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सालिक गणवीर
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सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"221-2121-1221-212 हैं साथ हर घड़ी वो चले थे जहाँ से हमअब सबसे पूछते हैं कि आए कहाँ से हम (1) बस एक आदमी से है नाराज़गी हमें लेकिन ख़फ़ा ख़फ़ा से हैं सारे जहाँ से हम (2) क्यों बर्क़ ढूँढती है हमारा ही आशियाँ पूछेंगे एक रोज़ कभी आसमाँ से हम (3) पैरों में…"
57 minutes ago
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब आदाब ग़ज़ल पर आपकी शिर्क़त और सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ. आपकी क़ीमती  इस्लाह से ग़ज़ल सँवर गई है. ममनून हूँ. सलामत रहें."
yesterday
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी' इस मिसरे को उचित लगे तो यूँ कहें:- 'हालत ये तेरी देख के हैरान हूँ मैं भी' 'खाली है मकाँ भी मिरा सुनसान हूँ मैं…"
Wednesday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी सादर अभिवादन ग़ज़ल फर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए ह्रदय से आभार."
Sep 18
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Sep 17
सालिक गणवीर posted a blog post

हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी कोने में पड़ा घर के परेशान हूँ मैं भी (1)गर आप सरल होंगे तो आसान हूँ मैं भी ज़ालिम हैं अगर आप तो हैवान हूँ मैं भी (2)ये सूनी दिवारें ही मुझे घूर रहीं हैं खाली है मकाँ भी मिरा सुनसान हूँ मैं भी (3)गर मिल भी गए हम भी तो आबाद न होंगे उजड़ा है अगर तू भी तो वीरान हूँ मैं भी (4)आएगा किसी दिन वो लगाएगा ठिकाने कमरे में पड़ा फालतू सामान हूँ मैं भी (5)वो देखता रहता है मुझे यार हमेशा इस घर का दरीचा है वो दालान हूँ मैं भी (6)ख़्वाहिश न किया तू कभी मिलने की…See More
Sep 16
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीया Rachna Bhatia जीसादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी शिर्कत और सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ"
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीया रक्षिता जी, सादर अभिवादन ग़ज़ल के अच्छे प्रयास की बधाई स्वीकार करें"
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीया Rachna Bhatia जीसादर अभिवादन बढ़िया तरही ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाइयाँँ स्वीकार करें.गुणीजनों की इस्लाह अपेक्षित है. "
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय भाई नादिर ख़ान जीसादर अभिवादन बढ़िया तरही ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाइयाँँ स्वीकार करें."
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीया रिचा यादव जीसादर अभिवादन बढ़िया तरही ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाइयाँँ स्वीकार करें."
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय भाई अजेय जीसादर अभिवादन बढ़िया तरही ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाइयाँँ स्वीकार करें. उस्ताद की टिप्पणियों पर ग़ौर करें."
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय तस्दीक अहमद ख़ान साहिबसादर अभिवादन बढ़िया तरही ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाइयाँँ स्वीकार करें.माज़रत चाहूँगा मुहतरम ,मतला मेरी भी समझ से बाहर है. सादर."
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय भाई संजय शुक्ला जीसादर अभिवादन बढ़िया तरही ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाइयाँँ स्वीकार करें."
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय भाई नादिर ख़ान' जीसादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी शिर्क़त और सराहना के लिए ह्रदय से आभार."
Aug 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय भाई dandpani nahak जीसादर अभिवादन अच्छी तरही ग़ज़ल की बधाई स्वीकार करें।"
Aug 28

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai, Chhattisgarh
Native Place
Bhilai
Profession
Retired from SAIL,as a Senior Electrical engineer
About me
Reading,writing and photography were my hobbies and after retirement I am totally indulged to fulfill my dreams.

सालिक गणवीर's Blog

हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122

हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी

कोने में पड़ा घर के परेशान हूँ मैं भी (1)

गर आप सरल होंगे तो आसान हूँ मैं भी

ज़ालिम हैं अगर आप तो हैवान हूँ मैं भी (2)

ये सूनी दिवारें ही मुझे घूर रहीं हैं

खाली है मकाँ भी मिरा सुनसान हूँ मैं भी (3)

गर मिल भी गए हम भी तो आबाद न होंगे

उजड़ा है अगर तू भी तो वीरान हूँ मैं भी (4)

आएगा किसी दिन वो लगाएगा ठिकाने

कमरे में पड़ा फालतू सामान हूँ मैं भी…

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Posted on September 16, 2021 at 8:30am — 4 Comments

बेवज़्ह मुझे रोने की आदत भी बहुत थी...( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122

बेवज़्ह मुझे रोने की आदत भी बहुत थी

पर मुझको रुलाने में सियासत भी बहुत थी (1)

माज़ी को भुला कर मियाँ अच्छा किया मैंने

रखने में उसे याद अज़ीयत भी बहुत थी (2)

मैंने भी बुझा दी थीं वो जलती हुई शम'एँ

कमरे में हवाओं की शरारत भी बहुत थी (3)

है मुझसे अदावत उन्हें अब हद से ज़ियादा

था और ज़माना वो महब्बत भी बहुत थी (4)

ज़ालिम की शिकायत भी करें तो करें किससे

हाकिम की उसी पर ही इनायत भी…

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Posted on August 16, 2021 at 8:37pm — 15 Comments

ये लोग मुझे कुछ भी तो करने नहीं देते....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122

ये लोग मुझे कुछ भी तो करने नहीं देते

मुश्किल है बहुत जीना ये मरने नहीं देते (1)

खोदा था कुआँ सहरा में हमने कभी मिल कर

कुछ लोग घड़े हमको वाँ भरने नहीं देते (2)

इक उम्र गुज़ारी है यहाँ मैंने सफ़र में

अब पाँव भी मंज़िल पे ठहरने नहीं देते (3)

उसने जो कहा है तो वो कर के ही रहेगा

वादे से उसूल उसको मुकरने नहीं देते (4)

छाता है कभी ज़ीस्त में जब ग़म का अँधेरा

डरता हूँ मगर दोस्त सिहरने…

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Posted on August 6, 2021 at 11:01pm — 8 Comments

मंज़िल की जुस्तजू में तो घर से निकल पड़े..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-2121-1221-212

मंज़िल की जुस्तजू में तो घर से निकल पड़े

काँटों भरी थी राह प बेख़ौफ़ चल पड़े (1)

भौहें तनीं थीं देख के मुझको ऐ दिल मेरे

कुछ ऐसा कर कि अब उसी माथे प बल पड़े (2)

हर रात जागता हूँ मैं बेवज्ह दोस्तो

उसकी भी नींद में किसी शब तो ख़लल पड़े (3)

सारे बुजुर्ग देख के ख़ामोश थे मगर

बच्चे तो देखते ही खिलौने मचल पड़े (4)

सोचा नहीं था ज़ीस्त ये दिन भी दिखाएगी

देखी जो शक्ल मौत की हम भी उछल पड़े…

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Posted on July 23, 2021 at 12:30pm — 9 Comments

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