब करने के लिएबस दवाओं से हमेशा, बात बनती है नहींएक दुआ भी चाहिए, असर दिखाने के लिएखींच लेता हैं समंदर, लहरों को आगोश मेंसागर तो होना चाहिए, सैलाब लाने के लिएपानी में डूबा हुआ, लोहा कभी सड़ता नहींबस हवा हीं चाहिए, उसे जंग खाने के लिए खो देते है शान भी, तलवार म्यान में रखेदुश्मन तो होना चाहिए, इंतकाम के लिएबर्फ जम जाते है, वीरों के भुजाओं परआग होनी चाहिए, जंग लड़ने के लिएबिन जले भट्ठी में सोना, कुंदन कभी बनता नहीफौलाद को भी तपना पडा…See More
Jan 23
AMAN SINHA posted a blog post

दासतां दिल की

कभी मैं दासतां दिल की, नहीं खुल के बताता हूँकई हैं छंद होंठो पर, ना उनको गुनगुनाता हूँअभी तो पाया था मैंने, सुकून अपने तरानों सेउसे तुम भी समझ जाओ, चलो मैं आजमाता हूँ जो लिखता हूँ जो पढ़ता, हूँ वही बस याद रहता हैबस कागज कलम हीं है, जो मेरे पास रहता हैभरोसा बस मुझे मेरी, इन चलती उँगलियों पर हैज़हन जो सोच लेता है, कलम वो छाप देता है भले दो शब्द हीं लिक्खु, पर उसके मायने तो होसजाने को मेरे घर में , कोई एक आईना तो होभला करना है क्या मुझको, बताओं शीश महलो सेसुकूं से छिपा लूँ सिर मैं अपना ऐसा कोई एक…See More
Jan 16
AMAN SINHA posted a blog post

अपनो को खो देने का ग़म - २६/११ की याद में

अपनों को खो देना का ग़म, रह रह कर हमें सताएगाचाहे मरहम लगा लो जितना, ये घाव ना भरने पाएगाकैसे हम भुला दे उनको, जो अपने संग हीं  बैठे थेरिश्ता नहीं था उनसे फिर भी, अपनो से हीं लगते थे कैसे हम अब याद करे ना, उन हँसते-मुस्काते चेहरों कोएक पल में हीं जो तोड़ निकल गए, अपने सांस के पहरों कोहम थे,  संग थे ख्वाब हमारे, बाकी सब दुनियादारी थीलेकिन उस दुनिया में तो, उन की भी हिस्सेदारी थी चहल पहल थी वहाँ हमेशा मदहोशी का आलम थालेकिन घात लगाकर बैठा एक आतंकी अंजान भी थासब थे खोए अपनी धुन में, नज़र सभी की अपनो…See More
Jan 10
आचार्य शीलक राम commented on AMAN SINHA's blog post हम मिलें या ना मिलें
"बढिया"
Dec 29, 2022
AMAN SINHA posted a blog post

उपकार

तेरे उपकार का ये ऋण, भला कैसे चुकाऊंगा? दबा हूँ बोझ में इतना, खड़ा अब हो ना पाऊँगा मेरी पूंजी है ये जीवन, जो तुम चाहो तो बस ले लो सिवा इसके तुम्हें अर्पण, मैं कुछ भी कर ना पाऊँगा          दिया था हाथ जब तुमने, मैं तब डूबता हीं था सम्हाला था मुझे तुमने, के जब मैं टूटता हीं था मैं भटका सा मुसाफिर था, राह तू ने था दिखलाया गलत था मेरा हर रस्ता, सही तूने बताया था              मैं खुद से चल नहीं पाता, जो तेरा हाथ ना होता बिखर जाता मैं यूं कबका, जो तेरा साथ ना होता खड़ा हूँ आज पैरों पर, नहीं गुमान ये…See More
Dec 26, 2022
Tapan Dubey commented on AMAN SINHA's blog post उम्मीद
"बहुत खूब अमन जी , बड़ी अच्छी रचना हुई है , बहुत बहुत बधाई।"
Dec 23, 2022
AMAN SINHA posted a blog post

उम्मीद

डूबते को जैसे तिनके का, सहारा काफी होता हैहर निराश चेहरे का, उम्मीद हीं साथी होता हैअंधेरी गुफा में जब कोई राही, अपनी राह बनाता हैआँखों से कुछ दिख ना पाए, उम्मीद पर बढ़ता जाता है जब कोई अपना संगी-साथी, अपनों से बिछड़ जाएऔर दूर तक उसके पग के, निशां ना हमको मिल पाएतब भी ये उम्मीद हीं है, जो हमको बांधे रखती हैमिल जाएगा हमदम अपना, हरदम कहती रहती है जब सफलता द्वार खड़ी हो, पर हमको ना मिल पाएऔर विफलता आगे बढ़कर, हमको गले लगा जाएतब भी है उम्मीद ये कहती, थकने की कोई बात नहींछोटी सी है कट जाएगी, ये युगों…See More
Dec 20, 2022
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on AMAN SINHA's blog post जा रे-जा रे कारे काग़ा
"अच्छी रचना है भाई अमन...बधाई"
Dec 13, 2022
AMAN SINHA posted a blog post

