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Aazi Tamaam
  • Male
  • Bareilly, UP
  • India
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ग़ज़ल: बाद एक हादिसे के जो चुप से रहे हैं हम

221 2121 1221 212बाद एक हादिसे के जो चुप से रहे हैं हमअपनी ही सुर्ख़ आँख में चुभते रहे हैं हमये और बात है की मुकम्मल न हो सकाइक ख़त किसी के नाम जो लिखते रहे हैं हमसबसे जरूरी काम में पीछे रहे मगरबाक़ी हर एक बात में आगे रहे हैं हमवैसे तो हमसे जीतना मुमकिन न था मगरअपनी रज़ा से आप से पीछे रहे हैं हमइक रोज़ तन्हा छोड़ गए आप तो हमेंदर्द उम्र भर ये हिज़्र का सहते रहे हैं हमये सच है हमने तेग़ उठाई नहीं कभी'आज़ी' लहू में फिर भी नहाये रहे हैं हममौलिक व अप्रकाशितSee More
Sunday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"वाह आ अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें बाक़ी गुणीजनों की इस्लाह से और निखर जायेगी"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी ज़ैफ आ बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें ख़ास पसंद आया- "मैं बेवफ़ा नहीं था बस इतना कहूँगा दोस्त कुछ फ़ैसले नहीं थे मेरे इख़्तियार में""
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी आ अच्छी ग़ज़ल हुई है गुणीजनों की इस्लाह से और निखर जायेगी बधाई स्वीकार करें"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी बहुत बहुत शुक्रिया आ धामी सर ग़ज़ल पर हौसला अफ़ज़ाई के लिए 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"बहुत बहुत शुक्रिया आ ग़ज़ल पर बारीकी से इस्लाह करने के लिए व की एवं कि का संशय दूर करने के लिए अच्छी जानकारी आपसे प्राप्त हुई ग़ज़ल में आपकी इस्लाह से और निखार आ जायेगा सहृदय शुक्रिया आ 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी आ बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल पर नज़र ए करम व अच्छी इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई करने के करने के लिए पर मतले पर समझ नहीं आया मुआफ़ कीजियेगा आ आपने क्या सुझाव दिया और क्यों दिया 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी सहृदय शुक्रिया नमस्कार आ ग़ज़ल पर हौसला अफ़ज़ाई का दिल से आभार 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"सहृदय शुक्रिया आ टंकण त्रुटियों की और ध्यानाकर्षण व हौसला अफ़ज़ाई के लिए 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"सहृदय शुक्रिया आ ग़ज़ल पर हौसला अफ़ज़ाई के लिए आभार  आपने नाम ग़लत लिखा है शायद या टिप्पणी ग़लत जगह हो गयी है 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी सहृदय शुक्रिया आ ग़ज़ल तक आने व हौसला अफ़ज़ाई करने के लिए 🙏"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी आ ग़ज़ल की अच्छी कोशिश के लिए हार्दिक बधाई गुणीजनों की इस्लाह से निखार आयेगा"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी आ अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें गुणीजनों की इस्लाह से और निखर जायेगी"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी आ अच्छी ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकारें गुणीजनों की इस्लाह से और निखर जायेगी"
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"जी आ उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें " खाता है चॉकलेट ये घूमे है कार में " "कब ना नुकर किसी की तक़ल्लुफ़ छुपाये है नियत तो बादा-ख़्वार की दिख जाए लार में ""
Saturday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-164
"अच्छी ग़ज़ल हुई आ रिचा जी सुधार के बाद और निखर गई है"
Saturday

Profile Information

Gender
Male
City State
Uttar Pradesh
Native Place
CHANDAUSI
Profession
Poet, Lawer, Engineer
About me
Poetic Nature

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ग़ज़ल: बाद एक हादिसे के जो चुप से रहे हैं हम

221 2121 1221 212

बाद एक हादिसे के जो चुप से रहे हैं हम

अपनी ही सुर्ख़ आँख में चुभते रहे हैं हम

ये और बात है की मुकम्मल न हो सका

इक ख़त किसी के नाम जो लिखते रहे हैं हम

सबसे जरूरी काम में पीछे रहे मगर

बाक़ी हर एक बात में आगे रहे हैं हम

वैसे तो हमसे जीतना मुमकिन न था मगर

अपनी रज़ा से आप से पीछे रहे हैं हम

इक रोज़ तन्हा छोड़ गए आप तो हमें

दर्द उम्र भर ये हिज़्र का सहते रहे हैं…

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Posted on January 26, 2024 at 9:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल - ये जो खंडरों सा मकान है

11212    11212

इसी में तो मेरा जहान है

ये जो खंडरों सा मकान है

यूँ ही बोलने से बचा करें

यूँ कि तुंद-ख़ू ये ज़बान है

नया खून है वो है जोश में

अभी ज़िंदगी में उफान है

न है आसमाँ न है तू ज़मीं

तुझे ख़ुद पे कितना गुमान है

तेरी जाति क्या है बिसात क्या

तेरा ज़िस्म ख़ाक समान है

न क़ुसूर कोई 'तमाम' अब

न बची उमंग न जान है

मौलिक व अप्रकाशित

(आज़ी…

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Posted on January 18, 2024 at 4:30am — 4 Comments

फ़स्ल-ए-गुल है समाँ है मस्ताना

2122 1212 22

फ़स्ल-ए-गुल है समाँ है मस्ताना

आज फिर दिल हुआ है दीवाना

यूँ तो हर आँख में नशा लेकिन

उनकी आँखों में पूरा मयखाना

जबसे आये हैं उनको महफ़िल में

भूल बैठे…

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Posted on December 11, 2022 at 9:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये

12112 12112

सुरूर है या शबाब है ये

के जो भी है ला जवाब है ये

फ़क़ीर की है या पीर की है

के चश्म जो आब-ओ-ताब है ये

कज़ा है अगर सरक गया तो

जो चेहरे पे नकाब है ये

अजीब है सफ़ह-ए-ज़िंदगी भी

न पूछो की क्या जनाब है ये

कभी है ख़ुशी तो है कभी ग़म

बस एक ऐसी किताब है ये

हैं अश्क से आज चश्म जो नम

महब्बतों का हिसाब है ये

न जाने कोई है माज़रा क्या

की…

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Posted on May 22, 2022 at 8:00am — 10 Comments

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At 1:08pm on January 16, 2021, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन । मेरी गजलें आपको अच्छी लगीं यह हर्ष का विषय है । आपके इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

मंच पर अपनी रचनाओं का आनन्द लेने का अवसर प्रदान करें और अन्य रचनाकारों का भी अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करते रहिए ।

At 8:15pm on January 12, 2021, Samar kabeer said…

जनाब आज़ी साहिब,तरही मुशाइर: में शामिल सभी ग़ज़लों पर लाइव ही तफ़सील से गुफ़्तगू होती है, शिर्कत फ़रमाएँ, और कोई उलझन हो तो मुझसे 09753845522 पर बात कर सकते हैं ।

 
 
 

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ग़ज़ल: बाद एक हादिसे के जो चुप से रहे हैं हम

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