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राज़ नवादवी
  • Male
  • Bhopal, Madhya Pradesh
  • India
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"वाह, बहुत ख़ूब आदरणीय रवि शुक्ला जी, सुंदर प्रस्तुति के लिए ढेरों बधाई। सादर। "
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"आदरणीय अरुण कुमार निगम साहिब, बहुत आभार। सादर।।"
Jun 27
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"आदरणीय बासुदेव अग्रवाल नमन जी, मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर।"
Jun 27
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"आदरणीय अरुण कुमार निगम जी, मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर।"
Jun 27
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय मुनीश तन्हा जी, मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर।"
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राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय राजेश कुमारी जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है। मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर।"
Jun 27
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"आदरणीय मनन सिंह साहिब, मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर।"
Jun 27
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय आसिफ़ ज़ैदी साहिब, मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर।"
Jun 27
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय सुरेंद्र इंसान जी, मुशायरे में ग़ज़ल की प्रस्तुति पे ढेरों बधाइयाँ। सादर। "
Jun 27
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"2122 1122 1122 22/ 112 इक ज़रा चोट से, था उसका जो तेवर, निकला मैंने हीरा जिसे समझा था वो पत्थर निकला //१ कौन इस आलमे फ़ानी से मुज़फ़्फ़र निकला?हाथ ख़ाली लिए दुनिया से सिकन्दर निकला //२ मैं भी चुपचाप रहा, उसका भी तेवर निकलाजो भी ग़ुस्सा था मगर सारा ही…"
Jun 27
Samar kabeer commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४
"ठीक है ।"
May 5
राज़ नवादवी posted a blog post

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४

जनाब अहमद फराज़ साहब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल 221 1221 1221 122 बुझते हुए दीये को जलाने के लिए आ आ फिर से मेरी नींद चुराने के लिए आ //१ दो पल तुझे देखे बिना है ज़िंदगी मुश्किल मैं ग़ैर हूँ इतना ही बताने के लिए आ //२ तेरे बिना मैं दौलते दिल का करूँ भी क्या हाथों से इसे अपने लुटाने के लिए आ //३ तेरा ये करम है जो तू आता है मेरे पास मुझपे यही एहसान जताने के लिए आ //४ मुमकिन जो नहीं ज़िंदगी में तू कभी आए तो आ, मेरी मय्यत ही उठाने के लिए आ //५ तू हो चुकी है ग़ैर की कह भी नहीं सकता सब छोड़ मुझे…See More
May 4
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४
"आदरणीय जनाब समर कबीर साहब, आपकी इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई का दिल से शुक्रिया. शम्मा की जगह दीया कर रहा हूँ, शायद बात बन जाए. सादर "
May 4
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४
"आदरणीय जनाब समर कबीर साहब, आपकी इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई का दिल से शुक्रिया. शम्मा के दीया कर रहा हूँ, शायद बात बन जाए. सादर "
May 4
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४
"आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर "
May 4

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Nawada, Bihar
Profession
Education, Training, and Community Development. Hybrid Value Chain Entrepreneur (HVCE) at Ashoka Innovators for the Public
About me
Main shayar to nahin, magar ai zindgee, jab se tum ko samjha, shayari aa gai.

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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४

जनाब अहमद फराज़ साहब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल



221 1221 1221 122



बुझते हुए दीये को जलाने के लिए आ

आ फिर से मेरी नींद चुराने के लिए आ //१



दो पल तुझे देखे बिना है ज़िंदगी मुश्किल

मैं ग़ैर हूँ इतना ही बताने के लिए आ //२



तेरे बिना मैं दौलते दिल का करूँ भी क्या

हाथों से इसे अपने लुटाने के लिए आ //३



तेरा ये करम है जो तू आता…

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Posted on May 1, 2019 at 12:00am — 9 Comments

प्याज भी बोलते हैं (लघुकथा) राज़ नवादवी

प्याज भी बोलते हैं- एक लघुकथा

-------------------------------------

हर कोई सब्ज़ी वाले से बड़ा प्याज माँगता है। कल मैं भी ठेलेवाले भाई से प्याज ख़रीदते समय बड़े प्याज माँग बैठा। तभी, बड़े प्याजों के बीच बैठे एक छोटे प्याज ने मुझसे कहा,

"भाई साहब, हर कोई बड़ा प्याज माँगता है, तो हमारा क्या होगा? हम भी तो प्याज हैं!"

