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सालिक गणवीर's Blog (30)

धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

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धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है

मुझे वो आग बन कर छल रहा है

पिछड़ जाउंँगा मैं ठहरा कहीं गर

ज़माना मुझसे आगे चल रहा है

बहुत ख़ुश था मैं तन्हाई में पर अब

ये सूनापन मुुझे क्यों खल रहा है

अंधेरे में उसे दिखता मैं कैसे

मगर फिर भी वो आँखें मल रहा है

बड़ा होकर दुखों में छाँव देगा

जो ये पौधा ख़ुशी का पल रहा है

निगल जाएगा मुझको भी अँधेरा

ये…

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Added by सालिक गणवीर on September 20, 2020 at 1:30pm — 7 Comments

कह रहे हैं जब सभी तुम भी कहो..( ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

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कह रहे हैं जब सभी तुम भी कहो

आँख मूँदो आम को इमली कहो

बोलते हो झूठ लेकिन एक दिन

आइने के सामने सच ही कहो

कौन रोकेगा तुम्हें कहने से अब

तुम ज़हीनों को भी सौदाई कहो

कैसे कहता कह न पाया आज तक

दोस्तों को जब कहो बैरी कहो

वो नहीं कहता है तू भी कह नहीं

जब कहे हाँ तुम भी तब हाँ जी कहो

वो बने हैं एक दूजे के लिए

दोस्तों उनको दिया बाती कहो

कह नहीं पाया मैं…

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Added by सालिक गणवीर on September 17, 2020 at 8:30am — 8 Comments

जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

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जहाँ की नज़र में वो शैतान हैं
समझते हैं हम वो भी इंसान हैं

न हिंदू न यारो मुसलमान हैं
यहाँ सबसे पहले हम इंसान हैं

खु़दा कितने हैं ,कितने भगवान हैं
यही सोचकर लोग हैरान हैं

नहीं उनको हमसे महब्बत अगर
हमारे लिये क्योंं परेशान हैं

रिहा कर मुझे या तू क़ैदी बना

तेरे हैं क़फ़स तेरे ज़िंदान हैं

*मौलिक एवं अप्रकाशित.

Added by सालिक गणवीर on September 11, 2020 at 5:30pm — 11 Comments

क्या जाने किस जनम का सिला दे गया मुझे..( ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

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क्या जाने किस जनम का सिला दे गया मुझे

था बेगुनाह फिर भी सज़ा दे गया मुझे

कैसे यक़ीन कीजिए ग़ैरों की बात का

समझा था जिसको अपना दगा दे गया मुझे

लम्बी हो उम्र मेरी दुआ मांँगता रहा

मरने की मुफ़्त में जो दवा दे गया मुझे

उसके इशारों को मैं समझ ही नहीं सका

गूंँगा था आदमी जो सदा दे गया मुझे

ग़ज़लें पुरानी ले गया आया था ख़्वाब में

इनके इवज में घाव नया दे गया मुझे

भीगा था जिस्म…

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Added by सालिक गणवीर on September 6, 2020 at 10:00pm — 18 Comments

ये तितलियाँ ये फूल भी सकते में आ गए..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

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ये तितलियाँ ये फूल भी सकते में आ गये

जब पेड़ चल के ख़ुद ही बगीचेे मेंं आ गए

कल तक मिरे अज़ीज़ अंँधेरों में क़ैद थे

आंँखें रगड़ - रगड़ के उजाले में आ गये

नीलाम हो रही है ख़ुशी सुन रहे थे कल

हम भी थे बेवक़ूफ़ जो झांँसे में आ गये

मारा गया गली में उसे सब के सामने

दर पर खड़े थे लोग दरीचे में आ गये

कह कर गए थे है ये मुलाक़ात आख़िरी

जैसे ही आँख झपकी वो सपने में आ…

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Added by सालिक गणवीर on August 31, 2020 at 10:00pm — 14 Comments

नहीं आया फिर वो बुला कर मुझे..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

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नहीं आया फिर वो बुला कर मुझे

मज़ा ले रहा है सता कर मुझे

अगर मेरे अंदर समाया है तू

कभी आइने में दिखा कर मुझे

हमेशा मिला है तू रोते हुए

मिला कर कभी मुस्कुरा कर मुझे

सदा बस मुझे हुक्म देता है क्यूँ

सलाह मशवरा भी दिया कर मुझे

है डर कुर्सियों के नगर में यही

न वो बैठ जाए उठा कर मुझे

धड़कता हूँ मैं शोर करता नहीं

मैं दिल हूँ तेरा ही सुना कर…

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Added by सालिक गणवीर on August 30, 2020 at 5:30pm — 9 Comments

हर सम्त अँधेरा है इसे दूर भगाओ...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)

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हर सम्त अंँधेरा है इसे दूर भगाओ

