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कैसे सबका मोल चुकाऊँ?

सूरज किरणें देता जग को
नदिया देती निर्मल पानी।
पालन करती युगों-युगों से
धरती ओढ़ चुनरिया धानी।

शीतल छाया देता तरुवर
प्राणवायु यह पवन सुहानी।
फूल चमन को देते खुशबू
परम सार संतों की बानी।

उऋण हुए गुरु विद्या देकर
निर्धन को धन देकर दानी।
कैसे सबका मोल चुकाऊँ?
दीन अकिंचन मैं अज्ञानी।

हे चंडी! दे वर दे मुझको
रार अगर दुश्मन ने ठानी।
मातृ-भूमि के चरणों पर मैं
अर्पण कर दूँ शीश भवानी।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Dharmendra Kumar Yadav on September 5, 2021 at 7:17pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।  रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 5, 2021 at 1:23pm

आ. भाई धर्मेंन्द्र जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Dharmendra Kumar Yadav on August 31, 2021 at 5:21pm

आदरणीय समर कबीर जी, प्रणाम। आपकी ‘पवन’ शब्द के बारे में टिप्पणी बिल्कुल सही है। अपने मन में मातॄ-भूमि के प्रति उपजे भाव की काव्यात्मक प्रस्तुति में आ रही बाधा को दूर करने हेतु ‘पवन’ के साथ ‘सुहानी’ विशेषण का प्रयोग मैंने उपरोक्त तथ्य की जानकारी के बावजूद किया है। यद्यपि पूर्व में भी कई जाने-माने कवि/गीतकार अपने भावों को व्यक्त करने के लिए ‘पवन’ या अन्य शब्दों के साथ जाने-अनजाने यह गलती कर चुके हैं। परंतु, अंततः यह एक दोष है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। सादर।

Comment by Samar kabeer on August 31, 2021 at 3:02pm

जनाब धर्मेन्द्र कुमार यादव जी आदाब,अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

'प्राणवायु यह पवन सुहानी'

इस पंक्ति में 'पवन' शब्द पुल्लिंग है, देखियेगा ।

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