मैं सकपका गया, ये कौन बोल रहा है? प्याज? क्या प्याज भी बोलते हैं? तभी मैंने देखा वहीं पड़े कुछ बड़े प्याज आंनद…

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Posted on April 27, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९३

२२१ २१२१ १२२१ २१२



अपनी गरज़ से आप भी मिलते रहे मुझे

ग़म है कि फिर भी आशना कहते रहे मुझे //१ 



दिल की किताब आपने सच में पढ़ी कहाँ

पन्नों की तर्ह सिर्फ़ पलटते रहे मुझे //२ 



मिस्ले ग़ुबारे दूदे तमन्ना मैं मिट गया

बुझती हुई शमा' सा वो तकते रहे मुझे //३ 



सौते ग़ज़ल से मेरी निकलती थी यूँ फ़ुगाँ

महफ़िल में सब ख़मोशी से सुनते रहे मुझे…

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Posted on February 4, 2019 at 10:13am — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९२

२२१ २१२१ १२२१ २१२



मिलना नहीं जवाब तो करना सवाल क्यों

मेरी ख़मोशियों पे है इतना मलाल क्यों //१

दामाने इंतज़ार में कटनी है ज़िंदगी

मरने तलक है हिज्र तो होगा विसाल क्यों //२ 

यारों को कब पता नहीं कैसे हैं दिन मेरे

है जो नहीं वो ग़ैर तो पूछेगा हाल क्यों //३ 



जब है ज़रीआ कस्ब का कोई नहीं मेरा

आसाईशों की चाह की फिर हो मज़ाल…

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Posted on February 3, 2019 at 12:09pm — 3 Comments

Comment Wall (14 comments)

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At 9:42am on January 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय राज़ जी
बहुत बहुत शुक्रिया आपका
At 9:54pm on August 28, 2017, Samar kabeer said…
जनाब राज़ साहिब,कृपया फोन कर लें,मुझे ओबीओ पर चेट करना नहीं आता ।
At 2:14am on July 31, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें.

At 3:21pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

जी आप कुछ कुछ ठीक कह रहे हैं त्रुटी वश ये न की जगह ना लिखा गया 'केवल दो किलोमीटर पीछे हुए एक्सीडेंट का वो बेचारा पेशेंट साइकिल वाला था न  और ये कार वाला, क्या ये  अंतर मैं नहीं समझती'----ये इस तरह लिखा था मेरी मूल लघु कथा में ----हम दैनिक बोलचाल में न शब्द का इस्तेमाल ? के साथ करते हैं  इसमें न के बाद ? मार्क लगाना भूल गई बहुत बहुत आभार इस और ध्यान दिलाने के लिए 

At 12:30pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

सादर आभार तहे दिल से शुक्रिया ग़ज़ल आपको पसंद आई राज़ जी 

At 5:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

welcome sir

At 2:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

aapki rachnaen behatreen hain

At 4:38pm on October 8, 2012, नादिर ख़ान said…

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद

तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई

बहुत ही उम्दा गज़ल है राज़ भाई  बहुत ख़ूब

At 11:45am on September 21, 2012, प्रमेन्द्र डाबरे said…

राज़ साहब आपने मुझ नाचीज़ की भी रचना पढ़ी मैं धन्य हो गया, आपकी दाद मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है और कुछ और अच्छा लिखने की प्रेरणा अब मुझे मिलती रहेगी.... आपका तलबगार  प्रमेन्द्र डाबरे

At 10:24am on September 21, 2012, लोकेश सिंह said…

राज भाई तहे दिल से मेरा शुकराना स्वीकार करे ,आपके स्नेहिल वचन मुझे और अच्छे काव्य की रचना की प्रेरणा देंगे ,सराहना के लिए बहुत -बहुत साधुवाद ......लोकेश सिंह

 
 
 

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