है कोई मुनव्वर तो मिरे सामने आओ

क़ातिल हो तो क़ातिल की तरह पेश भी आओ

घायल हूँ मिरे ज़ख़्म पे मरहम न लगाओ

कोई न उठाएगा यहाँ बोझ तुम्हारा

शानों को ज़रा और भी मजबूत बनाओ

कश्ती को सँभालो न रहो चूर नशे में

गर डूबना है डूबो हमें तो न डुबाओ

काँटों की तो तासीर है वो चुभते रहेंगे

तुम फूल हो ख़ुशबू की तरह फैलते जाओ

ऐसे भी वो करता है सर-ए-आम…

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Added by सालिक गणवीर on August 21, 2020 at 12:00pm — 14 Comments

जिसको हम ग़ैर समझते थे...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

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जिसको हम ग़ैर समझते थे हमारा निकला

उससे रिश्ता तो कई साल पुराना निकला (1)

हम भी हरचंद गुनहगार नहीं थे लेकिन

बे-क़ुसूरों में फ़क़त नाम तुम्हारा निकला (2)

हम जिसे क़ैद समझते थे बदन में अपने

वक़्त आया तो वो आज़ाद परिंदा निकला (3)

जान पर खेल के जाँ मेरी बचाई उसने

मैं जिसे समझा था क़ातिल वो मसीहा निकला (4)

दोस्तो जान छिड़कता था जो कल तक मुझ पर

आज वो शख़्स मेरे ख़ून का प्यासा निकला…

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Added by सालिक गणवीर on August 13, 2020 at 4:00pm — 10 Comments

रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

रस्ते की बात है न ये रहबर की बात है

पा लेना मंज़िलों को मुक़द्दर की बात है

ये बोरिया की है मिरे बिस्तर की बात है

फूलों की सेज मिलना मुक़द्दर की बात है

उस वाक़िआ का ज़िक्र मुनासिब नहीं यहाँ

चल घर पे चलके बात करें घर की बात है

कब कौन किसके शाने पे चढ़ जाए क्या पता

ऊपर पहुँचना भी तो सुअवसर की बात है

सब की क़लम से एक ही क़िस्सा निकलता था

आज़ादी छिन गई थी पिछत्तर की बात…

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Added by सालिक गणवीर on August 10, 2020 at 11:30pm — 12 Comments

लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

(2122 1212 22/122)

लोग घर के हों या कि बाहर के

प्यार करिएगा उनसे जी भर के

जाने क्या कह दिया है क़तरे ने

हौसले पस्त हैं समंदर के

जिस्म पर जब कोई निशाँ ही नहीं

कौन देखेगा ज़ख़्म अंदर के

दोस्ती उन से कर ली दरिया ने

जो थे दुश्मन कभी समंदर के

एक शीशे से ख़ौफ़ खाते हैं

लोग जो लग रहे थे पत्थर के

एक बस माँ को बाँट पाए नहीं

घर के टुकड़े हुए बराबर के

गरचे हर घर की है कहानी…

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Added by सालिक गणवीर on August 2, 2020 at 3:30pm — 15 Comments

उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया.(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

(2122 1122 1122 22/112)

उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया

अब तो मत पूछिये किस बात पे रोना आया

देखता कौन भरी आँखों को बरसातों में

फिर से आई हुई बरसात पे रोना आया

आप चाहें तो जो दो दिन में सुधर सकते हैं

उन बिगड़ते  हुए हालात पे रोना आया

मुद्दतों जिनके जवाबात को तरसा हूँ मैं

आज कुछ ऐसे सवालात पे रोना आया

मुझको मालूम था अंजाम यही होना है

जीत रोने से हुई मात पे रोना आया

दिन…

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Added by सालिक गणवीर on July 29, 2020 at 12:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल (यहाँ तनहाइयों में क्या रखा है....)

1222 1222 122

यहाँ तनहाइयों में क्या रखा है

चलो भी गाँव में मेला लगा है

तुझे मैं आज पढ़ना चाहता हूँ

मिरी तक़दीर में अब क्या लिखा है

किनारे पर भी आकर डूब जाओ

नदी है,नाख़ुदा तो बह चुका है

निकलना चाहता है मुझसे आगे

मिरा साया मिरे पीछे पड़ा है

ज़रा आगे चलूँ या लौट जाऊँ

गली के मोड़ पर फिर मैक़दा है

उसी पर मर रहे हैं लोग सारे

जो अपने आप पर कब से फ़िदा है

सितारों चैन से…

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Added by सालिक गणवीर on July 27, 2020 at 8:00am — 13 Comments

ग़ज़ल ( गली से जाते हुए पैरों के निशान मिले....)

1212 1122 1212 22/112

गली से जाते हुए पैरों के निशान मिले

कहीं पे उजड़े हुए-से कई मकान मिले

ये अपने-अपने मुक़द्दर की बात है भाई

मुझे ज़मीं न मिली तुमको आसमान मिले

किसी ज़माने में उनके बहुत क़रीब थे हम

अभी तो फ़ासले ही सिर्फ़ दरमियान मिले

इसे भी बेचने आए थे लोग मंडी में

कहीं पे दीन मिला और कुछ ईमान मिले

मैं चढ़ के आ तो गया हूँ ऊँचाई पर लेकिन

मुझे भी ज़ीस्त में छोटी-सी इक ढलान…

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Added by सालिक गणवीर on July 23, 2020 at 8:01am — 4 Comments

ग़ज़ल ( सोचता हूँ आज तक ग़ज़लों से क्या हासिल हुआ..)

