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सालिक गणवीर
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रवि भसीन 'शाहिद' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, इस सुंदर ग़ज़ल पर बधाई क़ुबूल फ़रमाएँ। लेकिन ग़ज़ल पर चर्चा पढ़ कर मन विचलित हो उठा। मैं जितने अरसे से उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब के संपर्क में हूँ, ये देखा और अनुभव किया है कि वे नौ-मश्क़ शाइरों को ग़ज़ल की तालीम देने के लिए…"
1 hour ago
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"मोहतरम समर कबीर साहब आदाब जनाब, मैं समझता हूँ एक शब्द के लिए इतनी बहस उचित नहीं है. इसे क्या मैं इस शे'र को  ही ग़ज़ल से हटा देता हूँ. लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि जो शब्द हमारी बातचीत में शामिल हैं, उनका उपयोग करने में कोई बुराई नहीं है. हम…"
14 hours ago
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"मोहतरम मैने गूगल भी किया तब ख़्याल लिखा.// आपको यही बताना चाहता हूँ कि गूगल ने कई लोगों की नैया डुबोई है,इसके भरोसे न रहें, क्या आप किसी शाइर का शैर मिसाल में पेश कर सकते हैं जिसमें 'ख़्याल' 21 पर लिया गया हो? वैसे जानकारी देना मेरा काम…"
yesterday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय समर कबीर साहबआदाबग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार. शब्दों के चयन में मैं बहुत सावधानी बरतता हूँ जनाब.मैं आपकी इस बबात से सहमत नहीं हूँ कि ख़याल और ख़्याल एक ही शब्द है.यहां मैं हिंदी या उर्दू की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि जिस अर्थ…"
yesterday
Samar kabeer commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'ये ग़रीबों का ख़्याल है बाबा' इस मिसरे में 'ख़याल' शब्द को 21 पर लेना उचित नहीं,इसे 121 पर ही लेना दुरुस्त है । //ख़याल और ख़्याल दो भिन्न शब्द हैंं,आदरणीय, पहले…"
yesterday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"प्रिय रुपम बहुत शुक्रिया ,बालक.ऐसे ही मिहनत करते रहो.बहुत ऊपर जाना है. सस्नेह"
yesterday
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)
"खूब ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद हार्दिक बधाई सालिक गणवीर  सर "
Monday
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"मुझे भी तुम अगर तिनका बनाते हवा के साथ उड़ जाता कभी मैं बनाया है मुझे सागर उसीने हुआ करता था इक सहरा कभी मैं मैं जैसा हूँ सदा वैसा रहूँगा न बन पाया तिरे जैसा कभी मैं   इन सारे शेर के लिए मुबारक बाद देता हूँ सालिक गणवीर सर "
Monday
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"क्या रदीफ़ ली है सालिक गणवीर  सर आपने वाह!"
Monday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान साहब. आदाब. ग़ज़ल पर उपस्थिती तथा हौसला अफजाई के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ."
Sunday
अमीरुद्दीन खा़न "अमीर " commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय जनाब सालिक गणवीर जी, आदाब । दमदार अश'आ़र से सुसज्जित शानदार ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Sunday
सालिक गणवीर posted blog posts
Sunday
सालिक गणवीर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"आदरणीय भाई तेज वीर सिंह जीआदाबकथा का वार्तालाप सिहरन पैैैदा कर गया.  कथा का नयापन ही इसे अलग स्थापित कर रहा हूँ. नये सवाल उठाती कथा की प्रस्तुति के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं स्वीकारें."
Sunday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय तेज वीर सिंह जी सादर अभिवादन ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार."
Sunday
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आदाब ग़ज़ल पर उपस्थिति एवं सराहना के लिए हृदय से आभार. आपकी इस्लाह पर अमल करता हूँ, आदरणीय."
Sunday
TEJ VEER SINGH commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"हार्दिक बधाई आदरणीय सालिक गणवीर जी। बेहतरीन गज़ल। आंख इतना बरस चुकी है किआंसुओं का अकाल है बाबा"
Sunday

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhilai, Chhattisgarh
Native Place
Bhilai
Profession
Retired from SAIL,as a Senior Electrical engineer
About me
Reading,writing and photography were my hobbies and after retirement I am totally indulged to fulfill my dreams.

सालिक गणवीर's Blog

ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)

(1222 1222 122)

नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं

बशर हूँ ,था बहुत मंहगा कभी मैं

अभी जिसने रखा है घर से बाहर

उसी के दिल में रहता था कभी मैं

जिसे कहते हो तुम भी झोपड़ी अब

मिरा घर है वहीं पर था कभी मैं

वहाँ पर क़ैद कर रक्खा है उसने

जहाँ देता रहा पहरा कभी मैं

सड़क पर क़ाफिला है साथ मेरे

नहीं इतना रहा तन्हा कभी मैं

मुझे भी तुम अगर तिनका बनाते

हवा के साथ उड़ जाता कभी…

Continue

Posted on May 24, 2020 at 8:30am — 9 Comments

ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)

 (221 2121  1221 212)

अंधी गली के मोड़ पे सूना मकान है

तन्हा-सा आदमी अब इस घर की शान है

हमसे उन्होंने आज तलक कुछ नहीं कहा

हर बार उससे पूछा है जो बेज़बान है

हालात-ए- माज़ूर यक़ीनन हुये बुरे

ऊपर चढ़ाई है वहीं नीचे ढलान है

बदक़िस्मती का ये भी नमूना तो देखिये

गड्ढे नहीं मिले थे जहाँ पर खदान है

मरने के बाद भी तो फ़राग़त नहीं मिली

सारे बदन पे बोझ है मिट्टी लदान है

*मौलिक एवं…

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Posted on May 21, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)

( 2122 2122 2122 )

हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की

काश हम भी काटते फसलें ख़ुशी की

अब चुरा लो शम्स की भी धूप सारी

कोई तो बदलो  ये सूरत तीरगी की

जानवर अब हैं ज़ियादा जंगलों में

नस्ल घटती जा रही है आदमी की

हैं अंधेरे घर में अपने क़ैद सारे

कौन खींचेगा लकीरें रौशनी की

जो भी हो सागर मिलेगा तिश्नगी को

बाढ़ ले जाये हमें अब तो नदी की

आंखेंं फट जाएँगी हैरत से…

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Posted on May 15, 2020 at 7:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल ( तिजारत कैसे की जाए.....)

1222 1222 1222 1222

तिजारत कैसे की जाए हुआ है फैसला जब से

बड़ी किल्लत है पानी की लहू सस्ता हुआ जब से

मशीनें अब यहाँ पर और महंगी क्यों नहीं होंगी?

वतन में मुफ़्त ही इंसान भी मिलने लगा जब से

हमारा शह्र छोटा था मगर मिलता नहीं था वो

हमें अक्सर बुलाता है नयी दिल्ली गयाा जब से

समय के साथ कम होगी यही हम सोच बैठे थे

ये दूरी कम नहीं होती मिटा है फासला जब से

नयी शक्लें दिखाता था कभी जब सामने आया

नहीं जाता…

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Posted on May 9, 2020 at 5:00pm — 17 Comments

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