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Aazi Tamaam
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  • Bareilly, UP
  • India
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Aazi Tamaam commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post शिशिर के दोहे -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाह वाह वाह आ धामी सर बेहद खूबसूरत दोहे हुए बधाई स्वीकार करें"
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Aazi Tamaam commented on Anita Maurya's blog post एक साँचे में ढाल रक्खा है
"अच्छी रचना हुई आ अनीता जी बधाई स्वीकार करें"
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Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: आख़िरश में जिसकी खातिर सर गया
"सहृदय शुक्रिया आ ब्रज जी सब आप लोगों का मार्गदर्शन है सादर"
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: आख़िरश में जिसकी खातिर सर गया
"वाह बड़ी ही अच्छी ग़ज़ल कही भाई आजी...बधाई"
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Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: आख़िरश में जिसकी खातिर सर गया
"बहुत बहुत शुक्रिया आ अमीर जी ग़ज़ल तक आने व हौसला अफ़ज़ाई करने के लिये सादर"
Jan 16
Aazi Tamaam posted blog posts
Jan 15
Aazi Tamaam commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- कहीं ये उन के मुख़ालिफ़ की कोई चाल न हो
"वाह जनाब बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई"
Jan 15
Aazi Tamaam commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहा सप्तक -६( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )
"वाह वाह वाह वाह हर इक दोहा दिल में उतर गया बेहद सुंदर दोहे कहे आ धामी सर आपने दिल से बधाई"
Jan 15
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Aazi Tamaam's blog post दिल में जब से इश्क़ का खंजर गया
"जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं। "भूलने की कोशिशें की थीं मगर जो मिला वो ज़िक्र तेरा कर गया" वाह... बहुत ख़ूब।"
Jan 13
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: आख़िरश में जिसकी खातिर सर गया

2122 2122 212आख़िरश में जिसकी ख़ातिर सर गयाइश्क़ था सो बे वफ़ाई कर गयाआरज़ू-ए-इश्क़ दिल में रह गईजुस्तजू-ए-इश्क़ से दिल भर गयादिल की दुनिया दर्द का बाजार हैदर-ब-दर कहते हुए मुज़्तर गयाहर दफ़ा सोचा की नजरें फेर लूँहर दफ़ा सज़दे में तेरे सर गयाभूलने की कोशिशें की थीं मगरजो मिला वो ज़िक्र तेरा कर गयाज़िंदगी भी आख़िरश तंहाई हैमैं भला तंहाई से क्यों डर गयामैंने तेरी याद में ही काट दीलौटना था पर न अपने घर गयाअब मगर दिल में कोई जुम्बिश नहींइतनी ख़ामोशी की जैसे मर गयामौलिक व अप्रकाशितआज़ी तमामSee More
Jan 13
Aazi Tamaam commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (हँसी में उनकी हमने वो छुपा ख़ंजर नहीं देखा )
"वाह आ ख़ूब ग़ज़ल हुई"
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Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"सहृदय शुक्रिया आ नाहक जी नवाजिशों का सादर"
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Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"वाह आ अमित जी बेहद खूब ग़ज़ल हुई"
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"आ तसदीक जी बहुत खूब गुणीजनों की इस्लाह सर आँखों पर"
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"खूब कही आ गुरु जी की इस्लाह काबिल ए गौर"
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Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"जी आ बेहद उम्दा कोशिश की आपने गुणीजनों की इस्लाह काबिल ए गौर"
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Poet, Lawer, Engineer
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Aazi Tamaam's Blog

ग़ज़ल: हर इक दिन इन फ़ज़ाओं में नई अल्बम लगाता है

1222 1222 1222 1222

हर इक दिन इन फ़ज़ाओं में नई अल्बम लगाता है

कोई तो है हरी सी घास पर शबनम लगाता है

कहीं सुनता नहीं महफ़िल में भी अब दर्द ए दिल कोई

किसे आवाज वीराने में तू हमदम लगाता है

अज़ब है वाक़िया या रब अज़ब साकी मिला दिल को

नमक ज़ख़्मों पे दिल के किस क़दर पैहम लगाता है

धुआँ होकर निकलती हैं ये साँसें दिल के अंदर से

किसी की याद में दिल दम व दम फिर दम लगाता…

Continue

Posted on January 15, 2022 at 3:00pm

ग़ज़ल: आख़िरश में जिसकी खातिर सर गया

2122 2122 212

आख़िरश में जिसकी ख़ातिर सर गया

इश्क़ था सो बे वफ़ाई कर गया

आरज़ू-ए-इश्क़ दिल में रह गई

जुस्तजू-ए-इश्क़ से दिल भर गया

दिल की दुनिया दर्द का बाजार है

दर-ब-दर…

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Posted on January 13, 2022 at 12:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

1212 1122 1212 112

यूँ उम्र भर रहे बेताब देखने के लिये

किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये

कहाँ थे देखो सनम हम कहाँ चले आये

वो गुलबदन के वो महताब देखने के लिये

न जाने कब से हक़ीक़त की थी तलब हमको

न जाने कब से थे बेताब देखने के लिये

छुआ तो जाना हर इक ख़्वाब था धुआँ यारो

बचा न कुछ भी याँ नायाब देखने के लिये

क़रीब जा के हर एक चीज खोयी है हमने

लुटे हैं ज़िंदगी शादाब देखने के…

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Posted on October 10, 2021 at 12:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

1222 1222 1222 1222

ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

मिरी जाँ ये तो बस शाहों कि पोशाकें सजाता है

रिआया भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती है

उसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता है

नगर में नफ़रतों के भी महब्बत कौन समझेगा

ए पागल दिल तू वीराने में क्यों बाजा बजाता है

हमारे हौसले तो कब के आज़ी टूट जाते पर

ये नन्हा सा परिंदा है जो आशाएँ जगाता है

कोई बेचे यहाँ आँसू तो कोई…

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Posted on June 24, 2021 at 6:00pm — 8 Comments

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At 1:08pm on January 16, 2021, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन । मेरी गजलें आपको अच्छी लगीं यह हर्ष का विषय है । आपके इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

मंच पर अपनी रचनाओं का आनन्द लेने का अवसर प्रदान करें और अन्य रचनाकारों का भी अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करते रहिए ।

At 8:15pm on January 12, 2021, Samar kabeer said…

जनाब आज़ी साहिब,तरही मुशाइर: में शामिल सभी ग़ज़लों पर लाइव ही तफ़सील से गुफ़्तगू होती है, शिर्कत फ़रमाएँ, और कोई उलझन हो तो मुझसे 09753845522 पर बात कर सकते हैं ।

 
 
 

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