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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९३

२२१ २१२१ १२२१ २१२

अपनी गरज़ से आप भी मिलते रहे मुझे
ग़म है कि फिर भी आशना कहते रहे मुझे //१ 

दिल की किताब आपने सच में पढ़ी कहाँ
पन्नों की तर्ह सिर्फ़ पलटते रहे मुझे //२ 

मिस्ले ग़ुबारे दूदे तमन्ना मैं मिट गया
बुझती हुई शमा' सा वो तकते रहे मुझे //३ 

सौते ग़ज़ल से मेरी निकलती थी यूँ फ़ुगाँ
महफ़िल में सब ख़मोशी से सुनते रहे मुझे //४  

बस थीं हया की चादरें आँखों पे दरमियाँ
कपड़ों के कब सुराख़ ये ढंकते रहे मुझे //५ 

नीयत पे मेरे कॉलों के उठते हैं अब सवाल
ताउम्र जबकि लोग समझते रहे मुझे //६ 

दस्ते बुताँ न कोई मेरा हो सका कभी
पत्तों की मिस्ल सब ही बदलते रहे मुझे //७ 

झाँका तो अपने क़ल्ब में उसके सिवा ऐ राज़
उसकी ज़फ़ा के दाग़ भी दिखते रहे मुझे //८ 

~राज़ नवादवी

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

मिस्ले ग़ुबारे दूदे तमन्ना- इच्छा रुपी धुंए के ग़ुबार की तरह; सौते ग़ज़ल- ग़ज़ल की आवाज़; फ़ुगाँ- आर्तनाद; कौल- वचन, शब्द; दस्ते बुताँ- सुन्दर स्त्रियों के हाथ; मिस्ल- तरह

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Comment by राज़ नवादवी on April 27, 2019 at 8:45pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह साहब, ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by राज़ नवादवी on April 27, 2019 at 8:44pm

आदरणीय  समर कबीर साहब, माज़रत चाहूँगा, बहुत देर से इस पोस्ट पे लौटा हूँ. आपके बताए सुझाव के मुताबिक तरमीम करता हूँ. सादर. 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 5, 2019 at 6:04pm

आद0 राज़ नवादगी सादर अभिवादन। काफ़िया दोष को अगर छोड़ दिया जाए तो अच्छी ग़ज़ल है। बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Samar kabeer on February 4, 2019 at 11:53pm

ब्लाग पर जनाब दयाराम मैठानी जी की ग़ज़ल पर इस दोष के बारे में विस्तृत चर्चा है ,उसे पढ़ लें ।

Comment by राज़ नवादवी on February 4, 2019 at 10:41pm

आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब. आपकी इस्लाह का बहुत बहुत शुक्रिया. मुझे कुछ ऐसा ही आभास हो रहा था. कृपा कर दोष को थोड़ा विस्तार से समझाएं, और इसे कैसे दूर किया जा सकता है, इसे बताने की कृपा करें. बहुत मेहरबानी होगी. सादर.

Comment by Samar kabeer on February 4, 2019 at 9:26pm

जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,पूरी ग़ज़ल में क़ाफ़िया दोष है,देखिये ।

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