(2122 2122 2122 212)

सोचता हूँ आज तक ग़ज़लों से क्या हासिल हुआ

पहले से बीमार था दिल दर्द भी शामिल हुआ

जब तलक घुटनों के बल चलता रहा था ख़ुश बहुत

आ पड़ा ग़म सर पे जब से दौड़ के क़ाबिल हुआ

ज़िंदगी में तुम नहीं थे इक अधूरापन-सा था

जब से आए हो ये लगता है कि मैं कामिल हुआ

चलते-चलते लोग कहते हैं सफ़र आसान है

ज़िंदगानी में सरकना भी बहुत मुश्किल हुआ

वो शरीक-ए-ग़म है अब मैं क्या कहूँ तारीफ़ में

चोट लगती है मुझे वो…

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Added by सालिक गणवीर on July 21, 2020 at 9:30am — 12 Comments

ग़ज़ल ( हद में कभी थे हद से गुज़रना पड़ा हमें.....)

(221 2121 1221 212)

हद में कभी थे हद से गुज़रना पड़ा हमें

कई बार जीने के लिए मरना पड़ा हमें

शेरों की माँद में भी कभी बेहिचक गए

दौर-ए-रवाँ में चूहों से  डरना पड़ा हमें

आकर समेटता है हमें वो ही बारहा

हर बार टूटते ही बिखरना पड़ा हमें

आए नहीं वो कल भी तो हर बार की तरह

वादे से अपने आज मुकरना पड़ा हमें

मंज़िल भी होती पाँव के नीचे मगर सुनो

उसके लिए रस्ते में ठहरना पड़ा हमें

होते कहीं पे हम भी…

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Added by सालिक गणवीर on July 18, 2020 at 7:00am — 6 Comments

ग़ज़ल ( उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो....)

(221 2121 1221 212)

उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो

ख़ालिस की है तलब ये अदाकार कम करो

आगे जो सबसे है वो ये आदेश दे रहा

आराम से चलो सभी रफ़्तार कम करो

वो हमसे कह रहे हैं कि मसनद बड़ी बने

हम उनसे कह रहे हैं कि आकार कम करो

जो मेरे दुश्मनों को गले से लगा रहा

मुझसे कहा कि दोस्तोंं से प्यार कम करो

अपने घरों में क़ैद हैं , हर रोज़ छुट्टियाँ

किससे कहें कि अब तो ये इतवार कम करो

बाज़ार में तो…

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Added by सालिक गणवीर on July 11, 2020 at 7:30am — 8 Comments

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी

हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में

मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से

हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 

उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे

ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर…

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Added by सालिक गणवीर on June 30, 2020 at 8:00am — 16 Comments

ग़ज़ल ( ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं.....)

( 2122 2122 212 )

ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं

तूने समझा हमको इस क़ाबिल नहीं

जान मेरी कैसे ले सकता है वो

दोस्त है मेरा कोई क़ातिल नहीं

सारी तैयारी तो मैंने की मगर

जश्न में ख़ुद मैं ही अब शामिल नहींं

हमको जिस पर था किनारे का गुमाँ

वो भंवर था दोस्तो साहिल नहीं

सोच कर हैरत ज़दा हूँ दोस्तो

साँप तो दिखते हैं लेकिन बिल नहीं

देखने में है तो मेरे यार - सा

उसके होटों के किनारे तिल…

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Added by सालिक गणवीर on June 17, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( अभी जो है वही सच है....)

(1222 1222 1222 1222)

अभी जो है वही सच है तेरे मेरे फ़साने में

अबद तक कौन रहता है सलामत इस ज़माने में

तड़पता देख कर मुझको सड़क पर वो नहीं रूकता

कहीं झुकना न पड़ जाए उसे मुझको उठाने में

गले का दर्द सुनते हैं वो पल में ठीक करता है

महारत भी जिसे हासिल है आवाज़ें दबाने में

किसी दिन टूट जाएँगी ये चट्टानें खड़ी हैं जो

लगेगा वक़्त शीशे को हमें पत्थर बनाने में

अजब महबूब है मेरा जो पल में रुठ जाता है

महीने बीत…

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Added by सालिक गणवीर on June 13, 2020 at 2:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल ( कितनी सियाह रातों में.....)

( 2212 122 2212 122)

कितनी सियाह रातों में हम बहा चुके हैं

ये अश्क फिर भी देखो आंँखों में आ चुके हैं

गर आके देख लो तो गड्ढे भी न मिलेंगे

हाँ,लोग काग़ज़ों पर नहरें बना चुके हैं

अब खिलखिला रहे हैं सब लोग महफ़िलों में

मतलब है साफ सारे मातम मना चुके हैं

वो ख़्वाब सुब्ह का था इस बार झूठ निकला

ता'बीर के लिए हम नींदें उड़ा चुके हैं

अब पाप का यहाँ पर नाम-ओ-निशांँ नहीं है

सब लोग शह्र के अब गंगा नहा चुके…

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Added by सालिक गणवीर on June 9, 2020 at 4:00pm — 9 Comments

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