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सालिक गणवीर
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ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभीआयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभीहम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभीसच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी  उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभीहँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभीमंज़िल बुला रही है मुझे कब से दोस्तो है मेरे  इंतिज़ार में सूनी डगर अभीक्यों चहचहा रही हैंं परिंदों की टोलियाँ सूरज है सर पे देख…See More
9 hours ago
सालिक गणवीर posted a blog post

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभीआयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभीहम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभीसच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी  उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभीहँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभीमंज़िल बुला रही है मुझे कब से दोस्तो है मेरे  इंतिज़ार में सूनी डगर अभीक्यों चहचहा रही हैंं परिंदों की टोलियाँ सूरज है सर पे देख…See More
yesterday
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"//जाना है एक दिन तो न कर फ़िक्र तू अभी// मेरे सुझाए इस मिसरे में टंकण त्रुटि हो गई है,इसे यूँ पढ़ें:- जाना है एक दिन तो न तू फ़िक्र कर अभी'"
yesterday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"प्रिय रुपम आदाब ग़ज़ल पर हाज़िरी और सराहना के लिए मश्कूर-ओ-ममनून हूँ. शुक्रिया बालक."
yesterday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' साहिब आदाब. ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति एवं सराहना के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. आपकआपकी इस्लाह का ही इंतिज़ार कर रहा था.आपके सुझाव पर अमल करने के बाद पुनः पोस्ट करता हूँ. सादर."
yesterday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. आपकी क़ीमती इस्लाह पर अमल करने के बाद ,पुनः पोस्ट करता हूँ. सादर"
yesterday
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । बहुत कुछ तो जनाब रवि भसीन जी बता चुके हैं,संज्ञान लें । 'आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी' इस मिसरे में हालाँकि 'वफ़ात' का अर्थ मौत होता है,लेकिन इसके लिए…"
Saturday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। बहुत अच्छे अशआर हुए हैं जनाब, मुबारकबाद क़ुबूल करें। बस ग़ज़ल का मतला थोड़ा खटक रहा है। /आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभीहँस,खेल,मुस्कुरा तू किसी से न डर अभी/आदरणीय, सब्र उस चीज़ के लिए करने की सलाह दी जाती है जिसे पाने…"
Saturday
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"सर सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन क़ुबूल  किजीए। हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाए चोट सेहमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी यह शेर हुआ आपका वाह!! क्या ही कहने वाह!!"
Friday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ.सादर."
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई । हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं कहकहेग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभी"
Thursday
सालिक गणवीर posted a blog post

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभीआयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभीहम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभीसच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी  उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभीहँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभीमंज़िल बुला रही है मुझे कब से दोस्तो है मेरे  इंतिज़ार में सूनी डगर अभीक्यों चहचहा रही हैंं परिंदों की टोलियाँ सूरज है सर पे देख…See More
Jun 30
रवि भसीन 'शाहिद' and सालिक गणवीर are now friends
Jun 28
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-120
"आदरणीया डिंपल शर्मा जीआदाबतरही ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. सादर."
Jun 27
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-120
"आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिबआदाबतरही ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. सादर. आपकी इस्लाह सर आँखों पर जनाब.इस पर अमल करता हूँ."
Jun 27
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-120
"आदरणीय भाई मो.अनीस अरमान जीआदाबतरही ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. सादर."
Jun 27

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai, Chhattisgarh
Native Place
Bhilai
Profession
Retired from SAIL,as a Senior Electrical engineer
About me
Reading,writing and photography were my hobbies and after retirement I am totally indulged to fulfill my dreams.

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ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी

हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में

मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से

हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 

उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे

ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर…

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Posted on June 30, 2020 at 8:00am — 9 Comments

ग़ज़ल ( ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं.....)

( 2122 2122 212 )

ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं

तूने समझा हमको इस क़ाबिल नहीं

जान मेरी कैसे ले सकता है वो

दोस्त है मेरा कोई क़ातिल नहीं

सारी तैयारी तो मैंने की मगर

जश्न में ख़ुद मैं ही अब शामिल नहींं

हमको जिस पर था किनारे का गुमाँ

वो भंवर था दोस्तो साहिल नहीं

सोच कर हैरत ज़दा हूँ दोस्तो

साँप तो दिखते हैं लेकिन बिल नहीं

देखने में है तो मेरे यार - सा

उसके होटों के किनारे तिल…

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Posted on June 17, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( अभी जो है वही सच है....)

(1222 1222 1222 1222)

अभी जो है वही सच है तेरे मेरे फ़साने में

अबद तक कौन रहता है सलामत इस ज़माने में

तड़पता देख कर मुझको सड़क पर वो नहीं रूकता

कहीं झुकना न पड़ जाए उसे मुझको उठाने में

गले का दर्द सुनते हैं वो पल में ठीक करता है

महारत भी जिसे हासिल है आवाज़ें दबाने में

किसी दिन टूट जाएँगी ये चट्टानें खड़ी हैं जो

लगेगा वक़्त शीशे को हमें पत्थर बनाने में

अजब महबूब है मेरा जो पल में रुठ जाता है

महीने बीत…

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Posted on June 13, 2020 at 2:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल ( कितनी सियाह रातों में.....)

( 2212 122 2212 122)

कितनी सियाह रातों में हम बहा चुके हैं

ये अश्क फिर भी देखो आंँखों में आ चुके हैं

गर आके देख लो तो गड्ढे भी न मिलेंगे

हाँ,लोग काग़ज़ों पर नहरें बना चुके हैं

अब खिलखिला रहे हैं सब लोग महफ़िलों में

मतलब है साफ सारे मातम मना चुके हैं

वो ख़्वाब सुब्ह का था इस बार झूठ निकला

ता'बीर के लिए हम नींदें उड़ा चुके हैं

अब पाप का यहाँ पर नाम-ओ-निशांँ नहीं है

सब लोग शह्र के अब गंगा नहा चुके…

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Posted on June 9, 2020 at 4:00pm — 9 Comments

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