हम मिलें या ना मिलें

हम मिलें या ना मिलेंं, चाहे फूल ना खिलें लेकिन इन हवाओं में, हमारा वजूद होना चाहिए हम चलें जिस राह में, मंज़िलों की चाह में गर मिल सके ना कारवाँ से राहपर अपने मगर, निशान होने चाहिए     हम रहें या ना रहेंं, अश्क बनकर ना बहें चाहे बदनामी सही पर, अपना नाम होना चाहिए हम जलें या न जलेंं, रोशनी में ना मिले लेकिन हर दिलों में अपनी दिल की, आग होनी चाइए  हम कहें या ना कहें, गीत बनकर ना रहे शहर की हर दीवार पर, मगर अपनी आवाज होनी चाहिए हम लड़ें या न लड़ें, चाहे घाव ना भरे पर सभी के पास कलम सी तीखी एक औज़ार…See More
Dec 12, 2022
SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR commented on AMAN SINHA's blog post जा रे-जा रे कारे काग़ा
"बहुत सुन्दर गीत गरीबी और गांव की छवि समेटे , निखार और रखिए। जय जय श्री राधे"
Dec 10, 2022
SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR commented on AMAN SINHA's blog post नर हूँ ना मैं नारी हूँ
"वाह अच्छी भावाभिव्यक्ति ...दोनो का हिस्सा है मुझमें मैं दोनो हूं ...उनकी पीर उजागर करती अच्छी रचना।"
Dec 10, 2022
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नर हूँ ना मैं नारी हूँ

नर हूँ ना मैं नारी हूँ, लिंग भेद पर भारी हूँपर समाज का हिस्सा हूँ मैं, और जीने का अधिकारी हूँ जो है जैसा भी है रुप मेरा, मैंने ना कोई भेष धराअपने सांचें मे कसकर हीं, ईश्वर ने मेरा रुप गढ़ा माँ के पेट से जन्म लिया, जब पिता ने मुझको गोद लियामेरी शीतल काया पर ही, शीतल मेरा नाम दिया जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, सबसे अलग मैं खड़ा हुआसबसे हट कर पाया खुद को, अंजाने तन मे बंधा हुआ दिन बीते काया बदली, मेरी खुद की आभा बदलीबदन मेरा गठीला था पर, मेरी हर एक अदा बदली तब मैंने खुद को समझाया, दिल को अपने…See More
Dec 5, 2022
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on AMAN SINHA's blog post जा रे-जा रे कारे काग़ा
"आ. भाई अमन जी, अभिवादन। गीत का प्रयास अच्छा है। पर अभी यह कुछ और समय चाहता है। इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।"
Dec 3, 2022

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Dr.Prachi Singh commented on AMAN SINHA's blog post जा रे-जा रे कारे काग़ा
"बहुत सुंदर मनुहार भरा गीत ले कहीं कहीं अटक रही है , वहां साधने की कोशिश हो तो आसानी से गीत सध जाएगा  बधाई इस अभिव्यक्ति के लिए "
Dec 2, 2022
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Nov 29, 2022

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वक़्त को भी चाहिए वक़्त

वक़्त को भी चाहिए वक़्त, घाव भरने के लिए

ज़ख्म कितने है लगे, हिसाब करने के लिए

बस दवाओं से हमेशा, बात बनती है नहीं

एक दुआ भी चाहिए, असर दिखाने के लिए

खींच लेता हैं समंदर, लहरों को आगोश में

सागर तो होना चाहिए, सैलाब लाने के लिए

पानी में डूबा हुआ, लोहा कभी सड़ता नहीं

बस हवा हीं चाहिए, उसे जंग खाने के…

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Posted on January 23, 2023 at 5:24pm — 1 Comment

दासतां दिल की

कभी मैं दासतां दिल की, नहीं खुल के बताता हूँ

कई हैं छंद होंठो पर, ना उनको गुनगुनाता हूँ

अभी तो पाया था मैंने, सुकून अपने तरानों से

उसे तुम भी समझ जाओ, चलो मैं आजमाता हूँ

 

जो लिखता हूँ जो पढ़ता, हूँ वही बस याद रहता है

बस कागज कलम हीं है, जो मेरे पास रहता है

भरोसा बस मुझे मेरी, इन चलती उँगलियों पर है

ज़हन जो सोच लेता है, कलम वो छाप देता है

 

भले दो शब्द हीं लिक्खु, पर उसके मायने तो हो

सजाने को मेरे घर में , कोई एक आईना…

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Posted on January 16, 2023 at 11:30am

अपनो को खो देने का ग़म - २६/११ की याद में

अपनों को खो देना का ग़म, रह रह कर हमें सताएगा

चाहे मरहम लगा लो जितना, ये घाव ना भरने पाएगा

कैसे हम भुला दे उनको, जो अपने संग हीं  बैठे थे

रिश्ता नहीं था उनसे फिर भी, अपनो से हीं लगते थे

 

कैसे हम अब याद करे ना, उन हँसते-मुस्काते चेहरों को

एक पल में हीं जो तोड़ निकल गए, अपने सांस के पहरों को

हम थे,  संग थे ख्वाब हमारे, बाकी सब दुनियादारी…

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Posted on January 10, 2023 at 9:54am

उपकार

तेरे उपकार का ये ऋण, भला कैसे चुकाऊंगा? 

दबा हूँ बोझ में इतना, खड़ा अब हो ना पाऊँगा 

मेरी पूंजी है ये जीवन, जो तुम चाहो तो बस ले लो 

सिवा इसके तुम्हें अर्पण, मैं कुछ भी कर ना पाऊँगा 

         

दिया था हाथ जब तुमने, मैं तब डूबता हीं था 

सम्हाला था मुझे तुमने, के जब मैं टूटता हीं था 

मैं भटका सा मुसाफिर था, राह तू ने था…

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Posted on December 26, 2022 at 2:22pm

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